भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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८ आल्हखण्ड । ५२४ सुवा बनावो अब मानुष ते टाँगो फेरि बरगदा जाय ७१ इतना सुनिकै रानी सुनवाँ टाँगा फेरि बरगदा आय ॥ चील्ह रूप ह्वै उड़ि तहँनाते पहुँची फेरि मोहोबे जाय ७२ मानुष ह्वैकै फिरि महलनमा इन्दल पूत लीन बुलवाय ॥ कहि समुझावा सब इन्दल ते बप्पै खबरि जनावो जाय ७३ सुनिकै बातें ये माता की इन्दल पूत चला शिरनाय ॥ जहाँ कचहरी है आल्हा कै इन्दल पूत पहुँचा आय ७४ बड़े प्यार सों आल्हाठाकुर अपने पास लीन बैठाय ॥ फिरि शिर सूंघ्यो आल्हाठाकुर बोल्यो मधुरवचनमुसुकाय ७५ काह लालसा है बचुवा कै सो अब बेगि देउ बतलाय ॥ इतना सुनिकै इन्दलठाकुर कहिगा यथातथ्य सब गाय ७६ सुनिकै आल्हा बोलन लागे है यहु दुष्ट लहुरवा भाय ॥ करकति छाती दुख सुनिकै अब त्यहिते कैद छुड़ावब जाय ७७ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ॥ सजिगालश्करफिरिआल्हाका तुरतै कूच दीन करवाय ७८ बनिकै चिल्हिया सुनवाँ रानी आधे सरग रही मड़राय ॥ जाय बरगदा के फिरि पहुँची चुप्पे बैठि डारपै जाय ७६ डारि मशान दयो सुभियादल तुरतै पिंजरा लीन उठाय ॥ कछु दूरिचलि झारखण्ड ते फूँका मन्त्र तहाँपर जाय ८० मानुष ह्वैकै फिरि बघऊदन ठाढ़े भये शीश को नाय ॥ तब समुझावा रानी सुनवाँ लश्करगयो तुम्हारो आय ८१ चील्हरूप ह्वै रानी सुनवाँ बैठी एकडार पै जाय ॥ तहँने चलिकै ऊदन ठाकुर आगे मिले फौजमें आय ८२ लादू चौंरी सुभिया वाली सबियाँ हाल कहा समुझाय ॥