आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ आल्हखण्ड । ५१४ इतना सुनिकै परिमालिकजी लागे करन मंगलाचार २३५ सवैया ॥ मोद अपार बढ़यो त्यहि वार सो यार सँभार रह्यो कछु नाहीं। पैरको भूषण हाथन धारि सो हाथको भूषण पैरन माहीं ॥ हाथ मिलावत धावत आवत गावत गीत डरे गलबारीं। कौन सों मारग ऐसो तहाँ सो जहाँ ललिते सुखपावत नाहीं २३६ बड़ा मोदभा पुर महलन मा टहलन नेक न लागी वार ॥ आल्हा ऊदन लाखनि ठाकुर सबहिनखूबकीनज्यौंवनार २३७ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीनपरचाय २३८ परे आलसी खटिया तकितकि घों घों करउ रहे घर्ाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुन्शी सुत जीवो प्रागनरायण भाय २३६ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २४० माथ नवावों पितु माता को देवी देव सरिस औतार ॥ सेवा करिकै पितु माताकी सरवन पूत भयो भवपार २४१ औरौ गाथा रघुनाथा की कहिगे बालमीकि बिस्तार ॥ पूरण ब्रह्म आदि पुरुषोत्तम स्वामी रामचन्द्र अवतार २४२ अब बदनामी का डर नाहीं होवो रामचन्द्र भत्तार ॥ शरण तुम्हारी हम ताके हैं दर्शन चहैं नाथ यहिवार २४३ पगड़ी हमरी अब अरुझी है सो सुरझाय-देव रघुनाथ ॥ कितनो पापी कलियुग करि है तबहूँ धरों चरण में माथ २४४ माता भ्राता त्राता ताता नाता एक ठीक रघुनाथ ॥