आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ आल्हखण्ड । ५२८ बिदा मांगिकै फिरि आल्हासों राजा चढ़ा पालकी जाय ११६ गा महराजा मुन्नागढ़ मा तम्बुन स्वये बनाफरराय ॥ राति बसेरा करि मुन्नागढ़ भुरहीं कूच दीन करवाय १२० कैयो दिनकी मैजलि करिकै मोहबे गये बनाफरराय ॥ सौसौ तोपैं दर्गी सलामी जबघरगयेउदयसिंहराय १२१ को गति वरणै त्यहि समयाकै हमरे बून कही ना जाय ॥ ऊदनहरण पूर अब ह्रैगा ध्यावैं तुम्हें शारदा माय १२२ कण्ठ में बैठो तुम महरानी भूले अक्षर देउ बताय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भाय १२३ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १२४ माथ नवावों पितु माता को जिनबल पूर कीन यह गाथ ॥ नहीं भरोसा निज भुजबल का स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ १२५ पूर तरंग यहाँ सों ह्रैगा सुमिरों तुम्हें भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही मोरि भगवन्त १२६ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबावूप्रागना- रायणजीकीआज्ञानुसारउनामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृतऊदनहरण वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ उदयसिंहकाहरणसमाप्त ॥ इति ॥