भारतकोश
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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

५२ - आल्हाखण्ड । ४८४ मारु मारु कै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रव्वा चले पवनकी चाल २३५ आगे हलका भे हाथिन के पाछे चलन लाग असवार ॥ बीच म डोला महरानिन के ह्वैगे अगलबगल सरदार २३६ भूरी हथिनी पर लाखनि हैं ऊदन बेंदुलपर असवार ॥ आल्हा बैठे पचशब्दा पर इन्दल सहित भये तय्यार २३७ कीनि सवारी हरनागर पर भैने जौनु चँदेले क्यार ॥ घोड़ मनोहरपर देवा है सय्यद सिर्गापर असवार २३८ लला तमोली धनुवाँ तेली येऊ लिये ढाल तलवार ॥ पैदल सेना अनगन्ती सब गर्जतचलीसमरत्यहिबार २३९ चारिकोस जब परहुल रहिगा लाखनि डेरा दीन डराय ॥ लाखनि बोले तहँ आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय २४० दियना अंटापर परहुल मा सो त्यहि आप देउ उतराय ॥ बचन मानिकै हम पदमिन के वादा कीन तहांपर भाय २४१ दियना शालत है जियरे मा मानो कही बनाफरराय ॥ सुनिकै बातें कनौजिया की आल्हाधावनलीनबुलाय२४२ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को परहुल तुरत दीन पठवाय ॥ जहाँ कचहरी है सिंहा कै धावन तहाँ पहुँचा जाय २४३ चिट्ठी दै कै महराजा का बाकी हाल कहा शिरनाय ॥ पढ़िकै चिट्ठी सिंहा जरिगा डंका तुरतदीन बजवाय २४४ धावन चलिभा तब परहुल ते लश्कर फेरि पहुँचा आय ॥ कही हकीकति सब आल्हा ते तब जरिगये कनौजीराय२४५ हुकुम लगायो अपने दलमा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजिकै सेना दुहुँतरफा ते पहुँची समरभूमिमें आय २४६

आल्हाकामनावत । ४८५ ५३ लाखनि राना इत हाथी पर वैसी परहुल का सरदार ॥ भाला छूटे असवारन के पैदलचलनलागितलवार २४७ झुके सिपाही दुहुँ तरफा के लागे करन भड़ाभड़ मार ॥ मूंड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार २४८ बड़ी लड़ाई मै परहुल में लाखनि राना के मैदान ॥ लड़ैं सिपाही दुहुँ तरफा के कटि २ गिरैंसुघरूवाज्वान२४९ उठि उठि ठाकुर लरैं खेत में कहुँ कहुँ रुण्ड करैं तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार २५० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे अहिर विडारै गाय ॥ तैसे मारै ऊदन ठाकुर सिंहाफौजगई बिललाय २५१ भागीं फौजै जब परहुल की लाखनि हाथी दीन बढ़ाय ॥ लाखनिराना के मुर्चा मा सिंहा आपु पहुँचा आय २५२ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे दोऊ लड़न लागि सरदार ॥ सिंहा मार्यो तलवारी को लाखनिलीन ढालपरवार २५३ भाला मार्यो लखराना ने नीचे गिरा महाउत आय ॥ बलछी मारा सिंहा ठाकुर लाखनि लैगे वार बचाय २५४ खाली वार परी सिंहा की लाखनि तुरत लीन बँधवाय ॥ जायकै पहुँचे फिरि परहुल मा तुरतै दिया दीन गिरवाय २५५ लैके फौजैं सिंहा ठाकुर संगै कूच दीन करवाय ॥ कोस अढ़ाई कुड़हरि रहिगा डेरा तहाँ दीन डखाय २५६ भैने बोल्यो परिमालिक का मानो कही बनाफरराय ॥ गंगा ठाकुर कुड़हरि वाला कोड़ा घोड़ा लीन चुराय २५७ सवा लाख का सो कोड़ा है जो बनवा राजापरिमाल ॥ महामुशकिलिन घोड़ा दीन्ह्यो कोड़ानहींदीनत्यहिकाल २५८

२४ आल्हाखण्ड । ४८६ कीन प्रतिज्ञा हम कुड़हरिमां लौटति नगर ल्याब लुटवाय ॥ साँची करिये यहि समया मा मानो कही बनाफरराय २५६ इतना सुनिकै ऊदन जरिगे तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥ लागैं तोपैं अब कुड़हरि मा सबियाँगर्द देउ मिलवाय २६० इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही बनाफरराय ॥ गंगाधर कुड़हरि का राजा मामा सगो हमारो आय २६१ लिखिकै चिट्ठी दै धावन को उनको खबरि देउ करवाय ॥ मैने तुम्हरे लाखनि आये कोड़ा आपु देउ पठवाय २६२ सुनिकै बातें लखराना की चिट्ठी लिखा बनाफरराय ॥ तुरतै धावन को बुलवायो औ कुड़हरिको दीनपठाय २६३ लैके चिट्ठी धावन चलिभा औ दरबार पहुँचाजाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो गंगाधर को धावन हाथजोरिशिर नाय २६४ कही हकीकति सब गंगा ते जो कछु कह्यो बनाफरराय ॥ सुनि संदेशा पढ़ि चिट्ठी को ठाकुरक्रोधकीनअधिकाय २६५ तुरत नगड़ची को बुलवायो डङ्का दीन तहाँ बजवाय ॥ कह्यो सँदेशा फिरि धावन ते आल्है खबरि जनावोजाय २६६ राजा आवत समरभूमि में कोड़ा लेउ तहाँ पर आय ॥ इतना सुनिकै धावन चलिभा आल्है खबरि बताईजाय २६७ बाजे डङ्का ह्याँ कुड़हरि मा क्षत्री होन लागि तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार २६८ झीलम बख्तर पहिरि सिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणकाहोनलागब्यवहार २६६ चढ़िकै हथिनी गंगा ठाकुर तुरतै कूच दीन करवाय ॥ चारि घरी का अरसा गुजरा पहुँचे समरभूमिमाआय २७०

आल्हाकामनावन । ५८७ २१ जहँना हाथी गंगाधर का तहँ पर गये कनौजीराय ॥ कहि समुझावा भल मामा का कोड़ा अबै देउ मँगवाय २७१ नहीं बनाफर उदयसिंह जी कुड़हरि गर्द देयँ करवाय ॥ कौन दुसरिहा है आल्हा का सरबर करै समरमें आय २७२ त्यहिते तुमका समुझाइत है मामा कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै गंगा जरिगे बोले सुनो कनौजीराय २७३ काह हकीकति है आल्हा कै हमते कोड़ा लेयँ मँगाय ॥ एक बनाफर कै गिन्ती ना लाखनचढ़ैं बनाफरधाय २७४ हमते कोड़ा को पैहैं ना मैने साँच दीन बतलाय ॥ इतना सुनिकै चले कनौजी तम्बुन फेरि पहुँचे आय २७५ बत्ती दैदै दुहुँ तरफा ते तोपन दीन्हीं रारि मचाय ॥ अररर अररर गोला छूटे हाहाकार शब्दगा छाय २७६ गोला लागै ज्यहि हाथी के मानो गिरा धौरहर आय ॥ जउने ऊंट के गोला लागै तुरतै कूला जुदा है जाय २७७ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के साथै उड़ा चील्ह अस जाय ॥ जउने रथमा गोला लागै ताके टूक टूक है जायें २७८ गोला लागै ज्यहि घोड़े के मानो मगर कुल्याचै खायँ ॥ अँधाधुंध भा दूनों दलमा धुवना रहा सरगमें छाय २७९ चुकी बरूदैं जब तोपन की तब फिरि मारु बन्द है जाय ॥ दूनों दल आगे को बढ़िगे रहिगा एक खेतरणआय २८० कहूँकहूँ भाला कहूँकहूँ बरछीं कहूँ कहूँ कड़ाबीनकी मार ॥ गोली ओला सम कहुँ बरषैं कोताखानी चलैं कटार २८१ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार २८२

२६ आल्हखण्ड । १८८८ ना मुँह फेरैं कुड़हरि वाले ना ई मोहबे के सरदार ॥ कउँधालपकनिबिजुलीचमकनि रणमा चलै खूब तलवार २८३ भागि सिपाही कुड़हरि वाले अपने डारि डारि हथियार ॥ गंगा ठाकुर के मुर्चा मा आवा उदयसिंह सरदार २८४ ऍंड़ लगावा तब बेंबुल के हाथी उपर पहुँचा जाय ॥ भाला मारा बघऊदन ने गंगा लैगा वार बचाय २८५ तवलों आये आल्हा ठाकुर हाथी भिड़ा बरोबरि आय ॥ दैकै साँकरि पचशब्दा को तुरतै कैदलीन करवाय २८६ लैकै फौजैं ऊदन ठाकुर कुड़हरिशहर लीन लुटवाय ॥ काछी कुरमी तेली भागे कोरीभागि थानविसराय २८७ दर्जी भुर्जी सब भागे तहँ भागे बड़े बड़े महराज ॥ कौन बखानै त्यहि समयाकै रहिगैनहींक्यहूँकहूँलाज २८८ साँच वातकरि जगनायक कै दीन्ह्यों लूट बन्दकरवाय ॥ लैकै कोड़ा बौना चलिभा आल्हानजरिगुजाराजाय २८६ कोड़ा दीन्ह्यो जगनायक को आल्हा तुर्त तहाँ बुलवाय ॥ कैद छुड़ाय दई गंगा की आदर कियो कन्नौजीराय २६० लैकै फौजैं गंगा ठाकुर साथै कूच दीन करवाय ॥ चलिभालश्कर कनौजियाका यमुना उपर पहुँचा जाय २६१ मज्जन करि कै श्रीयमुनाजल पाछे शम्भुचरण धरि ध्यान ॥ संध्या तर्पण विधिवत करिकै दीन्ह्योद्विजनतहाँपरदान २६२ कूच करायो श्रीयमुना ते कलपी पास पहुँचे जाय ॥ लैकै फौजैं लाखनिराना कलपीशहरलीनलुटवाय २६३ ऊदन बोले तब लाखनि ते यह्र का कीन कन्नौजीराय ॥ बदले कुड़हरिके लुटवावा मानो साँच बनाफरराय २६४

आल्हाकामनावन । ४८६ २७ बातैं सुनिकै लखराना की देवा कहा तुरत शिरनाय ॥ साँचे धर्मन के राँचे हैं याँचे मिले कनौजीराय २६५ कर्म कुलीनन के कीन्हे हैं साँचे मित्र बनाफरराय ॥ बातैं सुनिकै ये देवा की बोले तुरत उदयसिंहराय २६६ स्याबसि स्याबसि लाखनिराना कीन्ह्यो धर्म युद्धसों रार ॥ काहे न होवै यश क्षत्रिन को ऐसे युद्ध बीर बरियार २६७ इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतै कूच दीन करवाय ॥ नदी बेतवा के ऊपर मा छोरी कमर बनाफरराय २६८ डेरा गड़िगे तहँ क्षत्रिन के तम्बू गड़ा बनाफर क्यार ॥ जहँ महराजा लाखनि बैठे भारी लाग तहाँ दरबार २६६ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भैने गयो चँदेले क्यार ॥ कलम दवाइति कागज लैके आल्हा पत्र कीन तैयार ३०० चिट्ठी दीन्ही आल्हा ठाकुर बोले उदयसिंह सरदार ॥ खबरि जनावो तुम मल्हनाको आये कनउज राजकुमार ३०१ हमरी दादाकी दिशि हैंकै रानिन कीन्ह्यो दण्ड प्रणाम ॥ काह हकीकति है पिरथी कै सुखसोंकरो महल बिश्राम ३०२ जितनी बिल्ली हैं दिल्ली की किल्ली पकरि नचावों माय ॥ तौ तौ साँचे हम ऊदन हैं यहतुमकह्योसँदेशाजाय ३०३ सुनि संदेशा बघऊदन का हरनागरै लीन कसवाय ॥ चढ़ा तड़ाका हरनागर पर जगनिकयथातथ्यशिरनाय ३०४ नदी बेतवाको उतरत भा पहुँचत भयो मोहोबेद्वार ॥ फाटक खोल्यो दरवानी ने पहुँचे राजभवन सरदार ३०५ रानी मल्हना के महलन मा माहिल आयगयो त्यहिबार ॥ तबलौं पहुँचे जगनायक जी बोला उरई का सरदार ३०६

२८ आल्हाखण्ड । ४६० कवलों अइहैं आल्हा ठाकुर नीके हवैं बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै जगनायक जी तुरतै बोले बचन बनाय ३०७ हिंया न अइहैं आल्हा ठाकुर अब चहु करू मनावनजाय ॥ उनकै खातिर कनौजिया घर नीके दऊ बनाफरराय ३०८ पारस लैके तुम कुठरी ते पिरथी पास देउ पहुँचाय ॥ लैके कुंजी जगनायक जी कुठरीखोलिदीनवतलाय ३०६ उठे झड़ाका माहिल ठाकुर कुठरी अटे तड़ाकाधाय ॥ साँकरिमारी जगनायक जी ताला तुरत दीन डरवाय ३१० बन्द कुठरिया माहिल ठाकुर मल्हना गई सनाकाखाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो फिरिजगनायक औसबहालकह्योसमुझाय ३११ पढ़िकै चिट्ठी मल्हना रानी औ जगनायक संग लिवाय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक की चिट्ठी तहाँ दिखाई जाय ३१२ छन्द ॥ पढ़ि पत्रतहाँ। लहिमोद महाँ॥ परिमाल जहाँ। तजिशोकतहाँ॥ भवनमें आय । महासुख पाय ॥ लखिकैदतहाँ । उरई को जहाँ ॥ महरानि गई । तजि बन्धु दई ॥ अतिबेगचला । उरईको लला ॥ पृथिराजजहाँ। स्वउ आयतहाँ॥ सबहालकहा। बिपदाजोलहा३१३ सुनिकै बातें सब माहिल की यहु महराज पिथौराराय ॥ घाट बयालसि तेरहघाटी सबियाँतुरंतदीन रुकवाय ३१४ पहरा घूमें कहुँ पैदल का कहुँ कहुँ फिरैं घोड़असवार ॥ अनँद बधैया मोहबे बाजै घर घर होयं मंगलाचार ३१५ फाटक बन्दी है मोहवे मा घरका अवै न बाहर जाय ॥ आल्हा ऊदन की कीरति तहँ घर घर रहे नारि नर गाय ३१६ आल्ह मनौआ पूरण करिकै ध्यावों रामचन्द्र महराज ॥

आल्हाकामनावन । ४६१ २६ जलथलजनमों जहँ दुनियामा होवों तहाँ भक्त शिरताज ३१७ पिता मातु के मैं चरणन का ध्यावों बार बार शिरनाय ॥ जिन बल गाथा यह पूरण भै भुजबलनहीं भरोसाभाय ३१८ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ३१६ आशिर्बाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतगाथकसगाय ३२० रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ३२१ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को ह्वाँते करों तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त ३२२ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृत आल्हामनावनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ ठाकुरआल्हासिंहजीकामनावन सम्पूर्ण ॥ इति ॥

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अथ आल्हखण्ड ॥ नदीबेतवापरलाखनिपृथ्वीराज काप्रथमयुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ रामसिया पद दोउ मनाय सो ध्याय शिवा शिव चर्ण यथारथ । कीरति कृष्ण बखान करों जिनके बलसों बलवान भे पारथ ॥ भीषम कर्ण सुयोधन ज्वान महान सबै मरिगे रणभारथ । चाहत कृष्ण नहीं ललिते बलते थलते जगते सो अकारथ १ सुमिरन ॥ दशरथ नन्दन को बन्दन करि सीता चरण कमलको ध्याय ॥ सुमिरि भवानी शिवशंकर को औ यदुनन्दन चरण मनाय १ बड़े प्रतापी कुंती नन्दन बन्दन करों युधिष्ठिरराय ॥ गदा प्रहारी भीमसेन को ध्यावों बार बार शिरनाय २ शूर धनुर्धर नर अर्जुन की कीरति सकै कौन नर गाय ॥

२ आल्हाखण्ड। ४६४ विद्या पूरण सहदेऊ की कीरति रही जगतमें छाय ३ बड़ा प्रतापी रण मण्डल मा नकुलो समरधनी तलवार ॥ करण न होतो जो दुनिया मा तौ को होत दान वरियार ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो पिथौरा क्यार ॥ नदी बेतवाके डाँड़ेपर लाखनि करी खूब तलवार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भारी लाग राज दरवार ॥ त्यही समैया त्यहि औसर मा बोले उदयसिंह सरदार १ घाट बयालस पिरथी रोंके दादा करो कछू तदबीर ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले ऊदन धरो हृदय में धीर २ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर तुरतै पान दीन धरवाय ॥ है कोउ योधा दूनों दल मा जो बितवा पर पान चवाय ३ इतना सुनिकै दोऊ दल के क्षत्री गये सनाकाखाय ॥ बोलि न आवा क्यहु क्षत्री ते सबहिन मूड़ लीन अउँधाय ४ ऊदन तड़पे त्यहि समया मा पहुँचे पाननिकट फिरिजाय ॥ आल्हा बोले तब ऊदन ते मानो कही लघुरवाभाय ५ अबती बारी है लाखनि कै गाँजर फते कीन तुम जाय ॥ नदी बेतवा के मोर्चा पर जावैं अवशि कनौजीराय ६ मीराताल्हन धनुवाँ तेली बोले दोऊ शीश नवाय ॥ तजी सम्पदा सब कनउज की आये लड़न कनौजीराय ७ नव दिन दश दिन भे गौने के सो तजिदई पदमिनी नारि ॥ बीरा खैये लाखनि राना करिये नदी भयानक रारि ८ बात बराबरी की सहिये ना चहिये जायँ नदी पर प्रान ॥ बातैं सुनिकै ये सय्यद की बीरा लीन कनौजी जवान ६

नदीबेतवांकासमर । ५६५ ३ ऊदन बोले तब लाखनि ते हमरे बचन करो परमान ॥ संग कनौजी हमहूं चलिबे करिबे घोर शोर घमसान १० मान न रखिबे क्यहु क्षत्री के तुम्हरे संग कनौजी ज्वान ॥ ऊदन लाखनि के मुर्चा ते जैहैं लौटि बीर चौहान ११ इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो उदयसिंह सरदार ॥ रतीभान का मैं लड़काहूं नाती बेनचकवै क्यार १२ काह हकीकति हैं दिल्लीपति जो तुम चलो संगमें ज्वान ॥ भूरी हथिनी कछु बूढ़ी ना ना कछु असारोग बलवान १३ संग न लेबे हम काहू को आल्हा बचन करब परमान ॥ इतना कहिकै लाखनि ठाकुर नदी हेतु कीन प्रस्थान १४ धनुवाँ तेली मीरा सय्यद येऊ भये साथ तय्यार ॥ नदी बेतवा के पाँजर मा पहुँचा कनउजका सरदार १५ नौसै हाथी लखरानाके पानी पियनगये त्यहिकाल ॥ पार उतरिगे ते नदी के सहिनहिंसकेघाम बिकराल १६ तब हरिकारा पृथीराज का चौंड़ै खबरि जनाई जाय ॥ बहुतक हाथी पार आयगे मानों कही चौंडियाराय १७ इतना सुनिकै चौंड़ा बाम्हन अपनो हाथी लीन मँगाय ॥ चढ़ा तड़ाका फिरि हाथीपर नदी उपर पहुँचा आय १८ सबियाँ हथिनी लखराना की चौंड़ा तुरत लीन खिदवाय ॥ भगे महाउत सब तहँना ते आये जहाँ कनौजीराय १६ हाल बताइने सब हाथिनका ज्यहिविधिचौंड़ालीनखिदाय ॥ सुनि संदेशा लाखनिराना डंका तुरत दीन बजवाय २० भारी लश्कर लखराना का गर्जति चला समरको जाय ॥ घरी मुहूरत के अरसा मा पहुँचे समरभूमि में आय २१

४ आल्हाखण्ड । ४६६ लाखनिराना मीरा सय्यद धतुवाँ सहित उतरिगे पार ॥ नौसै हाथी लखराना का सातसै हथी पिथौरा क्यार २२ सोलासै के हाथी दलमा पहुँचे तुरत कनौजीराय ॥ जितने हाथी दूनों दल के सोसब तुरतलीन खिदवाय २३ गा हरिकारा पृथीराज का चौंड़ै खबरि जनाई जाय ॥ हमरी अपनी सब हथिनिनको लाखनिराना लीनखिदाय २४ सुनिकै बातैं हरिकारा की चौंडा फौज लीन सजवाय ॥ धाँधूठाकुर को सँग लैके तुरतैं कूचदीन करवाय २५ बीस खेत जब लाखनि रहिगे चौंड़ा बोला वचन सुनाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय २६ इकलो हाथी लखि चौंड़ाको लाखनि भूरी दीन बढ़ाय ॥ सम्मुख आये जब चौंड़ा के बोले तबै कनौजीराय २७ बेन चकवै के नाती हम बेटा रतीभान को जान ॥ मोहबा देखन हम जाइत हैं लाखनि नाम हमारो मान २८ आल्हा ऊदन के सँग आयन चौंड़ा साँच दीन बतलाय ॥ इतना सुनतै चौंड़ा बोला मानो कही चँदेलेराय २६ आल्हा चाकर परिमालिक के सो कनउजको गये रिसाय ॥ कीनि चाकरी उन जयचँदकी तिनके साथ कनौजीराय ३० ऐसी कहिये नहिं काहू सों अबहीं कूच देउ करवाय ॥ संगति राजा अरु चाकर की कतहूँ न सुनाकनौजीराय ३१ इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही चौंड़ियाराय ॥ बड़ी बड़ाई ऊदन कीन्ही तब मनगई लालसा आय ३२ बिना मोहोबा आँखिन दीखे कैसे कूच देयं करवाय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बोला मानो साँच कनौजीराय ३३

नदी बेतवा का समर । ४६७ ५ चढ़ा पिथौरा सात लाख सों सबियाँ घाट दये रुकवाय ॥ जो तुम लड़िहौ है चाकर सँग तौ रजपूती धर्म नशाय ३४ इतना सुनिकै लाखनि बोले चौंड़ा काहगये बौराय ॥ किरिया कीन्ही हम गंगा में चलिबे साथ बनाफर राय ३५ पाँउँ पिछारी का डरिबे ना चहुतन धजी धजी उड़िजाय ॥ चुवै निशाकर ते आगी चहु औ नभ मिलै धरणि में आय ३६ उवै दिवाकर चहु पश्चिम को सातौं सूखि समुन्दर जायँ ॥ लाखनि भागैं नहिं नदिया ते चौंड़ा साँच दीन बतलाय ३७ इतना सुनिकै जरा चौंड़िया तुरतै दीन्ही ढाल चलाय ॥ होउ बहादुर जो लखराना हमरी ढाल लेउ उठवाय ३८ लाखनि बोले तब धनुवाँ ते लावो ढाल यार यहिबार ॥ दाबि बछेड़ा धनुवाँ चलिभा धाँधू कहा बचन ललकार ३६ पाँउँ अगाड़ी को डारे ना नहिं मुहुँ धाँसि देउँ तलवार ॥ बात न मानी कछु धाँधू की धनुवाँ घोड़े का असवार ४० भाला धमका धाँधू ठाकुर धनुवाँ लैगा वार बचाय ॥ ढाल उठाई जब धनुवाँ ने स्याबासिकह्यो कनौजी राय ४१ लीन कटारी लाखनि राना औ रेतीमा दीन चलाय ॥ होय बहादुर जो दिल्ली को सो अब लेय कटार उठाय ४२ इतना सुनिकै भूरा चलिभा सय्यद उठा तड़ाका धाय ॥ तब ललकारा वहि भूराने सय्यद खबरदार है जाय ४३ कहा न माना कछु भूरा का सय्यद लीन कटार उठाय ॥ सो दैदीन्ही लखराना का चौंड़ा बहुत गयो शरमाय ४४ झुके सिपाही दुहुँ तरफा के फिरितहँ चलन लागि तलवार ॥ पैदल पैदल के बरणी मै औ असवार साथ असवार ४५ ११

६ आल्हखण्ड । १४८ मूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ॥ गजके हौदाते शर बरषैं नीचे करैं महाउत मार ४६ कटि कटि कल्ला गिरैं खेतमा घायल भये सुघरुआ ज्वान ॥ नदी बेतवा के डांडेपर लाखनि चौंडाका मैदान ४७ दाब्यो लश्कर लखराना का लाग्यो होन भड़ाभड़ मार ॥ भागि सिपाही दिल्लीवाले अपने डारि डारि हथियार ४८ चौंडा बाम्हन औ लाखनिका परिगा समर बरोबरि आय ॥ तीर चौंडिया तकिकै मारा लाखनि लैगे वार बचाय ४६ तुरतै भूरी को दौरावा चौंडा पास पहुँचे जाय ॥ भाला मारा लखराना ने हाथी गिरा पछाराखाय ५० तुरत चौंडिया पैदल हैगा तब यह कहा कनौजीराय ॥ पायँ पियादे को मारैं ना हाथी और लेउ मँगवाय ५१ इतना कहिकै लाखनिराना आगे दीन्ही फौजबढ़ाय ॥ बाजे डंका अहतक के हाहाकार शब्द गा छाय ५२ सुर्चा हटिगा जब चौंडा का धावन तबै पहुँचा जाय ॥ सुनि हरिकारा की बातैं सब ताहर बेटा लीन बुलाय ५३ हुकुम लगावा महराजा ने तुम चढ़िजाउ नदीपर धाय ॥ हुकुम पिथौरा का पावतखन डंका तुरत दीन बजवाय ५४ सजा रिसाला घोड़न वाला आला तीनि लाखलों भाय ॥ कच्छी मच्छी ताजी तुर्की हरियल सुर्ख परैं दिखराय ५५ को गति वर्णैं तहँ सिरगनकी मिरगन चाल चलेसब जायें ॥ हंस चालपर पँचकल्यानी मुश्की मोरसरिस दिखरायें ५६ लवा कि चालन ताजी जावैं हरियल चलैं कबूतर चाल ॥ कच्छी कच्छपकी चालनमा मच्छी मगरमच्छकी चाल ५७

नदीबेतवाकासमर । ४६६ ७ सुर्खा जावैं शशाचालपर तुर्की तीतर के अनुहार ॥ भाला बलछी छुरी कटारी लीन्हे चढ़े ढाल तलवार ५८ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरी अँबारी तिन हाथिन के बहुतन हौदा रहे बिराज ५६ आदि भयंकर हाथी ऊपर पिरथीराज भये असवार ॥ तीरकमानै अनगिन्ती लै लीन्ही फेरि ढाल तलवार ६० छुरी कटारी भाला वरछी लीन्हे सबै नृपति हथियार ॥ घोड़नाम दलगंजन ऊपर ताहर आगे राजकुमार ६१ ढढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ॥ औरि बयरिया डोलन लागीं औरै होनलाग ब्यवहार ६२ मारु मारु कै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्वा चले पवनकी चाल ६३ घोड़ा हींसैं हाथी चिघेरैं बैगा अन्धधुन्ध त्यहिबार ॥ डेढ़ लाख दल पैदल लीन्हे राजा दिल्ली का सरदार ६४ डगमग डगमग धरती डोली देवता झाँकि गये असमान ॥ देवी देवता पृथ्त्री वाले चक्रित भये देखि चौहान ६५ को गति बरणै त्यहि समया कै जा क्षण चला पिथौराजवान ॥ लाली लाली आँखी कीन्हे गजभरि छातीका चौहान ६६ जहाँ हैं फौजैं लखराना की प्यारो पूत कन्नौजी क्यार ॥ मीराताल्हन बनरस वाला सिर्गा घोड़े पर असवार ६७ धनुवाँ तेली है घोड़े पर बारह कुँवर बनौधा केर ॥ चारौराजा गाँजर वाले तिनते कहा कन्नौजी टेर ६८ आई फौजैं पृथीराज की यारो वेगिहोउ हुशियार ॥ इतना सुनिकै कनउन वाले बोले सबै शूरसरदार ६६

८ आल्हखण्ड । ५०० हुकुम लगावो अब तोपन को गोलंदाज होयें तय्यार ॥ लखि अस मर्जी सरदारन की लाखनिहुकुमदीनत्यहिबार७० लै लै थैली बारूदन की सो तोपनमा दई डराय ॥ गोला छूटे दुहुँ तरफा के हाहाकार शब्द गा छाय ७१ लागै गोला ज्यहि हाथी के मानो चोर सेंधि कैजाय ॥ जउने ऊंट के गोला लागै तुरतै गिरै सार अललाय ७२ लागै गोला ज्यहि घोड़ा के मानो मगर कुल्याचै खाय ॥ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के धुनकतरूईसरिसउड़िजाय ७३ जउने रथमा गोला लागै बिजली गिरै वृक्ष जस आय ॥ तैसे चूरण करि स्यन्दन को पहियाधुरी देय अलगाय ७४ फूटै गोला जब ठुकरे मा बिथरैं पाँच खेतलों भाय ॥ गोली निकरैं तिन गोलन ते ओलनसरिसजायँतहँछाय ७५ बोलि न पावैं कोउ ठाकुर तहँ चुप्पे भूमि देयँ पौढ़ाय ॥ बड़ी दुर्दशा भै तोपन मा तब फिरि मारु वन्दहैजाय ७६ दुनों गोल आगे को बढ़िगे रहिगा डेढ़ खेत मैदान ॥ भाला वलछी की मारुन मा व्याकुलभये सिपाहीज्वान७७ शुण्डा कटिगे हैं हाथिन के रुण्डन हैगा ऊंच पहार ॥ कङ्का कटि कटि गिरैं बछेड़ा घैहा होन लागि सरदार ७८ गंगा ठाकुर कुड़हरि वाला पूरन पटना का सरदार ॥ देवी मरहटा दक्षिण वाला अंगदनृपतिग्वालियरक्यार७९ हिरसिंह विरसिंह बिरिया वाले इनके साथ करें तलवार ॥ भुरा मुगलिया काबुल वाला सय्यद बनरस का सरदार ८० धौंधू धनुवाँ का मुर्त्ता है औ दतियाके बंशगुपाल ॥ चिंता ठाकुर रुसनी वाला गुरखा नृपति शहरबंगाल ८१

नदीबेतवाकासमर । ५०१ ६ कालनेमि औ परसू, सिंहा, ताहर साथ सबै सरदार ॥ भूरी हथिनी सों लखराना। गरुई हाँक कीन ललकार ८२ कौन बहादुर है दिल्ली का रोंकै बाट हमारी आय ॥ इतना सुनिकै ताहर जरिगे बोले सुनो कनौजीराय, ८३ तुम्हरे घरते संयोगिनि को दिल्ली वाले लये लिवाय ॥ वई बहादुर पृथीराज हैं गाँस्यनिनगरमोहोबाआय ८४ काह हकीकति कनवजिया कै जो अब धरै अगारी पायँ ॥ हुकुम पिथौरा का नाहीं है ताते कूच देउ करवाय ८५ इतना सुनिकै लाखिनि बोले ताहर काह गये बौराय ॥ लैकै बिटिया चेरी घरकै रानी कीन पिथौराराय ८६ एकतो बदला है चेरी का दूसर साथ बनाफर क्यार ॥ कसरि न राखै दिल्ली वाले ठाकुर घोड़े के असवार ८७ इतना कहिकै लाखनि राना मारन लाग ढूँढ़ि सरदार ॥ भूरी हथिनी का चढ़वैया नाती बेनचकवै क्यार ८८ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ॥ तैसे पैठ्यो लाखनि राना कोऊ शूर नहीं समुहाय ८६ कायर भागे दुहुँ तरफा ते सायर खूब करैं तलवार ॥ यहु दलगंजन का चढ़वैया ताहर दिल्ली राजकुमार ६० बहुदल मारै रजपूतन का नंदिया बही रक्तकी धार ॥ छूरी मछली के समसोहैं ढालैं कछुवाके अनुहार ६१ बहैं लहाशैं जो मनइन की तिनपर चढ़े गृद्ध विकराल ॥ बार सिवारा समसोहत हैं चहुँदिशिसोहैंश्वानशृगाल९२ बहै अपारा शोणित धारा मज्जन करैं भूत वैताल ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै कागन भई टोंट सब लाल ६३

१० आल्हखण्ड।५०२ तीनि सै हाथी के हलका मा अकसर परे कनौजीराय ॥ देखन लागे चौगिर्दा ते कोउनहिंअपनपरौदिखराय ६४ जितने आये चढ़ि कनउज ते ते सब हटे समर ते भाय॥ मीरा सय्यद धनुवाँ तेली दूनों दीन्हेनि समर वराय ६५ सुफना बोला तब लाखनि ते मानो कही कनौजीराय ॥ सबदल हटिगाहै कनउज का इकले आप रहे मड़राय ६६ हुकुम जु पावैं महाराजा का हथिनी देवैं तुरत भगाय ॥ छुवै न पावैं दिल्ली वाले राजन साँच दीन बतलाय ६७ इतना सुनिकै लाखनि बोले सुफना काह गये बौराय ॥ कहा न माना हम जयचंद का हटका मातु हमारी आय ६८ अब जो भागैं समर भूमि ते तौ रजपूती धर्म नशाय ॥ अमर न देही रामचन्द्र कै ना रहिगये कृष्ण यदुराय ६६ जो कोउ जनमाहै दुनिया मा निश्चय मरै एक दिन भाय ॥ जितने जावैं मरि दुनिया ते पैदा होयँ तड़ाका आय १०० यामें संशय कछु नाहीं है गीता पाठकीन अधिकाय ॥ सुनिकै बातें लखराना की नीचे गयो महाउत आय १०१ फूल पियायो त्यहि भूरी को पक्का पौवा भाँग खवाय ॥ गोटा दीन्ह्यो इक अफीम का ऊपर चढ़ा तड़ाकाधाय १०२ बोला महाउत फिरि लाखनिते ओ महराज कनौजीराय ॥ चारों तरफा दल वादल सों क्याहिदिशिहथिनीदेवैंबढ़ाय १०३ सुनी महाउत की बातें जब बोले फेरि कनौजीराय ॥ ऐसी हाथी हैं पिरथी का भारी ध्वजा रहा फहराय १०४ चलौ तड़ाका दिशि याही को सुफना साँच दीन बतलाय ॥ किरपा ह्वैहै नारायण की पैबै विजय समरमें भाय १०५

नदीबेतवाकासमर। ५०३ ११

सुनिकै बातें लखराना की सुफना हाथी दीन बढ़ाय ॥ अक्सर लाखनि के जियरेपर चहुँदिशिफौजरहीमड़राय १०६ साँकरि फेरै भूरीहथिनी सबदल हटत पछारी जाय ॥ मारत मारत लाखनिराना पहुँचे जहाँ पिथौराराय १०७ आदिभयंकर गज के भूरी मस्तक हना तड़ाकाधाय ॥ आदिभयंकर पाछे हटिगा तब पहिचिना पिथौराराय १०८ लैकै माला गल अपने सों सो लाखनिको दीन पहिराय ॥ जैसे लड़का रतीभान के तैसे पूत कन्नौजीराय १०६ घाटि न जानैं हम ताहरते ओ महराना बात बनाय ॥ तुम अब आवो हमरे दलमा मोहवाशहर लेयँ लुटवाय ११० पारस पत्थर को तुम लीन्ह्यो लोहाछुवत स्वान ह्रैजाय ॥ कहा न मानो तुम ऊदन का घटिहा बंश बनाफरराय १११ खुनस जो मनिहैं तुमतेतनको कनउज शहर लेयँ लुटवाय ॥ बेनचकवै के नाती हौ चाकर साथ कन्नौजीराय ११२ तुम्हरी हीनी नीकि न लागै ताते साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें पृथीराज की बोला फेरि कन्नौजीरायं ११३ चढ़िकै आयन ऊदन सँगमा ना अब घाटि करैं महराज ॥ पारस पत्थर कै गिन्ती ना जो मिलिजाय इन्द्रको राज ११४ तबहूँ लाखनि कहि बदलैंना ओ महराज पिथौराराय ॥ बदला लेवे संयोगिनि का ताते गयन यहाँपर आय ११५ सुनिकै बातें लखराना की माहिल बोला बचन उदार ॥ गहौ कमानियाँ अब हाथे सों राजा दिल्ली के सरदार ११६ डारि कमानियाँ गल लाखनिके अबहीं कैदलेउ करवाय ॥ ओठे मुखकी ई बातें ना जैसे कहै कन्नौजीराय ११७