आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउदयसिंहकाहरण । ५२३ ७ बेवश हैकै पिंजरा आयन ताते छूटिगयो सब मान ५६ पढ़ै फारसी हम बिद्या ना अपनौ धर्म करैं प्रतिपाल ॥ नित प्रति ध्यावैं रघुनन्दन को पूरणब्रह्म सुरासुर पाल ६० खाल न रहै जो देहीमा केवल प्राण करैं विश्राम ॥ तबहूँ मुख सों ऊदन ठाकुर कवहूँ न लेयँ खुदाको नाम ६१ निर्भय बातें सुनि ऊदन की बरगद डार दीन टँगवाय ॥ बहुतक बाँसन हनि हनि मारा ऊदन जपो खुदाय खुदाय ६२ सुनिकै बातें ये सुमिया की बोला फेरि बनाफरराय ॥ ऊदन ब्याहैं नहिं बेड़िनि को कवहूँ राम नाम बिसराय ६३ बात न दूसरि हम अब कहिबे चहु तन धजीधजीउड़िजाय ॥ ऊदन ब्याहैं नहिं बेड़िनि को कवहूँ राम नाम बिसराय ६४ सुनिकै बातें उदयसिंह की तुरतै सुवना लीन बनाय ॥ डारिकै पिंजरामा ऊदन का टाँगा फेरि बरगदा आय ६५ देखि दुर्दशा यह ऊदन की सुनवाँ बार बार पछिताय ॥ डारि मशान दियो सुनवाँ ने पाछे पिंजरा लीन उठाय ६६ लैकै पिंजरा कछु दूरी मा सुनवाँ गई तड़ाका धाय ॥ सुवना लैकै फिरि पिंजरा ते मानुष तुरतै दीन बनाय ६७ सुनवाँ बोली फिरि ऊदन ते क्यों नहिं देवर जपो खुदाय ॥ काहे बिज्में तुम बेड़िनि में नित प्रति सहौ बाँसके घाय ६८ चलिये देवर अब मोहबे को तुम्हरी बार बार बलिजायँ ॥ सुनिकै बातें ये सुनवाँ की बोले फेरि बनाफर राय ६९ चोरी चोरा ना हम जैहैं तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ लैकै फौजैं दादा आवैं हमरी कैद लेयँ छुड़वाय ७० ऐसे ऊदन अब जैहैं ना नित प्रति सहैं बाँसके घाय ॥