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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

१२ आल्हाखण्ड । ५०४ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा लीन कमान उठाय ॥ त्यही समैया त्यहि औसरमा रूपन गये नदीपर आय ११८ पानी देखें रक्त वर्ण सब रूपन गये बहुत चक्राय ॥ ऊंची टिकुरी चढ़ि देखतभे चहुँदिशिरुण्डपैरौंदिखराय ११९ पनी पियायो तहँ घोड़े का झावर गयो तड़ाका आय ॥ जहँना तम्बू था द्यावलिका रूपन अटा तड़ाकाधाय १२० द्वारे ठाढ़ी द्यावलि माता रूपन बोला बचन सुनाय ॥ पनी पियावन हम नदी गे तहँ विपरीतपरा दिखराय १२१ हमरे मनते यह आवति है नदिया जुझे कन्नौजीराय ॥ खबरि मँगावो तुम लाखनिकै हमरे धीर धरा ना जाय १२२ इतना सुनिकै द्यावलि माता आल्हा पास पहुँची जाय ॥ खबरि सुनाई सब आल्हाको रूपनगयो जौनबतलाय १२३ बारह रानिन का इकलौता ऊदन लाये ताहि लिवाय ॥ होय हँसौवा सब दुनिया मा जोमरिगेयकन्नौजीराय १२४ सातलाख सों चढ़ा पिथौरा देवो उदयसिंह पठवाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता काह गयी बौराय १२५ गाँजर उसरीथी ऊदन की नदिया लड़ें कन्नौजीराय ॥ कछु नहिं जानैं आल्हा ठाकुर माता साँच दीन बतलाय १२६ नाहिं हँसौवा का डर राखैं प्यारो मोर लहुरवाभाय ॥ जो कहुँ जुझिहैं उदयसिंहजी तौहमकाहकरबफिरिमाय १२७ सुनिकै बातें ये आल्हा की द्यावलि उठी तड़ाका धाय ॥ जहँना तम्बूथा ऊदन का माता अटी तहाँपर आय १२८ आवत दीख्यो जब माता को ऊदन गहा दऊपद जाय ॥ आदर करिकै महतारी का उत्तमआसन दीन बिछाय १२६

[Header] नदीबेतवाकासमर। ५०५ १३

धूप दीप अरु अक्षत चन्दन पूजन हेतु लीन मँगवाय ॥ नदी बेतवा का जल लै कै धोये चरण बनाफरराय १३० विधिवत पूजनकरि माताका बोला फेरि लखुरवाभाय ॥ हुकुम जो पावैं महतारी का सो करिलावैं शीशनवाय १३१ सुनिकै बातें ये ऊदन की द्यावलि बोली आँसुबहाय ॥ परे कन्नौजी हैं सँकरे मा रूपन खबरि जनाई आय १३२ जो कछु होई लखराना का देई दोष सबै संसार ॥ त्यहिते जावो तुम नदियाको बेटा उदयसिंह सरदार १३३ मैं समुझावा भल आल्हा का तिन नहिं माना कहा हमार ॥ गाँजर उसरी थी ऊदन की नदियाकनउजका सरदार १३४ तुम्है मुनासिब अब याही है जावो अवशि पूत यहिबार ॥ सुनिकै बातें ये माता की बेंदुल उपरभयो असवार १३५ गयो तड़ाका त्यहि तम्बूमा ज्यहिमा रहें बनाफरराय ॥ खबरि सुनाई सब आल्हा को दोऊहाथजोरि शिरनाय १३६ हुकुम जो पावैं हम दादा को नदिया जायँ तड़ाका धाय ॥ जयचँद तिलका ते बाचा दै लायन रहें कन्नौजीराय १३७ जियत बनाफर उदयसिंह के इनको बार न बाँकाजाय ॥ करें प्रतिज्ञा जो साँची ना तौ सबजावै धर्म नशाय १३८ सुनिकै बातें उदयसिंह की आल्हा चुप्प साधि रहिजाय। चलिभे ऊदन तब तम्बू ते दोऊहाथ जोरि शिरनाय १३६ लौटिकै आवा फिरि लश्करमा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ साजि सिपाही सब जल्दी सों ऊदन कूचदीन करवाय १४० नदीबेतवा को उतरत भा यहु रणवाघु बनाफरराय ॥ मीरासय्यद धनुवाँ तेली दोऊ परे तहाँ दिखलाय १४१

१४ आल्हखण्ड । ५०६ छाँड़े मोर्चा भागति आवैं औरौ परे नजरि सब आय ॥ दह्या बापू की ध्वनि लागी कोऊ पाँव घसीटनजाय १४२ बिना हाथ के कोऊ आवै कोऊ रोवै घाव दिखाय ॥ हाय ! गोसइयाँ दीनबन्धुकहि कोऊ सज्जन रहे मनाय १४३ यह गति दीख्यो जब क्षत्रिनकै बोले तुरत बनाफरराय ॥ सय्यद चाचा तुम बतलावो कहाँपर छूटि कनौजीराय १४४ जो कछु हैहै लाखनि जियका सबके मूड़ लेव कटवाय ॥ इतना सुनिकै सय्यद बोले मानो कही बनाफरराय १४५ तीनिसै हाथी के हलकामा अक्सर परे कनौजी जाय ॥ प्राण आपने लय हम भागे मानो कही बनाफरराय १४६ नहीं आसरा लखराना का तुमते साँच दीन बतलाय ॥ सात लाखलों फौजैं लै कै आवा आप पिथौराराय १४७ शब्द पायकै हनै निशाना त्यहिते कौन आसराभाय ॥ सुनिकै बातें ये सय्यद की ऊदन गये सनाकाखाय १४८ धनुवाँ बोला तब सय्यद ते चलिये फेरि समरको भाय ॥ हमका तुमका जयचंदराजा सौंपा रहै कनौजीराय १४९ सम्मुख जाते महाराजा के सय्यद जियत मौत है जाय ॥ इतना सुनिकै सय्यद लौटे मोर्चा गहा तड़ाका आय १५० धनुवाँ आयो फिरि मोर्चा मा औरौ शूर गये सब आय ॥ तीनिसै हाथीके हलका मा पहुँचा तुरत बनाफरराय १५१ सवैया ॥ लाखनि खोज करें बघऊदन नाहिं मिलय कहुँ ठौर ठिकाना। कूदत फाँदत मारत धावत आवत डंक बजाय निशाना॥

नदीबेतवाकासमर । ५०७ १५ शंक नहीं निरशंक फिरै यहु बंक है ठाकुर ठीक बखाना । काह बखान करै ललिते गुणवान जहान यही हम जाना १५२ बड़ा प्रतापी रणमण्डल मा ठाकुर उदयसिंह सरदार ॥ बहु दलमारा पृथीराज का नदिया बही रक्तकी धार १५३ मारत मारत दल बादल के तब लखिपरे वीर चौहान ॥ बिषधर शायक इक हाथेमा इक लोहेकी गहे कमान १५४ तहँईं दीख्यो लखराना को तब मन ठीक लीन ठहराय ॥ शब्द भेद शर हनै पिथौरा कैसे बचै कन्नौजीराय १५५ जो मरिहैं लाखनि राना तौ सब जैहैं कामनशाय ॥ जो सुनि पैहैं तिलका रानी तौ मरिजाएँ जहरकोखाय १५६ नहीं आसरा यह लाखनि का जो अब धरैं पछारी पायँ ॥ शूर शिरोमणि सबविधि साँचे हमरे मित्र कन्नौजीराय १५७ साम दाम अरु दण्ड भेद ये चारों अङ्ग नीतिके आयँ ॥ इनसों लड़िकै सज्जन क्षत्री पावैं विजय समरमें जाय १५८ यहै सोचिकै ऊदन क्षत्री आपन घोड़ दीन दौराय ॥ जहँपर हाथी पृथीराज का ऊदन अटा तड़ाका धाय १५९ हाथ जोरिकै ऊदन बोले ओ महराज पिथौराराय ॥ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जैसी करो समर में आय १६० ना चढ़ि आये जयचँद राजा ना चढ़िआये राजापरिमाल ॥ राजा राजा का रण सोहै मानो साँच बात नरपाल १६१ लड़िका लाखनि तुम्हरे आगे तिन पर कैसे गहौ कमान ॥ बातें सुनिकै बघऊदन की रहिगा चुप्प साधि चौहान १६२ ऐंड़ लगावा फिरि बेंदुल के हौदा ऊपर पहुँचाजाय ॥

३६ आल्हाखण्ड । ५०८ कलश सुबरण हौदावाला लीन्ह्यो तुरत बनाफराय १६३ स्याबासि स्याबासि कह्यो पिथौरा पाछे हाथी लीन हटाय ॥ तबै कनौजी मन शरमाने ताहर गयो बरोबरि आय १६४ लाखनि ताहर का मुर्चाभा ऊदन और चौंड़िया ज्वान ॥ धाँधू धनुवाँ कै बरणी भै सय्यद भूरूका मैदान १६५ नदी बेतवाके झावर मा बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ ऐसी नाहर कनउज वाले वैसी दिल्लीके सरदार १६६ हौदा हौदा यकमिल हैगा अंकुशभिड़ा महौतनक्यार ॥ पैदल पैदलकै बरणी भै औ असवारसाथ असवार १६७ उरई फौजै दल बादल सों बाजैं छपक छपक तलवार ॥ छुरी कटारी भाला बरछी ऊनाचलै विलाइतिक्यार १६८ तीर तमंचा के मंचा भे भाला बरछिनकेर पगार ॥ मरे कटारिन औ छूरिनके नदिया बही रक्तकी धार १६६ मुएडन केरे मुड़ चौराभे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ हिरसिंह बिरसिंह बिरियावाले दोऊ लड़ैं तहाँसरदार १७० रहिमत सहिमत द्वउ मारेगे हिरसिंह बिरसिंह के मैदान ॥ धाँधू धनुवाँ के मुर्चामा मुर्चा हारिगये चौहान १७१ लाखनि राना के मुर्चामा मरिगे दतिया कें नरपाल ॥ ताहर ठाकुर के मुर्चा मा बेटा देशराजका लाल १७२ तबलौं आये लाखनिराना तिनते फेरि चली तलवार ॥ चढ़ा कनौजी है भूरी पर यहुदलगंजनपरअसवार १७३ तीनि सिरोही ताहर मारी लाखनि लीन ढालपर वार ॥ क्रोधित ह्वैकै लाखनिराना तुरतै कीन्ह्यो गुर्जप्रहार १७४ चोट लागिगै सो घोड़ा के तुरतै भाग सहित असवार ॥

नदीबेतवाकासमर । ५०६ १७ पाछे भूरी लखराना की आगे दिल्ली राजकुमार १७५ घाट बयालस तेरह घाटी सब दल भाग पिथौरा क्यार ॥ जहँ पर तम्बू पृथीराज का पहुँचाकनउजकासरदार १७६ उतरिकै हथिनी ते भुइँ आवा तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥ यहु महराजा दिल्लीवाला तहँते कूचदीन करवाय १७७ बहुतक घोड़ा पृथीराज के लूटे तहाँ बनाफरराय ॥ बाकी तम्बू जे पिरथी के लाखनिआगिदीनलगवाय १७८ जितनी फौजैं लखराना की चन्दन बाग पहुँचीं आय ॥ दिल्ली पहुँचे दिल्ली वाले धावन गयो बेतवाधाय १७६ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा धावन खबरि जनाई जाय ॥ सुनिकै बातैं मुख धावन की आल्हा कूचदीन करवाय १८० बाजत डंका अहतंका के चन्दन बाग पहुँचे आय ॥ यकादिशि तम्बू है आल्हा का दुसरी तरफ कनौजीराय १८१ बाजैं डंका अहतंका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥ गा हरिकारा मोहबेवाला बैठे जहाँ चंदेलेराय १८२ खबरि सुनाई सब पिरथी की जाविधि कूचदीन करवाय ॥ जैसे आये चन्दन बगिया दूनों भाय बनाफरराय १८३ करणी वरणी सब लाखनि कै धावन बार बार शिरनाय ॥ सुनी वीरता लखराना की भे मन खुशी चँदेलेराय १८४ ब्रह्मा ठाकुर को बुलवायो औ सबहाल कह्यो समुझाय ॥ तुरत महोबा को सजवावो देखन आवैं कनौजीराय १८५ सुनिकै बातैं ब्रह्मा ठाकुर लीन्ह्यो कोतवाल बुलवाय ॥ कहि समुझायो कोतवाल को मोहबा तुरत देउसजवाय १८६ इतना कहिकै ब्रह्मा चलिभे मल्हना महल पहुँचे जाय ॥

१८ आल्हखण्ड । ५१० कही वीरता लखराना की ब्रह्मा बार बार तहँ गाय १८७ चन्दन बगिया डेरा परिगा पिरथी कूच दीन करवाय ॥ इतना सुनिकै रानी मल्हना तुरतै दीन्ह्यो हुकुम लगाय १८८ सजो मोहोबा चौगिर्दा ते हाटक नये करौ तय्यार ॥ हुकुम पायकै महरानी का मोहबा सजन लाग त्यहिवार १८६ पुती दिवालैं गईं केसरि ते चम्चम् चमकिकरहि जाँयँ ॥ द्वार द्वार में बन्दन वारे घरघर रहे पताका छाय १६० को गति बरणै पुरवासिन कै द्वारे कलश दीन धरवाय ॥ घृतसों पूरित दीपक वारे सुन्दरि गीत रहीं सब गाय १६१ सजीं बाजारें गलियारन मा माली बैठ ठट्ट के ठट्ट ॥ चलैं कदमपर कहूँ कहूँ घोड़ा कहूँ कहूँ चलैं चाल सरपट्ट १६२ ठट्ट लागि गे तम्बोलिन के जाहिर पान मोहोवे क्यार ॥ सतर सराफाकी बैठी है सोहैं भाँति भाँतिके हार १६३ कौन बजाजा कै गति बरणै भाला वरछिन केरि बजार ॥ गमला बिरखन के गलियनमा जिनमा कोटि वृक्षरुहदार १६४ फूले बेला अलबेला कहूँ मेला लाग चमेलिन क्यार ॥ रेला आवै कहूँ नारिन के गावैं गीत मंगलाचार १६५ बारह रानी चंदेले की तिनके महल सजे त्यहिवार ॥ घरे खिलौना हैं ताखन मा पाखनवेलि बूट अधिकार १६६ सोने चांदी के जेवर को रानी करता फिरैं झनकार ॥ को गति बरणै महरानिन कै सोलो कीन तहाँ श्रृंगार १६७ हाट बाट चौहाटा सजिगे बोले तबै रजा परिमाल ॥ चलिकै लइये जगनायक जी बेटा रतीभानको लाल १६८ इतना कहिकै परिमालिक जी पलकी ऊपर भये असवार ॥

[Header] नदीबेतवाकासमर । ५११ १६

अल्हा चढ़िकै हरनागर पर तुरतै भयो तहाँ तैयार १६६ मैने सजिगो परिमालिक का तब फिरि कूचदीन करवाय ॥ जहँ पर तम्बू लखराना का तहँपर गये चंदेलेराय २०० आवत दीख्यो परिमालिक को लाखनि उठे तड़ाका धाय ॥ पकरिकै बाहू लखराना की औछातीमा लीन लगाय २०१ बैठे तम्बू मा परिमालिक आये दुऊ बनाफरराय ॥ मिलाभेंट करि सब काहुन सों सबहिनकूच दीन करवाय २०२ चला कनौजी चढ़ि भूरी पर इन्दल पपिहा पर असवार ॥ घोड़ मनोहर पर देवा चढ़ि बेंदुल उदयसिंह सरदार २०३ हिरसिंह बिरसिंह बिरिया वाले येऊ साथ भये तय्यार ॥ सिंद्धा ठाकुर परहुल वाला गंगा कुड़हरिका सरदार २०४ मीरा सय्यद बनरस वाले औरौ नृपति चले त्यहिबार ॥ ठाढ़ो हाथी पञ्चशब्दा था आल्हा तापर भये सवार २०५ द्यावलि सुनवाँ फुलवा तीनों डोलन उपर भई असवार ॥ डोला चलिभा चितरेखा का मोहवालखनलागिसरदार २०६ जौनौ गलियन जायँ कनौजी तौनी देखें नई वहार ॥ चलैं पिचका क्यहुगलियन मा कहुँकहुँहोयँफुलनकीमार २०७ कहुँ कहुँ ढोलक सारंगी ध्वनि कहुँ कहुँ बाजैं खूब सितार ॥ तबलागमकैं क्यहुगलियनमा होवै नाच पतुरियनक्यार २०८ परे पाँवड़ैहैं द्वारे मा महलन मणी करें उजियार ॥ उड़ैं कबूतर क्यहु महलन ते होवै नाच मुरैलन क्यार २०६ पिंजरा टाँगे ललमुनियन के चकस गड़े बुलबुलन केर ॥ सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरन में कहुँ कहुँ तीतर और बटेर २१० को गति बरणै त्यहि समयाकै चकित लखैं चहुँदिशि हेर ॥

२० आल्हखण्ड । ५१२ चारहु राजा गाँजर वाले बारह कुँवर बनौधाकेर २११ इन के सँगमा लाखनि राना मल्हना द्वार पहुँचे आय ॥ कीनि आरती चन्द्रावलि तहँ भीतरगये कनौजीराय २१२ संग पतोहुन को लै कै फिरि द्यावलिगर्ड तड़ाका धाय ॥ आल्हा ऊदन इन्दल तीनों येऊ फेरि पहुँचेजाय २१३ बड़ी कसमसि भै महलन मा बैठ सबै महा सुखपाय ॥ बारहु रानी परिमालिक की मल्हनामहल गईसबआय २१४ बड़ी खुशाली भै मल्हना के फूले अङ्ग न सकै समाय ॥ बेटी बोली चन्द्रावलि तब मानों साँच लहुरवाभाय २१५ जबते छाँड़्यो नगर मोहोबा जबते मरे बीर मलखान ॥ तबते ईजति ये ताके हैं लुच्चा दिल्ली के चौहान २१६ जोना अवतिउ ऊदन भैया पिरथी लूटि लेत करवाय ॥ धर्म रखैया सब मोहवे के युगयुगजियौबनाफरराय २१७ सुनिकै बातें चन्द्रावलि की ऊदन कहा बहुत समुझाय ॥ काहहकीकति थी पिरथी की मोहबाशहर लेत लुटवाय २१८ मिला भेंट करि सब काहुन सों सबहिन कूच दीन करवाय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक की आल्हा सहित पहुँचेआय २१९ खातिर कीन्ह्यो परिमालिक ने बैठे तहँ कनौजीराय ॥ राजा बोले तब आल्हा ते हमपरदया दीन बिसराय २२० जबै बनाफर तुम मोहबेगे तबहीं चढ़ा पिथौराराय ॥ जूझिग ठाकुर सिरसावाला बिपदा गई मोहोबे आय २२१ इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों साँच बचन महराज ॥ सुनी तलाकें जब तुम्हरी हम मानो गिरी उपरते गाज २२२ माहिल भूपतिकी चुगुली सुनि हमरी देश निकासी कीन ॥

[Header] नदीबेतवाकासमर । ५१३ २१

जूझिगे ठाकुर सिरसा वाले तबहूं खबरि आपनहिं लीन २२३ खबरि जो पावत मलखाने की दिल्ली शहर देत फुकवाय ॥ चढ़िकै मारत हम पिरथी का साँची सुनो चँदेलेराय २२४ द्यावलि बिरमा सम माता ना ना जग भायसरिस मलखान ॥ ब्रह्मा ठाकुर के ब्याहे मा हाथी द्वार पछारा ज्वान २२५ पहिलि लड़ाई मै माड़ौगढ़ दूसर नैनागढ़ मैदान ॥ तिसरि लड़ाई मै पथरीगढ़ ब्याहे गये तहाँ मलखान २२६ चौथि लड़ाई मै दिल्ली मा पाँचो नरवर का मैदान ॥ इन्दल ब्याह हरण छठयें मा तहँपर भयो घोर घमसान २२७ सतौं लड़ाई मै बौरीगढ़ आठों बूँदी का मैदान ॥ नव दश बार लड़े रण नाहर तब मरिगये बीर मलखान २२८ भुजा टूटिगै इक आल्हा की हैंगा बली बीर चौहान ॥ स्वप्ना हैगे अब दुनिया मा हमका आजु बीरमलखान २२६ यहु दुख पावा तुम्हरी दिशि ते मानो साँच चँदेलेराय ॥ सवन चिरैया ना घर छोड़ै नानिजरा बणिजकोजाय २३० मोहिं निकारा तब मोहबे ते तुम्हरो काह बिगारा भाय ॥ जेयत मोहोबे हम आइत ना जो ना चढ़त पिथौरा धाय २३१ पाल्यो पोष्यो लरिकाई ते ताते लाज दीन बिसराय ॥ दूध पियायो मल्हना रानी तब यह रुजिया लहु रखा भाय २३२ अस समुझायो मोहिं माता जब तब सब क्रोध दीन बिसराय ॥ सुनिकै बातें ये आल्हा कीं कायल भये चँदेलेराय २३३ तबै बनाफर उदयसिंह जीं बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥ सुखसों सोवो अब मोहबे मा करिहै काह पिथौराराय २३४ जो कछु हैगा पाछे परिगा अब आगे का करो विचार ॥

२२ आल्हखण्ड । ५१४ इतना सुनिकै परिमालिकजी लागे करन मंगलाचार २३५ सवैया ॥ मोद अपार बढ़यो त्यहि वार सो यार सँभार रह्यो कछु नाहीं। पैरको भूषण हाथन धारि सो हाथको भूषण पैरन माहीं ॥ हाथ मिलावत धावत आवत गावत गीत डरे गलबारीं। कौन सों मारग ऐसो तहाँ सो जहाँ ललिते सुखपावत नाहीं २३६ बड़ा मोदभा पुर महलन मा टहलन नेक न लागी वार ॥ आल्हा ऊदन लाखनि ठाकुर सबहिनखूबकीनज्यौंवनार २३७ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीनपरचाय २३८ परे आलसी खटिया तकितकि घों घों करउ रहे घर्ाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुन्शी सुत जीवो प्रागनरायण भाय २३६ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २४० माथ नवावों पितु माता को देवी देव सरिस औतार ॥ सेवा करिकै पितु माताकी सरवन पूत भयो भवपार २४१ औरौ गाथा रघुनाथा की कहिगे बालमीकि बिस्तार ॥ पूरण ब्रह्म आदि पुरुषोत्तम स्वामी रामचन्द्र अवतार २४२ अब बदनामी का डर नाहीं होवो रामचन्द्र भत्तार ॥ शरण तुम्हारी हम ताके हैं दर्शन चहैं नाथ यहिवार २४३ पगड़ी हमरी अब अरुझी है सो सुरझाय-देव रघुनाथ ॥ कितनो पापी कलियुग करि है तबहूँ धरों चरण में माथ २४४ माता भ्राता त्राता ताता नाता एक ठीक रघुनाथ ॥

नदीबेतवाकासमर। ५१५ २३ स्वारथ साथी सब दुनिया है कासों करों जगतमें साथ २४५ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को ह्याँते करों तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त २४६ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्र वंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतनदीबे- तवायुद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः॥ १ ॥ नदीबेतवाकायुद्धसमाप्त ॥ इति ॥

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॥श्री गणेशाय नमः॥ अथ आल्हखण्ड ॥ ठाकुरउदयसिंहजीकाहरणवर्णन ॥ सवैया ॥ बज्रसे अंग ओ बानर हय अरु बीरन में बलवान महा । रणमण्डल कोउ न जाय सकै ज्यहि ठौर जबै यहु बीर रहा ॥ सप्त समुन्दर नाँघि अगाध दशकन्धर को पुर जाय दहा । आयहु फेरि जबै लखिते रघुनाथ ते साँच हवाल कहा १ सुमिरन ॥ तुम्हैं बहादुर मैं ध्यावत हौं अञ्जनि पूत वीर हनुमान ॥ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ नितप्रतिकरौं चरणकोध्यान १ सरबरि तुम्हरी का दुनिया मा दूसर कौन बहादुर ज्वान ॥ शरण तुम्हारी मा आयन है साँचे वीर बली हनुमान २ गदा प्रहारी हे असुरारी मारी दुष्ट लङ्किनी नारि ॥ पर्शंत पाँयन मकरी तरिगै लायो पर्वत श्रृंग उखारि ३ बड़े पियारे रघुनन्दन के वन्दन करौं जोरि दोउ हाथ ॥ अक्षत चन्दन धूप दीप सों पूजन करौं मानसी नाथ ४

२ आल्हखण्ड । ५१८ करो मनोरथ पूरण हमरे सबविधि माननीय हनुमान ॥ छूटि सुमिरनी गै हनुमत कै ऊदन हरण सुनो अब ज्वान ५ अथ कथाप्रसंग ॥ 'एक समैया की बातें हैं परिगै पर्व दशहरा आय ॥ सुनवाँ बोली तब ऊदन ते साँची सुनो बनाफरराय १ मोरि लालसा यह डोलति है मज्जन करों बिठूरै जाय ॥ आयसु लैके तुम दादा की देवर मोहिं देउ हनवाय २ यह मन भायगई ऊदन के आल्हा महल पहुँचे जाय ॥ हाथ जोरि अरु बिनती करिकै बोला तहाँ लहुरवाभाय ३ सुनवाँ भौजी की इच्छा है हमको गंग देउ हनवाय ॥ आयसु पावैं जो दादा की तौ हम जायँ बिठूरै धाय ४ इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों साँच लहुरवा भाय ॥ देश देश.के राजा अइहैं करिहौं कलह तहाँपर जाय ५ त्यहिते बैठो घर अपने मा ऊदन साँच दीन बतलाय ॥ पर्व दशहरा की फिरि अइहै औरे साल हनायो जाय ६ इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा सुनो बनाफरराय ॥ पगिया हमरी कछु अरुझीना जो तहँ रारि मचैवे जाय ७ बाचा हारे हम भौजी ते तुमको गंग देब हनवाय ॥ मोहिं भरोसा है दादा को करिहौ पूर मनोरथ भाय ८ बातें सुनिकै बघऊदन की दीन्ह्यो हुकुम बनाफरराय ॥ 'हुकुम पायकै ऊदन ठाकुर लीन्हीं तुरत फौज सजवाय ६ सजी पालकी तहँ ठाढ़ी थीं सुनवाँ फुलवा भई सवार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया औ जगनायक भयो तयार १० सवालाख दल ऊदन लैके तुरतै कूच दीन करवाय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५१६ ३ बाजैं डंका अह्तंका के हाहाकार शब्द गा छाय ११ आठ रोजकी मैजलि करिकै पहुँचा तहाँ बनांफरराय ॥ तम्बू गड़िगा तहँ ऊदन का भारी ध्वजा रहा फहराय १२ सुभिया बेड़िनि झुन्रागढ़ ते पहुँची सबऊ बिठूरै जाय ॥ करै तमाशा सो तम्बुन में पावै द्रव्य तहाँ अधिकाय १३ जहँपर तम्बू था ऊदन का - सुभिया तहाँ पहुँची आय ॥ रूप देखिकै बघऊदन का दीन्ह्यो नाच रंग बिसराय १४ कछु नहिं भावै सुभिया मनमा ठगिनी भई तहाँपर आय ॥ औरी नटिनी सँग जे आईं तिनका नाच दीनकरवाय १५ अपना बैठे तहँ सोचति है कैसे मिलैं बनाफरराय ॥ जादू डारौं जो ऊदन पर तबहुँन काजसिद्धदिखलाय १६ जाहिर जादू मा सुनवाँ है हमरे जाय प्राण पर आय ॥ मनमा सोचै मनै बिसूरै मनमा बार बार पछिताय १७ डारि मोहनी दी लश्कर मा जेवर डिब्बा लीन उठाय ॥ दीन रुपैया ऊदन ठाकुर नटिनिन कूचदीन करवाय १८ चढ़ीं पालकी सुनवाँ फुलवा गंगा उपर पहुँचीं जाय ॥ मज्जन कीन्ह्यो उदयसिंह तहँ विप्रनदानदीन अधिकाय १९ मज्जन कीन्ह्यो जगनायक जी प्रातःकृत्य कीन हर्षाय ॥ दान मान दै सब विप्रन को सबहिन कूचदीनकरवाय २० लखा तमाशा औ मेला खुब तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ उखरि ग तम्बू फिरि ऊदन का लश्कर कूच दीन करवाय २१ बाजैं डंका अह्तंका के हाहाकार शब्द गे छाय ॥ अस्त दिवाकर जब पश्चिम भे तम्बूदीन तहाँ गड़वाय २२ उत्तम नदिया हैं यमुनाजी उतरे जहाँ बनाफरराय ॥

१ आल्हखण्ड । ५२० डिब्बा दीख्यो नहिं जेवर को सुनवाँ गई सनाकाखाय २३ तुरत बनाँफर उदयसिंह को अपने पास लीन बुलवाय ॥ कहि समुझावा तहँ ऊदन ते डिब्बा नहीं परै दिखलाय २४ एक लाख का सब गहना है कैसी करैं बनाफरराय ॥ डिब्बा भूलाहै बिठूर मा मोको याद भयो यहँ आय २५ काह बतावों मैं देवर ते करिये कैसो कौन उपाय ॥ धीरज राखो अपने मनमा बोले वचन ल्हुरवाभाय २६ तुरत बुलायो जगनायक को औ सब हाल कह्यो समुझाय ॥ हम तो जावत हैं बिठूर को तुम अब कूचजाउ करवाय २७ यह मन भायगई जगना के ऊदन गये बिठूरै आय ॥ कैयो दिनका धावा करिकै जगना अटा मोहोबे जाय २८ रहा न मेला कछु लौटेमा सिरकी पाल परे दिखराय ॥ तिनमा नटिनी औ नट ठहरे गे तिन पास बनाफरराय २६ सुभिया दीख्यो जब ऊदन का भै मन खुशी तबै अधिकाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ ठाकुर हाल देउ बतलाय ३० सुनिकै बातें ये सुभिया की बोले फेरि बनाफरराय ॥ नगर मोहोबा के हम ठाकुर आयन आजु बिठूर नहाय ३१ जब तुम नाचन गइ तम्बूमा गहनो गयो हमार हिराय ॥ पतालगावन त्यहि आयन है तुमते साँच दीन बतलाय ३२ इतना सुनिकै सुभिया बोली मानो साँच बनाफरराय ॥ पँसासारी हमते खेलो हम फिरि पतादेवलगवाय ३३ खेल पसारा सुभिया बेड़िनि बैठे तहाँ ल्हुरवाभाय ॥ जुआँ युद्धसों साँचे क्षत्री कबहूँ न धरैं पछारी पाँय ३४ नल औ पुष्कल आगे खेल्यो झेल्योदुःख नृपति अधिकाय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२१ ५ भारी गाथा नलराजा की देखो महाभारत में जाय ३५ द्वापर शकुनी के सँग खेल्यो कुन्ती पुत्र युधिष्ठिरराय ॥ हारि द्रौपदी महाराजा गे खैंचा चीर दुशासन आय ३६ मानिकै शासन दुर्योधन का पहुँचे बनोवास फिरिजाय ॥ काटिकै संकट महाराज सब कीन्हेनि महाभारत फिरि आय ३७ यहु दुखदाई पंसासारी खेलन लागि बनाफरराय ॥ जादू डारी सुभिया बेड़िनि भे तब सुवा लहुरवा भाय ३८ डारिकै पिंजरा मा ऊदन का सुभिया कूच दीन करवाय ॥ जायकै पहुँची फिरि दिल्ली मा जहँ पर बसैं पिथौरा राय ३६ जहाँ कचहरी दिल्लीपतिकी सुभिया गई यतन सों धाय ॥ करी बन्दगी महाराजा को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४० सुभिया बोली फिरि पिरथी ते राजन साँच देयँ बतलाय ॥ डारिकै जादू हम ऊदन पर औ मेला ते लई चुराय ४१ पै डर हमरे है आल्हा का स्वामी जगा देउ बतलाय ॥ डारिकै सिरकी हम दिल्ली मा निर्भय बसी पिथौरा राय ४२ इतना सुनिकै पिरथी बोले सुभिया कूच देउ करवाय ॥ जो सुनिपै हैं आल्हा ठाकुर हम ते रारि मचै हैं आय ४३ इतना सुनिकै सुभिया चलिभै डेरन फेरि पहुँची आय ॥ कूच करावा फिरि दिल्ली ते सब दरबार भँझावा जाय ४४ कहूँ ठिकाना जब लाग्योना सुन्नागढ़ै गयी तब धाय ॥ जहाँ कचहरी गजराजा की सुभिया तहाँ पहुँची जाय ४५ हाथ जोरिकै महाराजा के आपन हाल दीन बतलाय ॥ जगा चाहती हम सुन्नागढ़ यह इककाज हमारो आय ४६ इतना सुनिकै राजा बोले सुभिया कूच जाउ करवाय ॥

६ , आल्हखण्ड । ५२२ जो सुनि पै हैं आल्हा ठाकुर हमते रारि मचै हैं आय ४७ सुनिकै बातें गजराजा की सुभिया कूच दीन करवाय ॥ झारखण्ड के फिरि जंगल मा डेराजाय दीन गड़वाय ४८ चौकी पहरा करि जादू के निर्भय बसी तहाँ सुखपाय ॥ सुनवाँ सोचै ह्याँ महलन मा आये नहीं लहुरा भाय ४६ पता लगावों मैं ऊदन का जावों देश देश को धाय ॥ यहै सोचिकै रानी सुनवाँ चिल्हियाबनीसरगमड़राय ५० पहिले ढूँढ़ा त्यहि बिठूर का पाछे गयी कामरू धाय ॥ सिलहट बिजहट मौरँग भुन्ता दिल्लीशहरलखा फिरिजाय ५१ पता न पायो जब ऊदन का पहुँची झारखण्ड में आय ॥ तहाँ पै डेराहैंड बेड़िनि के सुनवाँ बैठि बरगदे जाय ५२ पेड़ बरगदा के नीचे मा सुभिया पलँग लीन बिछवाय ॥ लैकै पिंजरा फिरि सुवना का मानुष तुरतै दीन बनाय ५३ खेलै चौपरि सँग ऊदन के सुभिया बोली बचन सुनाय ॥ व्याह हमारे सँगमा करिये मानो कही बनाफरराय ५४ भजिये अल्ला बिसमिल्ला को ऊदन रटो खुदाय खुदाय ॥ तब सुख पैहौ तुम देहीं का नाहीं खाल लेउँ खिचवाय ५५ खुदा खैरियत तुम्हरी करि हैं बिसमिल भलाकरी सबकाल ॥ बाबा आदम संकट टारी मेटी अली भली जंजाल ५६ बातें सुनिकै ये बेड़िनि की बोला देशराज का लाल ॥ खुदा खुदाई चहु दिखलावैं बिसमिलआयजायँततकाल५७ ऊदन व्याहैं नहिं बेड़िनि को कबहूँ राम नाम बिसराय ॥ देश आरिया के क्षत्री हम कैसे मुसलमान ह्वैजायँ ५८ जब छुइजावैं मुसलमान को तबहीं तुरत करें अस्नान ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२३ ७ बेवश हैकै पिंजरा आयन ताते छूटिगयो सब मान ५६ पढ़ै फारसी हम बिद्या ना अपनौ धर्म करैं प्रतिपाल ॥ नित प्रति ध्यावैं रघुनन्दन को पूरणब्रह्म सुरासुर पाल ६० खाल न रहै जो देहीमा केवल प्राण करैं विश्राम ॥ तबहूँ मुख सों ऊदन ठाकुर कवहूँ न लेयँ खुदाको नाम ६१ निर्भय बातें सुनि ऊदन की बरगद डार दीन टँगवाय ॥ बहुतक बाँसन हनि हनि मारा ऊदन जपो खुदाय खुदाय ६२ सुनिकै बातें ये सुमिया की बोला फेरि बनाफरराय ॥ ऊदन ब्याहैं नहिं बेड़िनि को कवहूँ राम नाम बिसराय ६३ बात न दूसरि हम अब कहिबे चहु तन धजीधजीउड़िजाय ॥ ऊदन ब्याहैं नहिं बेड़िनि को कवहूँ राम नाम बिसराय ६४ सुनिकै बातें उदयसिंह की तुरतै सुवना लीन बनाय ॥ डारिकै पिंजरामा ऊदन का टाँगा फेरि बरगदा आय ६५ देखि दुर्दशा यह ऊदन की सुनवाँ बार बार पछिताय ॥ डारि मशान दियो सुनवाँ ने पाछे पिंजरा लीन उठाय ६६ लैकै पिंजरा कछु दूरी मा सुनवाँ गई तड़ाका धाय ॥ सुवना लैकै फिरि पिंजरा ते मानुष तुरतै दीन बनाय ६७ सुनवाँ बोली फिरि ऊदन ते क्यों नहिं देवर जपो खुदाय ॥ काहे बिज्में तुम बेड़िनि में नित प्रति सहौ बाँसके घाय ६८ चलिये देवर अब मोहबे को तुम्हरी बार बार बलिजायँ ॥ सुनिकै बातें ये सुनवाँ की बोले फेरि बनाफर राय ६९ चोरी चोरा ना हम जैहैं तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ लैकै फौजैं दादा आवैं हमरी कैद लेयँ छुड़वाय ७० ऐसे ऊदन अब जैहैं ना नित प्रति सहैं बाँसके घाय ॥