भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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१८ आल्हखण्ड । ५१० कही वीरता लखराना की ब्रह्मा बार बार तहँ गाय १८७ चन्दन बगिया डेरा परिगा पिरथी कूच दीन करवाय ॥ इतना सुनिकै रानी मल्हना तुरतै दीन्ह्यो हुकुम लगाय १८८ सजो मोहोबा चौगिर्दा ते हाटक नये करौ तय्यार ॥ हुकुम पायकै महरानी का मोहबा सजन लाग त्यहिवार १८६ पुती दिवालैं गईं केसरि ते चम्चम् चमकिकरहि जाँयँ ॥ द्वार द्वार में बन्दन वारे घरघर रहे पताका छाय १६० को गति बरणै पुरवासिन कै द्वारे कलश दीन धरवाय ॥ घृतसों पूरित दीपक वारे सुन्दरि गीत रहीं सब गाय १६१ सजीं बाजारें गलियारन मा माली बैठ ठट्ट के ठट्ट ॥ चलैं कदमपर कहूँ कहूँ घोड़ा कहूँ कहूँ चलैं चाल सरपट्ट १६२ ठट्ट लागि गे तम्बोलिन के जाहिर पान मोहोवे क्यार ॥ सतर सराफाकी बैठी है सोहैं भाँति भाँतिके हार १६३ कौन बजाजा कै गति बरणै भाला वरछिन केरि बजार ॥ गमला बिरखन के गलियनमा जिनमा कोटि वृक्षरुहदार १६४ फूले बेला अलबेला कहूँ मेला लाग चमेलिन क्यार ॥ रेला आवै कहूँ नारिन के गावैं गीत मंगलाचार १६५ बारह रानी चंदेले की तिनके महल सजे त्यहिवार ॥ घरे खिलौना हैं ताखन मा पाखनवेलि बूट अधिकार १६६ सोने चांदी के जेवर को रानी करता फिरैं झनकार ॥ को गति बरणै महरानिन कै सोलो कीन तहाँ श्रृंगार १६७ हाट बाट चौहाटा सजिगे बोले तबै रजा परिमाल ॥ चलिकै लइये जगनायक जी बेटा रतीभानको लाल १६८ इतना कहिकै परिमालिक जी पलकी ऊपर भये असवार ॥