भारतकोश
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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

नदीबेतवाकासमर । ५०६ १७ पाछे भूरी लखराना की आगे दिल्ली राजकुमार १७५ घाट बयालस तेरह घाटी सब दल भाग पिथौरा क्यार ॥ जहँ पर तम्बू पृथीराज का पहुँचाकनउजकासरदार १७६ उतरिकै हथिनी ते भुइँ आवा तम्बू तुरत दीन गड़वाय ॥ यहु महराजा दिल्लीवाला तहँते कूचदीन करवाय १७७ बहुतक घोड़ा पृथीराज के लूटे तहाँ बनाफरराय ॥ बाकी तम्बू जे पिरथी के लाखनिआगिदीनलगवाय १७८ जितनी फौजैं लखराना की चन्दन बाग पहुँचीं आय ॥ दिल्ली पहुँचे दिल्ली वाले धावन गयो बेतवाधाय १७६ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा धावन खबरि जनाई जाय ॥ सुनिकै बातैं मुख धावन की आल्हा कूचदीन करवाय १८० बाजत डंका अहतंका के चन्दन बाग पहुँचे आय ॥ यकादिशि तम्बू है आल्हा का दुसरी तरफ कनौजीराय १८१ बाजैं डंका अहतंका के हाहाकार शब्द गा छाय ॥ गा हरिकारा मोहबेवाला बैठे जहाँ चंदेलेराय १८२ खबरि सुनाई सब पिरथी की जाविधि कूचदीन करवाय ॥ जैसे आये चन्दन बगिया दूनों भाय बनाफरराय १८३ करणी वरणी सब लाखनि कै धावन बार बार शिरनाय ॥ सुनी वीरता लखराना की भे मन खुशी चँदेलेराय १८४ ब्रह्मा ठाकुर को बुलवायो औ सबहाल कह्यो समुझाय ॥ तुरत महोबा को सजवावो देखन आवैं कनौजीराय १८५ सुनिकै बातैं ब्रह्मा ठाकुर लीन्ह्यो कोतवाल बुलवाय ॥ कहि समुझायो कोतवाल को मोहबा तुरत देउसजवाय १८६ इतना कहिकै ब्रह्मा चलिभे मल्हना महल पहुँचे जाय ॥

१८ आल्हखण्ड । ५१० कही वीरता लखराना की ब्रह्मा बार बार तहँ गाय १८७ चन्दन बगिया डेरा परिगा पिरथी कूच दीन करवाय ॥ इतना सुनिकै रानी मल्हना तुरतै दीन्ह्यो हुकुम लगाय १८८ सजो मोहोबा चौगिर्दा ते हाटक नये करौ तय्यार ॥ हुकुम पायकै महरानी का मोहबा सजन लाग त्यहिवार १८६ पुती दिवालैं गईं केसरि ते चम्चम् चमकिकरहि जाँयँ ॥ द्वार द्वार में बन्दन वारे घरघर रहे पताका छाय १६० को गति बरणै पुरवासिन कै द्वारे कलश दीन धरवाय ॥ घृतसों पूरित दीपक वारे सुन्दरि गीत रहीं सब गाय १६१ सजीं बाजारें गलियारन मा माली बैठ ठट्ट के ठट्ट ॥ चलैं कदमपर कहूँ कहूँ घोड़ा कहूँ कहूँ चलैं चाल सरपट्ट १६२ ठट्ट लागि गे तम्बोलिन के जाहिर पान मोहोवे क्यार ॥ सतर सराफाकी बैठी है सोहैं भाँति भाँतिके हार १६३ कौन बजाजा कै गति बरणै भाला वरछिन केरि बजार ॥ गमला बिरखन के गलियनमा जिनमा कोटि वृक्षरुहदार १६४ फूले बेला अलबेला कहूँ मेला लाग चमेलिन क्यार ॥ रेला आवै कहूँ नारिन के गावैं गीत मंगलाचार १६५ बारह रानी चंदेले की तिनके महल सजे त्यहिवार ॥ घरे खिलौना हैं ताखन मा पाखनवेलि बूट अधिकार १६६ सोने चांदी के जेवर को रानी करता फिरैं झनकार ॥ को गति बरणै महरानिन कै सोलो कीन तहाँ श्रृंगार १६७ हाट बाट चौहाटा सजिगे बोले तबै रजा परिमाल ॥ चलिकै लइये जगनायक जी बेटा रतीभानको लाल १६८ इतना कहिकै परिमालिक जी पलकी ऊपर भये असवार ॥

[Header] नदीबेतवाकासमर । ५११ १६

अल्हा चढ़िकै हरनागर पर तुरतै भयो तहाँ तैयार १६६ मैने सजिगो परिमालिक का तब फिरि कूचदीन करवाय ॥ जहँ पर तम्बू लखराना का तहँपर गये चंदेलेराय २०० आवत दीख्यो परिमालिक को लाखनि उठे तड़ाका धाय ॥ पकरिकै बाहू लखराना की औछातीमा लीन लगाय २०१ बैठे तम्बू मा परिमालिक आये दुऊ बनाफरराय ॥ मिलाभेंट करि सब काहुन सों सबहिनकूच दीन करवाय २०२ चला कनौजी चढ़ि भूरी पर इन्दल पपिहा पर असवार ॥ घोड़ मनोहर पर देवा चढ़ि बेंदुल उदयसिंह सरदार २०३ हिरसिंह बिरसिंह बिरिया वाले येऊ साथ भये तय्यार ॥ सिंद्धा ठाकुर परहुल वाला गंगा कुड़हरिका सरदार २०४ मीरा सय्यद बनरस वाले औरौ नृपति चले त्यहिबार ॥ ठाढ़ो हाथी पञ्चशब्दा था आल्हा तापर भये सवार २०५ द्यावलि सुनवाँ फुलवा तीनों डोलन उपर भई असवार ॥ डोला चलिभा चितरेखा का मोहवालखनलागिसरदार २०६ जौनौ गलियन जायँ कनौजी तौनी देखें नई वहार ॥ चलैं पिचका क्यहुगलियन मा कहुँकहुँहोयँफुलनकीमार २०७ कहुँ कहुँ ढोलक सारंगी ध्वनि कहुँ कहुँ बाजैं खूब सितार ॥ तबलागमकैं क्यहुगलियनमा होवै नाच पतुरियनक्यार २०८ परे पाँवड़ैहैं द्वारे मा महलन मणी करें उजियार ॥ उड़ैं कबूतर क्यहु महलन ते होवै नाच मुरैलन क्यार २०६ पिंजरा टाँगे ललमुनियन के चकस गड़े बुलबुलन केर ॥ सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरन में कहुँ कहुँ तीतर और बटेर २१० को गति बरणै त्यहि समयाकै चकित लखैं चहुँदिशि हेर ॥

२० आल्हखण्ड । ५१२ चारहु राजा गाँजर वाले बारह कुँवर बनौधाकेर २११ इन के सँगमा लाखनि राना मल्हना द्वार पहुँचे आय ॥ कीनि आरती चन्द्रावलि तहँ भीतरगये कनौजीराय २१२ संग पतोहुन को लै कै फिरि द्यावलिगर्ड तड़ाका धाय ॥ आल्हा ऊदन इन्दल तीनों येऊ फेरि पहुँचेजाय २१३ बड़ी कसमसि भै महलन मा बैठ सबै महा सुखपाय ॥ बारहु रानी परिमालिक की मल्हनामहल गईसबआय २१४ बड़ी खुशाली भै मल्हना के फूले अङ्ग न सकै समाय ॥ बेटी बोली चन्द्रावलि तब मानों साँच लहुरवाभाय २१५ जबते छाँड़्यो नगर मोहोबा जबते मरे बीर मलखान ॥ तबते ईजति ये ताके हैं लुच्चा दिल्ली के चौहान २१६ जोना अवतिउ ऊदन भैया पिरथी लूटि लेत करवाय ॥ धर्म रखैया सब मोहवे के युगयुगजियौबनाफरराय २१७ सुनिकै बातें चन्द्रावलि की ऊदन कहा बहुत समुझाय ॥ काहहकीकति थी पिरथी की मोहबाशहर लेत लुटवाय २१८ मिला भेंट करि सब काहुन सों सबहिन कूच दीन करवाय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक की आल्हा सहित पहुँचेआय २१९ खातिर कीन्ह्यो परिमालिक ने बैठे तहँ कनौजीराय ॥ राजा बोले तब आल्हा ते हमपरदया दीन बिसराय २२० जबै बनाफर तुम मोहबेगे तबहीं चढ़ा पिथौराराय ॥ जूझिग ठाकुर सिरसावाला बिपदा गई मोहोबे आय २२१ इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों साँच बचन महराज ॥ सुनी तलाकें जब तुम्हरी हम मानो गिरी उपरते गाज २२२ माहिल भूपतिकी चुगुली सुनि हमरी देश निकासी कीन ॥

[Header] नदीबेतवाकासमर । ५१३ २१

जूझिगे ठाकुर सिरसा वाले तबहूं खबरि आपनहिं लीन २२३ खबरि जो पावत मलखाने की दिल्ली शहर देत फुकवाय ॥ चढ़िकै मारत हम पिरथी का साँची सुनो चँदेलेराय २२४ द्यावलि बिरमा सम माता ना ना जग भायसरिस मलखान ॥ ब्रह्मा ठाकुर के ब्याहे मा हाथी द्वार पछारा ज्वान २२५ पहिलि लड़ाई मै माड़ौगढ़ दूसर नैनागढ़ मैदान ॥ तिसरि लड़ाई मै पथरीगढ़ ब्याहे गये तहाँ मलखान २२६ चौथि लड़ाई मै दिल्ली मा पाँचो नरवर का मैदान ॥ इन्दल ब्याह हरण छठयें मा तहँपर भयो घोर घमसान २२७ सतौं लड़ाई मै बौरीगढ़ आठों बूँदी का मैदान ॥ नव दश बार लड़े रण नाहर तब मरिगये बीर मलखान २२८ भुजा टूटिगै इक आल्हा की हैंगा बली बीर चौहान ॥ स्वप्ना हैगे अब दुनिया मा हमका आजु बीरमलखान २२६ यहु दुख पावा तुम्हरी दिशि ते मानो साँच चँदेलेराय ॥ सवन चिरैया ना घर छोड़ै नानिजरा बणिजकोजाय २३० मोहिं निकारा तब मोहबे ते तुम्हरो काह बिगारा भाय ॥ जेयत मोहोबे हम आइत ना जो ना चढ़त पिथौरा धाय २३१ पाल्यो पोष्यो लरिकाई ते ताते लाज दीन बिसराय ॥ दूध पियायो मल्हना रानी तब यह रुजिया लहु रखा भाय २३२ अस समुझायो मोहिं माता जब तब सब क्रोध दीन बिसराय ॥ सुनिकै बातें ये आल्हा कीं कायल भये चँदेलेराय २३३ तबै बनाफर उदयसिंह जीं बोले हाथ जोरि शिरनाय ॥ सुखसों सोवो अब मोहबे मा करिहै काह पिथौराराय २३४ जो कछु हैगा पाछे परिगा अब आगे का करो विचार ॥

२२ आल्हखण्ड । ५१४ इतना सुनिकै परिमालिकजी लागे करन मंगलाचार २३५ सवैया ॥ मोद अपार बढ़यो त्यहि वार सो यार सँभार रह्यो कछु नाहीं। पैरको भूषण हाथन धारि सो हाथको भूषण पैरन माहीं ॥ हाथ मिलावत धावत आवत गावत गीत डरे गलबारीं। कौन सों मारग ऐसो तहाँ सो जहाँ ललिते सुखपावत नाहीं २३६ बड़ा मोदभा पुर महलन मा टहलन नेक न लागी वार ॥ आल्हा ऊदन लाखनि ठाकुर सबहिनखूबकीनज्यौंवनार २३७ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीनपरचाय २३८ परे आलसी खटिया तकितकि घों घों करउ रहे घर्ाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुन्शी सुत जीवो प्रागनरायण भाय २३६ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २४० माथ नवावों पितु माता को देवी देव सरिस औतार ॥ सेवा करिकै पितु माताकी सरवन पूत भयो भवपार २४१ औरौ गाथा रघुनाथा की कहिगे बालमीकि बिस्तार ॥ पूरण ब्रह्म आदि पुरुषोत्तम स्वामी रामचन्द्र अवतार २४२ अब बदनामी का डर नाहीं होवो रामचन्द्र भत्तार ॥ शरण तुम्हारी हम ताके हैं दर्शन चहैं नाथ यहिवार २४३ पगड़ी हमरी अब अरुझी है सो सुरझाय-देव रघुनाथ ॥ कितनो पापी कलियुग करि है तबहूँ धरों चरण में माथ २४४ माता भ्राता त्राता ताता नाता एक ठीक रघुनाथ ॥

नदीबेतवाकासमर। ५१५ २३ स्वारथ साथी सब दुनिया है कासों करों जगतमें साथ २४५ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को ह्याँते करों तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त २४६ इति श्रीलखनऊनिवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्र वंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतनदीबे- तवायुद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः॥ १ ॥ नदीबेतवाकायुद्धसमाप्त ॥ इति ॥

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॥श्री गणेशाय नमः॥ अथ आल्हखण्ड ॥ ठाकुरउदयसिंहजीकाहरणवर्णन ॥ सवैया ॥ बज्रसे अंग ओ बानर हय अरु बीरन में बलवान महा । रणमण्डल कोउ न जाय सकै ज्यहि ठौर जबै यहु बीर रहा ॥ सप्त समुन्दर नाँघि अगाध दशकन्धर को पुर जाय दहा । आयहु फेरि जबै लखिते रघुनाथ ते साँच हवाल कहा १ सुमिरन ॥ तुम्हैं बहादुर मैं ध्यावत हौं अञ्जनि पूत वीर हनुमान ॥ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ नितप्रतिकरौं चरणकोध्यान १ सरबरि तुम्हरी का दुनिया मा दूसर कौन बहादुर ज्वान ॥ शरण तुम्हारी मा आयन है साँचे वीर बली हनुमान २ गदा प्रहारी हे असुरारी मारी दुष्ट लङ्किनी नारि ॥ पर्शंत पाँयन मकरी तरिगै लायो पर्वत श्रृंग उखारि ३ बड़े पियारे रघुनन्दन के वन्दन करौं जोरि दोउ हाथ ॥ अक्षत चन्दन धूप दीप सों पूजन करौं मानसी नाथ ४

२ आल्हखण्ड । ५१८ करो मनोरथ पूरण हमरे सबविधि माननीय हनुमान ॥ छूटि सुमिरनी गै हनुमत कै ऊदन हरण सुनो अब ज्वान ५ अथ कथाप्रसंग ॥ 'एक समैया की बातें हैं परिगै पर्व दशहरा आय ॥ सुनवाँ बोली तब ऊदन ते साँची सुनो बनाफरराय १ मोरि लालसा यह डोलति है मज्जन करों बिठूरै जाय ॥ आयसु लैके तुम दादा की देवर मोहिं देउ हनवाय २ यह मन भायगई ऊदन के आल्हा महल पहुँचे जाय ॥ हाथ जोरि अरु बिनती करिकै बोला तहाँ लहुरवाभाय ३ सुनवाँ भौजी की इच्छा है हमको गंग देउ हनवाय ॥ आयसु पावैं जो दादा की तौ हम जायँ बिठूरै धाय ४ इतना सुनिकै आल्हा बोले मानों साँच लहुरवा भाय ॥ देश देश.के राजा अइहैं करिहौं कलह तहाँपर जाय ५ त्यहिते बैठो घर अपने मा ऊदन साँच दीन बतलाय ॥ पर्व दशहरा की फिरि अइहै औरे साल हनायो जाय ६ इतना सुनिकै ऊदन बोले दादा सुनो बनाफरराय ॥ पगिया हमरी कछु अरुझीना जो तहँ रारि मचैवे जाय ७ बाचा हारे हम भौजी ते तुमको गंग देब हनवाय ॥ मोहिं भरोसा है दादा को करिहौ पूर मनोरथ भाय ८ बातें सुनिकै बघऊदन की दीन्ह्यो हुकुम बनाफरराय ॥ 'हुकुम पायकै ऊदन ठाकुर लीन्हीं तुरत फौज सजवाय ६ सजी पालकी तहँ ठाढ़ी थीं सुनवाँ फुलवा भई सवार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया औ जगनायक भयो तयार १० सवालाख दल ऊदन लैके तुरतै कूच दीन करवाय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५१६ ३ बाजैं डंका अह्तंका के हाहाकार शब्द गा छाय ११ आठ रोजकी मैजलि करिकै पहुँचा तहाँ बनांफरराय ॥ तम्बू गड़िगा तहँ ऊदन का भारी ध्वजा रहा फहराय १२ सुभिया बेड़िनि झुन्रागढ़ ते पहुँची सबऊ बिठूरै जाय ॥ करै तमाशा सो तम्बुन में पावै द्रव्य तहाँ अधिकाय १३ जहँपर तम्बू था ऊदन का - सुभिया तहाँ पहुँची आय ॥ रूप देखिकै बघऊदन का दीन्ह्यो नाच रंग बिसराय १४ कछु नहिं भावै सुभिया मनमा ठगिनी भई तहाँपर आय ॥ औरी नटिनी सँग जे आईं तिनका नाच दीनकरवाय १५ अपना बैठे तहँ सोचति है कैसे मिलैं बनाफरराय ॥ जादू डारौं जो ऊदन पर तबहुँन काजसिद्धदिखलाय १६ जाहिर जादू मा सुनवाँ है हमरे जाय प्राण पर आय ॥ मनमा सोचै मनै बिसूरै मनमा बार बार पछिताय १७ डारि मोहनी दी लश्कर मा जेवर डिब्बा लीन उठाय ॥ दीन रुपैया ऊदन ठाकुर नटिनिन कूचदीन करवाय १८ चढ़ीं पालकी सुनवाँ फुलवा गंगा उपर पहुँचीं जाय ॥ मज्जन कीन्ह्यो उदयसिंह तहँ विप्रनदानदीन अधिकाय १९ मज्जन कीन्ह्यो जगनायक जी प्रातःकृत्य कीन हर्षाय ॥ दान मान दै सब विप्रन को सबहिन कूचदीनकरवाय २० लखा तमाशा औ मेला खुब तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ उखरि ग तम्बू फिरि ऊदन का लश्कर कूच दीन करवाय २१ बाजैं डंका अह्तंका के हाहाकार शब्द गे छाय ॥ अस्त दिवाकर जब पश्चिम भे तम्बूदीन तहाँ गड़वाय २२ उत्तम नदिया हैं यमुनाजी उतरे जहाँ बनाफरराय ॥

१ आल्हखण्ड । ५२० डिब्बा दीख्यो नहिं जेवर को सुनवाँ गई सनाकाखाय २३ तुरत बनाँफर उदयसिंह को अपने पास लीन बुलवाय ॥ कहि समुझावा तहँ ऊदन ते डिब्बा नहीं परै दिखलाय २४ एक लाख का सब गहना है कैसी करैं बनाफरराय ॥ डिब्बा भूलाहै बिठूर मा मोको याद भयो यहँ आय २५ काह बतावों मैं देवर ते करिये कैसो कौन उपाय ॥ धीरज राखो अपने मनमा बोले वचन ल्हुरवाभाय २६ तुरत बुलायो जगनायक को औ सब हाल कह्यो समुझाय ॥ हम तो जावत हैं बिठूर को तुम अब कूचजाउ करवाय २७ यह मन भायगई जगना के ऊदन गये बिठूरै आय ॥ कैयो दिनका धावा करिकै जगना अटा मोहोबे जाय २८ रहा न मेला कछु लौटेमा सिरकी पाल परे दिखराय ॥ तिनमा नटिनी औ नट ठहरे गे तिन पास बनाफरराय २६ सुभिया दीख्यो जब ऊदन का भै मन खुशी तबै अधिकाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ ठाकुर हाल देउ बतलाय ३० सुनिकै बातें ये सुभिया की बोले फेरि बनाफरराय ॥ नगर मोहोबा के हम ठाकुर आयन आजु बिठूर नहाय ३१ जब तुम नाचन गइ तम्बूमा गहनो गयो हमार हिराय ॥ पतालगावन त्यहि आयन है तुमते साँच दीन बतलाय ३२ इतना सुनिकै सुभिया बोली मानो साँच बनाफरराय ॥ पँसासारी हमते खेलो हम फिरि पतादेवलगवाय ३३ खेल पसारा सुभिया बेड़िनि बैठे तहाँ ल्हुरवाभाय ॥ जुआँ युद्धसों साँचे क्षत्री कबहूँ न धरैं पछारी पाँय ३४ नल औ पुष्कल आगे खेल्यो झेल्योदुःख नृपति अधिकाय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२१ ५ भारी गाथा नलराजा की देखो महाभारत में जाय ३५ द्वापर शकुनी के सँग खेल्यो कुन्ती पुत्र युधिष्ठिरराय ॥ हारि द्रौपदी महाराजा गे खैंचा चीर दुशासन आय ३६ मानिकै शासन दुर्योधन का पहुँचे बनोवास फिरिजाय ॥ काटिकै संकट महाराज सब कीन्हेनि महाभारत फिरि आय ३७ यहु दुखदाई पंसासारी खेलन लागि बनाफरराय ॥ जादू डारी सुभिया बेड़िनि भे तब सुवा लहुरवा भाय ३८ डारिकै पिंजरा मा ऊदन का सुभिया कूच दीन करवाय ॥ जायकै पहुँची फिरि दिल्ली मा जहँ पर बसैं पिथौरा राय ३६ जहाँ कचहरी दिल्लीपतिकी सुभिया गई यतन सों धाय ॥ करी बन्दगी महाराजा को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४० सुभिया बोली फिरि पिरथी ते राजन साँच देयँ बतलाय ॥ डारिकै जादू हम ऊदन पर औ मेला ते लई चुराय ४१ पै डर हमरे है आल्हा का स्वामी जगा देउ बतलाय ॥ डारिकै सिरकी हम दिल्ली मा निर्भय बसी पिथौरा राय ४२ इतना सुनिकै पिरथी बोले सुभिया कूच देउ करवाय ॥ जो सुनिपै हैं आल्हा ठाकुर हम ते रारि मचै हैं आय ४३ इतना सुनिकै सुभिया चलिभै डेरन फेरि पहुँची आय ॥ कूच करावा फिरि दिल्ली ते सब दरबार भँझावा जाय ४४ कहूँ ठिकाना जब लाग्योना सुन्नागढ़ै गयी तब धाय ॥ जहाँ कचहरी गजराजा की सुभिया तहाँ पहुँची जाय ४५ हाथ जोरिकै महाराजा के आपन हाल दीन बतलाय ॥ जगा चाहती हम सुन्नागढ़ यह इककाज हमारो आय ४६ इतना सुनिकै राजा बोले सुभिया कूच जाउ करवाय ॥

६ , आल्हखण्ड । ५२२ जो सुनि पै हैं आल्हा ठाकुर हमते रारि मचै हैं आय ४७ सुनिकै बातें गजराजा की सुभिया कूच दीन करवाय ॥ झारखण्ड के फिरि जंगल मा डेराजाय दीन गड़वाय ४८ चौकी पहरा करि जादू के निर्भय बसी तहाँ सुखपाय ॥ सुनवाँ सोचै ह्याँ महलन मा आये नहीं लहुरा भाय ४६ पता लगावों मैं ऊदन का जावों देश देश को धाय ॥ यहै सोचिकै रानी सुनवाँ चिल्हियाबनीसरगमड़राय ५० पहिले ढूँढ़ा त्यहि बिठूर का पाछे गयी कामरू धाय ॥ सिलहट बिजहट मौरँग भुन्ता दिल्लीशहरलखा फिरिजाय ५१ पता न पायो जब ऊदन का पहुँची झारखण्ड में आय ॥ तहाँ पै डेराहैंड बेड़िनि के सुनवाँ बैठि बरगदे जाय ५२ पेड़ बरगदा के नीचे मा सुभिया पलँग लीन बिछवाय ॥ लैकै पिंजरा फिरि सुवना का मानुष तुरतै दीन बनाय ५३ खेलै चौपरि सँग ऊदन के सुभिया बोली बचन सुनाय ॥ व्याह हमारे सँगमा करिये मानो कही बनाफरराय ५४ भजिये अल्ला बिसमिल्ला को ऊदन रटो खुदाय खुदाय ॥ तब सुख पैहौ तुम देहीं का नाहीं खाल लेउँ खिचवाय ५५ खुदा खैरियत तुम्हरी करि हैं बिसमिल भलाकरी सबकाल ॥ बाबा आदम संकट टारी मेटी अली भली जंजाल ५६ बातें सुनिकै ये बेड़िनि की बोला देशराज का लाल ॥ खुदा खुदाई चहु दिखलावैं बिसमिलआयजायँततकाल५७ ऊदन व्याहैं नहिं बेड़िनि को कबहूँ राम नाम बिसराय ॥ देश आरिया के क्षत्री हम कैसे मुसलमान ह्वैजायँ ५८ जब छुइजावैं मुसलमान को तबहीं तुरत करें अस्नान ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२३ ७ बेवश हैकै पिंजरा आयन ताते छूटिगयो सब मान ५६ पढ़ै फारसी हम बिद्या ना अपनौ धर्म करैं प्रतिपाल ॥ नित प्रति ध्यावैं रघुनन्दन को पूरणब्रह्म सुरासुर पाल ६० खाल न रहै जो देहीमा केवल प्राण करैं विश्राम ॥ तबहूँ मुख सों ऊदन ठाकुर कवहूँ न लेयँ खुदाको नाम ६१ निर्भय बातें सुनि ऊदन की बरगद डार दीन टँगवाय ॥ बहुतक बाँसन हनि हनि मारा ऊदन जपो खुदाय खुदाय ६२ सुनिकै बातें ये सुमिया की बोला फेरि बनाफरराय ॥ ऊदन ब्याहैं नहिं बेड़िनि को कवहूँ राम नाम बिसराय ६३ बात न दूसरि हम अब कहिबे चहु तन धजीधजीउड़िजाय ॥ ऊदन ब्याहैं नहिं बेड़िनि को कवहूँ राम नाम बिसराय ६४ सुनिकै बातें उदयसिंह की तुरतै सुवना लीन बनाय ॥ डारिकै पिंजरामा ऊदन का टाँगा फेरि बरगदा आय ६५ देखि दुर्दशा यह ऊदन की सुनवाँ बार बार पछिताय ॥ डारि मशान दियो सुनवाँ ने पाछे पिंजरा लीन उठाय ६६ लैकै पिंजरा कछु दूरी मा सुनवाँ गई तड़ाका धाय ॥ सुवना लैकै फिरि पिंजरा ते मानुष तुरतै दीन बनाय ६७ सुनवाँ बोली फिरि ऊदन ते क्यों नहिं देवर जपो खुदाय ॥ काहे बिज्में तुम बेड़िनि में नित प्रति सहौ बाँसके घाय ६८ चलिये देवर अब मोहबे को तुम्हरी बार बार बलिजायँ ॥ सुनिकै बातें ये सुनवाँ की बोले फेरि बनाफर राय ६९ चोरी चोरा ना हम जैहैं तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ लैकै फौजैं दादा आवैं हमरी कैद लेयँ छुड़वाय ७० ऐसे ऊदन अब जैहैं ना नित प्रति सहैं बाँसके घाय ॥

८ आल्हखण्ड । ५२४ सुवा बनावो अब मानुष ते टाँगो फेरि बरगदा जाय ७१ इतना सुनिकै रानी सुनवाँ टाँगा फेरि बरगदा आय ॥ चील्ह रूप ह्वै उड़ि तहँनाते पहुँची फेरि मोहोबे जाय ७२ मानुष ह्वैकै फिरि महलनमा इन्दल पूत लीन बुलवाय ॥ कहि समुझावा सब इन्दल ते बप्पै खबरि जनावो जाय ७३ सुनिकै बातें ये माता की इन्दल पूत चला शिरनाय ॥ जहाँ कचहरी है आल्हा कै इन्दल पूत पहुँचा आय ७४ बड़े प्यार सों आल्हाठाकुर अपने पास लीन बैठाय ॥ फिरि शिर सूंघ्यो आल्हाठाकुर बोल्यो मधुरवचनमुसुकाय ७५ काह लालसा है बचुवा कै सो अब बेगि देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै इन्दलठाकुर कहिगा यथातथ्य सब गाय ७६ सुनिकै आल्हा बोलन लागे है यहु दुष्ट लहुरवा भाय ॥ करकति छाती दुख सुनिकै अब त्यहिते कैद छुड़ावब जाय ७७ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजिगालश्करफिरिआल्हाका तुरतै कूच दीन करवाय ७८ बनिकै चिल्हिया सुनवाँ रानी आधे सरग रही मड़राय ॥ जाय बरगदा के फिरि पहुँची चुप्पे बैठि डारपै जाय ७६ डारि मशान दयो सुभियादल तुरतै पिंजरा लीन उठाय ॥ कछु दूरिचलि झारखण्ड ते फूँका मन्त्र तहाँपर जाय ८० मानुष ह्वैकै फिरि बघऊदन ठाढ़े भये शीश को नाय ॥ तब समुझावा रानी सुनवाँ लश्करगयो तुम्हारो आय ८१ चील्हरूप ह्वै रानी सुनवाँ बैठी एकडार पै जाय ॥ तहँने चलिकै ऊदन ठाकुर आगे मिले फौजमें आय ८२ लादू चौंरी सुभिया वाली सबियाँ हाल कहा समुझाय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२५ ६ इतना सुनिकै सुभिया बेड़िनि तुरतै उठी तड़ाका धाय ८३ सहुवा बीरन को बुलवावा औ सब हाल दीन बतलाय ॥ करो तयारी समरभूमि की आये लड़न बनाफरराय ८४ खबरि फैलिगै यह बेड़ियन-मा हैंगे डेढ़ सहस तय्यार ॥ झीलम बखतर सबहिन पहिरा सबहिन बाँधिलीन हथियार ८५ कोउकोउबेड़ियाचढ़िहाथिनमा कोउ कोउ घोड़भये असवार ॥ बहुतक बेड़िया हैं पैदल मा लीन्हे हाथ ढाल तलवार ८६ गड़िगा तम्बू ह्वाँ आल्हा का भारी ध्वजा रहा फहराय ॥ बाजै डंका अहर्तंका का हाहाकार शब्दका छाय ८७ देवा ऊदन इन्द्दल ठाकुर तीनों भये बेगि तय्यार ॥ हथी चढ़ैया हाथिन चढ़िगे बाँके घोड़न भे असवार ८८ दुहुँ दल तुरतै इकठौरी भे लागी चलन तहाँ तलवार ॥ कहुँ कहुँ भाला कहुँ कहुँ बरछी कहुँ कहुँ मारैं ज्वान् कटार ८६ कटि भुजदण्डै गिरैं खेत में उठि उठि रुण्ड करें तलवार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ६० मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार ॥ ना मुहँ फेरैं मोहबे वाले नादल बेड़ियनकात्यहिबार ६१ बड़े लड़ैया ई बेड़िया हैं इनते हारिगयी तलवार ॥ को गति वरणै तहँ इन्द्दल कै सबदिशिकरै भड़ाभड़मार ६२ सुनवाँ सुभिया कै वरणी में जादुन दऊ बड़ी हुशियार ॥ आगी पानी अरु आँधी की पुरियन होय तहाँपर मार ६३ चलै सिरोही रणमण्डल मा क्षत्री गरु करैं ललकार ॥ कहुँ ज्वालपकनि बिजली चमकनि तड़पै चहूँदिशा तलवार ६४ क्षत्री गाजैं डंका बाजैं बाजैं तहाँ शूर सरदार ॥

१० | आल्हाखण्ड | ५२६ को गति बरणै तहँ बेड़ियन कै उनतो भली मचाई रार ६५ इनहुन दुर्गति तिनकी कीन्ही कायर छोड़ि भागि मैदान ॥ कटि कटि कल्ला गिरैं बलेड़ा घैहा होयँ अनेकन ज्वान ६६ पाँचसै बेड़िया घायल हैगे सब दल रहिगा एकहजार ॥ तीनसै क्षत्रिय मोहबेवाले जूझे समर तहाँ त्यहिवार ६७ रानी सुनवाँ सुमिया बेड़िनि जादुन करैं तहाँपर रार ॥ कोऊ काहूते कमती ना दोऊ जादुन में हुशियार ६८ बीरमहम्मद की पुरिया को सुमिया छाँड़ि दीन त्यहिवार ॥ नारसिंह की जादू लैके सुनवाँ तजा तुरतललकार ९९ चिल्हिया हैकै सुनवाँ सुमिया दूनन खूब कीन मैदान ॥ लड़ते लड़ते दूनों चिल्हिया पहुँचींजायतुरतअसमान १०० लड़ते लड़ते द्वउ ऊपर ते नीचे गिरीं तड़ाका आय ॥ बड़ी लड़ाई भै पंजन ते अद्भुत समर कहानाजाय १०१ जहाँ लड़ाई द्वउ चिल्हियनकी इन्दल तहाँ पहुँचा आय ॥ सुनवाँ बोली तहँ इन्दल ते बेटा मूड़ देउ बगदाय १०२ इन्दल बोले तब सुनवाँ ते कैसे देवैं मूड़ गिराय ॥ जो हम मारैं यहि तिरिया को तौ रजपूती धर्मनशाय १०३ हाथ मेहरियन पर छाँड़ैं ना कबहूँ बीर समर में माय ॥ कैसे मारैं हम तिरिया को माता सोचो और उपाय १०४ इतना सुनिकै सुनवाँ बोली बेटा जूरा लेउ उड़ाय ॥ वातैं सुनिकै ये सुनवाँ की जूरा काटि लीन त्यहिठायाँ १०५ जीवन दान दीन सुमियाको सोऊ भागि तड़ाकाधाय ॥ जादू झूठी भई सुमिया की तबसोलागितहाँपछिताय १०६ ऊदन देबाकी मारुन मा बेड़िया भागे खेत बराय ॥

उदयसिंहकाहरण । ५२७ ११ जो कोउ भागतहै सम्मुख ते त्यहिना हनैं बनाफरराय १०७ मारे मारे तलवारिन ते बिड़िया चिरियाकरें निदान ॥ खेत छूटिगा सब बिड़ियन ते जीता उदयसिंह मैदान १०८ बाजे डंका अहंतंका के हैगा घोर शोर घमसान ॥ जितने क्षत्री मोहबेवाले डेरन आयगये ते ज्वान १०६ चील्ह रूप है सुनवाँ रानी महलन आयगयी तत्काल ॥ कूच करायो फिरि लश्कर को बेटा देशराज के लाल ११० आल्हा ठाकुर पचशब्दा पर इन्द्ल पपिहापर असवार ॥ घोड़ बेंदुला पर ऊदन हैं कम्मरपरी नाँगि तलवार १११ यहु अलबेला भीषमवाला देवा मैनपुरी चौहान ॥ घोड़ मनोहर पर सोहतहै रणमा बड़ालड़ैयाज्वान ११२ कैयो दिनकी मैजलि करिकै झुन्नागढ़ै पहुँचे आय ॥ गड़िगा तम्बू तहँ आल्हा का भारी ध्वजारहा फहराय ११३ ढोल नगारा तुरही बाजीं हाहाकार शब्दगा छाय ॥ गा हरिकारा तब झुन्नागढ़ राजै खबरिजिनावा जाय ११४ आल्हा ऊदन मोहबे वाले धूरे परे हमारे आय ॥ आवैं फौजें झारखण्ड ते अबतो नगर मोहोबे जायँ ११५ सुनिकै बातें हरिकारा की पलकी तुरत लीन मँगवाय ॥ इशरत मुहरें इक हीरा लै पलकी चढ़ा तड़ाकाधाय ११६ जहाँ बनाफर आल्हा ठाकुर राजा तहाँ पहुँचा आय ॥ आदर करिकै आल्हा ठाकुर अपने पास लीन बैठाय ११७ द्वरि अशर्फी दी सम्मुखमा हीरा हाथ दीन पकराय ॥ सखियाँ गाया तब ऊदन की आल्हा यथातथ्यगे गाय ११८ बड़े प्रेम सों दोऊ ठाकुर बोलैं प्रीति रीति के भाय ॥

१२ आल्हखण्ड । ५२८ बिदा मांगिकै फिरि आल्हासों राजा चढ़ा पालकी जाय ११६ गा महराजा मुन्नागढ़ मा तम्बुन स्वये बनाफरराय ॥ राति बसेरा करि मुन्नागढ़ भुरहीं कूच दीन करवाय १२० कैयो दिनकी मैजलि करिकै मोहबे गये बनाफरराय ॥ सौसौ तोपैं दर्गी सलामी जबघरगयेउदयसिंहराय १२१ को गति वरणै त्यहि समयाकै हमरे बून कही ना जाय ॥ ऊदनहरण पूर अब ह्रैगा ध्यावैं तुम्हें शारदा माय १२२ कण्ठ में बैठो तुम महरानी भूले अक्षर देउ बताय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय १२३ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२४ माथ नवावों पितु माता को जिनबल पूर कीन यह गाथ ॥ नहीं भरोसा निज भुजबल का स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ १२५ पूर तरंग यहाँ सों ह्रैगा सुमिरों तुम्हें भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही मोरि भगवन्त १२६ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबावूप्रागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउनामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृतऊदनहरण वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ उदयसिंहकाहरणसमाप्त ॥ इति ॥