भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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नदीबेतवाकासमर । ५०६ १७ पाछे भूरी लखराना की आगे दिल्ली राजकुमार १७५ घाट बयालस तेरह घाटी सब दल भाग पिथौरा क्यार ॥ जहँ पर तम्बू पृथीराज का पहुँचाकनउजकासरदार १७६ उतरिकै हथिनी ते भुइँ आवा तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥ यहु महराजा दिल्लीवाला तहँते कूचदीन करवाय १७७ बहुतक घोड़ा पृथीराज के लूटे तहाँ बनाफरराय ॥ बाकी तम्बू जे पिरथी के लाखनिआगिदीनलगवाय १७८ जितनी फौजैं लखराना की चन्दन बाग पहुँचीं आय ॥ दिल्ली पहुँचे दिल्ली वाले धावन गयो बेतवाधाय १७६ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा धावन खबरि जनाई जाय ॥ सुनिकै बातैं मुख धावन की आल्हा कूचदीन करवाय १८० बाजत डंका अहतंका के चन्दन बाग पहुँचे आय ॥ यकादिशि तम्बू है आल्हा का दुसरी तरफ कनौजीराय १८१ बाजैं डंका अहतंका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥ गा हरिकारा मोहबेवाला बैठे जहाँ चंदेलेराय १८२ खबरि सुनाई सब पिरथी की जाविधि कूचदीन करवाय ॥ जैसे आये चन्दन बगिया दूनों भाय बनाफरराय १८३ करणी वरणी सब लाखनि कै धावन बार बार शिरनाय ॥ सुनी वीरता लखराना की भे मन खुशी चँदेलेराय १८४ ब्रह्मा ठाकुर को बुलवायो औ सबहाल कह्यो समुझाय ॥ तुरत महोबा को सजवावो देखन आवैं कनौजीराय १८५ सुनिकै बातैं ब्रह्मा ठाकुर लीन्ह्यो कोतवाल बुलवाय ॥ कहि समुझायो कोतवाल को मोहबा तुरत देउसजवाय १८६ इतना कहिकै ब्रह्मा चलिभे मल्हना महल पहुँचे जाय ॥