आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
आल्हाकामनावन । ४८६ २७ बातैं सुनिकै लखराना की देवा कहा तुरत शिरनाय ॥ साँचे धर्मन के राँचे हैं याँचे मिले कनौजीराय २६५ कर्म कुलीनन के कीन्हे हैं साँचे मित्र बनाफरराय ॥ बातैं सुनिकै ये देवा की बोले तुरत उदयसिंहराय २६६ स्याबसि स्याबसि लाखनिराना कीन्ह्यो धर्म युद्धसों रार ॥ काहे न होवै यश क्षत्रिन को ऐसे युद्ध बीर बरियार २६७ इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतै कूच दीन करवाय ॥ नदी बेतवा के ऊपर मा छोरी कमर बनाफरराय २६८ डेरा गड़िगे तहँ क्षत्रिन के तम्बू गड़ा बनाफर क्यार ॥ जहँ महराजा लाखनि बैठे भारी लाग तहाँ दरबार २६६ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भैने गयो चँदेले क्यार ॥ कलम दवाइति कागज लैके आल्हा पत्र कीन तैयार ३०० चिट्ठी दीन्ही आल्हा ठाकुर बोले उदयसिंह सरदार ॥ खबरि जनावो तुम मल्हनाको आये कनउज राजकुमार ३०१ हमरी दादाकी दिशि हैंकै रानिन कीन्ह्यो दण्ड प्रणाम ॥ काह हकीकति है पिरथी कै सुखसोंकरो महल बिश्राम ३०२ जितनी बिल्ली हैं दिल्ली की किल्ली पकरि नचावों माय ॥ तौ तौ साँचे हम ऊदन हैं यहतुमकह्योसँदेशाजाय ३०३ सुनि संदेशा बघऊदन का हरनागरै लीन कसवाय ॥ चढ़ा तड़ाका हरनागर पर जगनिकयथातथ्यशिरनाय ३०४ नदी बेतवाको उतरत भा पहुँचत भयो मोहोबेद्वार ॥ फाटक खोल्यो दरवानी ने पहुँचे राजभवन सरदार ३०५ रानी मल्हना के महलन मा माहिल आयगयो त्यहिबार ॥ तबलौं पहुँचे जगनायक जी बोला उरई का सरदार ३०६
२८ आल्हाखण्ड । ४६० कवलों अइहैं आल्हा ठाकुर नीके हवैं बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै जगनायक जी तुरतै बोले बचन बनाय ३०७ हिंया न अइहैं आल्हा ठाकुर अब चहु करू मनावनजाय ॥ उनकै खातिर कनौजिया घर नीके दऊ बनाफरराय ३०८ पारस लैके तुम कुठरी ते पिरथी पास देउ पहुँचाय ॥ लैके कुंजी जगनायक जी कुठरीखोलिदीनवतलाय ३०६ उठे झड़ाका माहिल ठाकुर कुठरी अटे तड़ाकाधाय ॥ साँकरिमारी जगनायक जी ताला तुरत दीन डरवाय ३१० बन्द कुठरिया माहिल ठाकुर मल्हना गई सनाकाखाय ॥ चिट्ठी दीन्ह्यो फिरिजगनायक औसबहालकह्योसमुझाय ३११ पढ़िकै चिट्ठी मल्हना रानी औ जगनायक संग लिवाय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक की चिट्ठी तहाँ दिखाई जाय ३१२ छन्द ॥ पढ़ि पत्रतहाँ। लहिमोद महाँ॥ परिमाल जहाँ। तजिशोकतहाँ॥ भवनमें आय । महासुख पाय ॥ लखिकैदतहाँ । उरई को जहाँ ॥ महरानि गई । तजि बन्धु दई ॥ अतिबेगचला । उरईको लला ॥ पृथिराजजहाँ। स्वउ आयतहाँ॥ सबहालकहा। बिपदाजोलहा३१३ सुनिकै बातें सब माहिल की यहु महराज पिथौराराय ॥ घाट बयालसि तेरहघाटी सबियाँतुरंतदीन रुकवाय ३१४ पहरा घूमें कहुँ पैदल का कहुँ कहुँ फिरैं घोड़असवार ॥ अनँद बधैया मोहबे बाजै घर घर होयं मंगलाचार ३१५ फाटक बन्दी है मोहवे मा घरका अवै न बाहर जाय ॥ आल्हा ऊदन की कीरति तहँ घर घर रहे नारि नर गाय ३१६ आल्ह मनौआ पूरण करिकै ध्यावों रामचन्द्र महराज ॥
आल्हाकामनावन । ४६१ २६ जलथलजनमों जहँ दुनियामा होवों तहाँ भक्त शिरताज ३१७ पिता मातु के मैं चरणन का ध्यावों बार बार शिरनाय ॥ जिन बल गाथा यह पूरण भै भुजबलनहीं भरोसाभाय ३१८ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ३१६ आशिर्बाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनरायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतगाथकसगाय ३२० रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर ३२१ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को ह्वाँते करों तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छा यही मोरि भगवन्त ३२२ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृत आल्हामनावनवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः ॥ १ ॥ ठाकुरआल्हासिंहजीकामनावन सम्पूर्ण ॥ इति ॥
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अथ आल्हखण्ड ॥ नदीबेतवापरलाखनिपृथ्वीराज काप्रथमयुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ रामसिया पद दोउ मनाय सो ध्याय शिवा शिव चर्ण यथारथ । कीरति कृष्ण बखान करों जिनके बलसों बलवान भे पारथ ॥ भीषम कर्ण सुयोधन ज्वान महान सबै मरिगे रणभारथ । चाहत कृष्ण नहीं ललिते बलते थलते जगते सो अकारथ १ सुमिरन ॥ दशरथ नन्दन को बन्दन करि सीता चरण कमलको ध्याय ॥ सुमिरि भवानी शिवशंकर को औ यदुनन्दन चरण मनाय १ बड़े प्रतापी कुंती नन्दन बन्दन करों युधिष्ठिरराय ॥ गदा प्रहारी भीमसेन को ध्यावों बार बार शिरनाय २ शूर धनुर्धर नर अर्जुन की कीरति सकै कौन नर गाय ॥
२ आल्हाखण्ड। ४६४ विद्या पूरण सहदेऊ की कीरति रही जगतमें छाय ३ बड़ा प्रतापी रण मण्डल मा नकुलो समरधनी तलवार ॥ करण न होतो जो दुनिया मा तौ को होत दान वरियार ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो पिथौरा क्यार ॥ नदी बेतवाके डाँड़ेपर लाखनि करी खूब तलवार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भारी लाग राज दरवार ॥ त्यही समैया त्यहि औसर मा बोले उदयसिंह सरदार १ घाट बयालस पिरथी रोंके दादा करो कछू तदबीर ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले ऊदन धरो हृदय में धीर २ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर तुरतै पान दीन धरवाय ॥ है कोउ योधा दूनों दल मा जो बितवा पर पान चवाय ३ इतना सुनिकै दोऊ दल के क्षत्री गये सनाकाखाय ॥ बोलि न आवा क्यहु क्षत्री ते सबहिन मूड़ लीन अउँधाय ४ ऊदन तड़पे त्यहि समया मा पहुँचे पाननिकट फिरिजाय ॥ आल्हा बोले तब ऊदन ते मानो कही लघुरवाभाय ५ अबती बारी है लाखनि कै गाँजर फते कीन तुम जाय ॥ नदी बेतवा के मोर्चा पर जावैं अवशि कनौजीराय ६ मीराताल्हन धनुवाँ तेली बोले दोऊ शीश नवाय ॥ तजी सम्पदा सब कनउज की आये लड़न कनौजीराय ७ नव दिन दश दिन भे गौने के सो तजिदई पदमिनी नारि ॥ बीरा खैये लाखनि राना करिये नदी भयानक रारि ८ बात बराबरी की सहिये ना चहिये जायँ नदी पर प्रान ॥ बातैं सुनिकै ये सय्यद की बीरा लीन कनौजी जवान ६
नदीबेतवांकासमर । ५६५ ३ ऊदन बोले तब लाखनि ते हमरे बचन करो परमान ॥ संग कनौजी हमहूं चलिबे करिबे घोर शोर घमसान १० मान न रखिबे क्यहु क्षत्री के तुम्हरे संग कनौजी ज्वान ॥ ऊदन लाखनि के मुर्चा ते जैहैं लौटि बीर चौहान ११ इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो उदयसिंह सरदार ॥ रतीभान का मैं लड़काहूं नाती बेनचकवै क्यार १२ काह हकीकति हैं दिल्लीपति जो तुम चलो संगमें ज्वान ॥ भूरी हथिनी कछु बूढ़ी ना ना कछु असारोग बलवान १३ संग न लेबे हम काहू को आल्हा बचन करब परमान ॥ इतना कहिकै लाखनि ठाकुर नदी हेतु कीन प्रस्थान १४ धनुवाँ तेली मीरा सय्यद येऊ भये साथ तय्यार ॥ नदी बेतवा के पाँजर मा पहुँचा कनउजका सरदार १५ नौसै हाथी लखरानाके पानी पियनगये त्यहिकाल ॥ पार उतरिगे ते नदी के सहिनहिंसकेघाम बिकराल १६ तब हरिकारा पृथीराज का चौंड़ै खबरि जनाई जाय ॥ बहुतक हाथी पार आयगे मानों कही चौंडियाराय १७ इतना सुनिकै चौंड़ा बाम्हन अपनो हाथी लीन मँगाय ॥ चढ़ा तड़ाका फिरि हाथीपर नदी उपर पहुँचा आय १८ सबियाँ हथिनी लखराना की चौंड़ा तुरत लीन खिदवाय ॥ भगे महाउत सब तहँना ते आये जहाँ कनौजीराय १६ हाल बताइने सब हाथिनका ज्यहिविधिचौंड़ालीनखिदाय ॥ सुनि संदेशा लाखनिराना डंका तुरत दीन बजवाय २० भारी लश्कर लखराना का गर्जति चला समरको जाय ॥ घरी मुहूरत के अरसा मा पहुँचे समरभूमि में आय २१
४ आल्हाखण्ड । ४६६ लाखनिराना मीरा सय्यद धतुवाँ सहित उतरिगे पार ॥ नौसै हाथी लखराना का सातसै हथी पिथौरा क्यार २२ सोलासै के हाथी दलमा पहुँचे तुरत कनौजीराय ॥ जितने हाथी दूनों दल के सोसब तुरतलीन खिदवाय २३ गा हरिकारा पृथीराज का चौंड़ै खबरि जनाई जाय ॥ हमरी अपनी सब हथिनिनको लाखनिराना लीनखिदाय २४ सुनिकै बातैं हरिकारा की चौंडा फौज लीन सजवाय ॥ धाँधूठाकुर को सँग लैके तुरतैं कूचदीन करवाय २५ बीस खेत जब लाखनि रहिगे चौंड़ा बोला वचन सुनाय ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय २६ इकलो हाथी लखि चौंड़ाको लाखनि भूरी दीन बढ़ाय ॥ सम्मुख आये जब चौंड़ा के बोले तबै कनौजीराय २७ बेन चकवै के नाती हम बेटा रतीभान को जान ॥ मोहबा देखन हम जाइत हैं लाखनि नाम हमारो मान २८ आल्हा ऊदन के सँग आयन चौंड़ा साँच दीन बतलाय ॥ इतना सुनतै चौंड़ा बोला मानो कही चँदेलेराय २६ आल्हा चाकर परिमालिक के सो कनउजको गये रिसाय ॥ कीनि चाकरी उन जयचँदकी तिनके साथ कनौजीराय ३० ऐसी कहिये नहिं काहू सों अबहीं कूच देउ करवाय ॥ संगति राजा अरु चाकर की कतहूँ न सुनाकनौजीराय ३१ इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो कही चौंड़ियाराय ॥ बड़ी बड़ाई ऊदन कीन्ही तब मनगई लालसा आय ३२ बिना मोहोबा आँखिन दीखे कैसे कूच देयं करवाय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बोला मानो साँच कनौजीराय ३३
नदी बेतवा का समर । ४६७ ५ चढ़ा पिथौरा सात लाख सों सबियाँ घाट दये रुकवाय ॥ जो तुम लड़िहौ है चाकर सँग तौ रजपूती धर्म नशाय ३४ इतना सुनिकै लाखनि बोले चौंड़ा काहगये बौराय ॥ किरिया कीन्ही हम गंगा में चलिबे साथ बनाफर राय ३५ पाँउँ पिछारी का डरिबे ना चहुतन धजी धजी उड़िजाय ॥ चुवै निशाकर ते आगी चहु औ नभ मिलै धरणि में आय ३६ उवै दिवाकर चहु पश्चिम को सातौं सूखि समुन्दर जायँ ॥ लाखनि भागैं नहिं नदिया ते चौंड़ा साँच दीन बतलाय ३७ इतना सुनिकै जरा चौंड़िया तुरतै दीन्ही ढाल चलाय ॥ होउ बहादुर जो लखराना हमरी ढाल लेउ उठवाय ३८ लाखनि बोले तब धनुवाँ ते लावो ढाल यार यहिबार ॥ दाबि बछेड़ा धनुवाँ चलिभा धाँधू कहा बचन ललकार ३६ पाँउँ अगाड़ी को डारे ना नहिं मुहुँ धाँसि देउँ तलवार ॥ बात न मानी कछु धाँधू की धनुवाँ घोड़े का असवार ४० भाला धमका धाँधू ठाकुर धनुवाँ लैगा वार बचाय ॥ ढाल उठाई जब धनुवाँ ने स्याबासिकह्यो कनौजी राय ४१ लीन कटारी लाखनि राना औ रेतीमा दीन चलाय ॥ होय बहादुर जो दिल्ली को सो अब लेय कटार उठाय ४२ इतना सुनिकै भूरा चलिभा सय्यद उठा तड़ाका धाय ॥ तब ललकारा वहि भूराने सय्यद खबरदार है जाय ४३ कहा न माना कछु भूरा का सय्यद लीन कटार उठाय ॥ सो दैदीन्ही लखराना का चौंड़ा बहुत गयो शरमाय ४४ झुके सिपाही दुहुँ तरफा के फिरितहँ चलन लागि तलवार ॥ पैदल पैदल के बरणी मै औ असवार साथ असवार ४५ ११
६ आल्हखण्ड । १४८ मूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ॥ गजके हौदाते शर बरषैं नीचे करैं महाउत मार ४६ कटि कटि कल्ला गिरैं खेतमा घायल भये सुघरुआ ज्वान ॥ नदी बेतवा के डांडेपर लाखनि चौंडाका मैदान ४७ दाब्यो लश्कर लखराना का लाग्यो होन भड़ाभड़ मार ॥ भागि सिपाही दिल्लीवाले अपने डारि डारि हथियार ४८ चौंडा बाम्हन औ लाखनिका परिगा समर बरोबरि आय ॥ तीर चौंडिया तकिकै मारा लाखनि लैगे वार बचाय ४६ तुरतै भूरी को दौरावा चौंडा पास पहुँचे जाय ॥ भाला मारा लखराना ने हाथी गिरा पछाराखाय ५० तुरत चौंडिया पैदल हैगा तब यह कहा कनौजीराय ॥ पायँ पियादे को मारैं ना हाथी और लेउ मँगवाय ५१ इतना कहिकै लाखनिराना आगे दीन्ही फौजबढ़ाय ॥ बाजे डंका अहतक के हाहाकार शब्द गा छाय ५२ सुर्चा हटिगा जब चौंडा का धावन तबै पहुँचा जाय ॥ सुनि हरिकारा की बातैं सब ताहर बेटा लीन बुलाय ५३ हुकुम लगावा महराजा ने तुम चढ़िजाउ नदीपर धाय ॥ हुकुम पिथौरा का पावतखन डंका तुरत दीन बजवाय ५४ सजा रिसाला घोड़न वाला आला तीनि लाखलों भाय ॥ कच्छी मच्छी ताजी तुर्की हरियल सुर्ख परैं दिखराय ५५ को गति वर्णैं तहँ सिरगनकी मिरगन चाल चलेसब जायें ॥ हंस चालपर पँचकल्यानी मुश्की मोरसरिस दिखरायें ५६ लवा कि चालन ताजी जावैं हरियल चलैं कबूतर चाल ॥ कच्छी कच्छपकी चालनमा मच्छी मगरमच्छकी चाल ५७
नदीबेतवाकासमर । ४६६ ७ सुर्खा जावैं शशाचालपर तुर्की तीतर के अनुहार ॥ भाला बलछी छुरी कटारी लीन्हे चढ़े ढाल तलवार ५८ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरी अँबारी तिन हाथिन के बहुतन हौदा रहे बिराज ५६ आदि भयंकर हाथी ऊपर पिरथीराज भये असवार ॥ तीरकमानै अनगिन्ती लै लीन्ही फेरि ढाल तलवार ६० छुरी कटारी भाला वरछी लीन्हे सबै नृपति हथियार ॥ घोड़नाम दलगंजन ऊपर ताहर आगे राजकुमार ६१ ढढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ॥ औरि बयरिया डोलन लागीं औरै होनलाग ब्यवहार ६२ मारु मारु कै मौहरि बाजी बाजी हाव हाव करनाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरे रब्वा चले पवनकी चाल ६३ घोड़ा हींसैं हाथी चिघेरैं बैगा अन्धधुन्ध त्यहिबार ॥ डेढ़ लाख दल पैदल लीन्हे राजा दिल्ली का सरदार ६४ डगमग डगमग धरती डोली देवता झाँकि गये असमान ॥ देवी देवता पृथ्त्री वाले चक्रित भये देखि चौहान ६५ को गति बरणै त्यहि समया कै जा क्षण चला पिथौराजवान ॥ लाली लाली आँखी कीन्हे गजभरि छातीका चौहान ६६ जहाँ हैं फौजैं लखराना की प्यारो पूत कन्नौजी क्यार ॥ मीराताल्हन बनरस वाला सिर्गा घोड़े पर असवार ६७ धनुवाँ तेली है घोड़े पर बारह कुँवर बनौधा केर ॥ चारौराजा गाँजर वाले तिनते कहा कन्नौजी टेर ६८ आई फौजैं पृथीराज की यारो वेगिहोउ हुशियार ॥ इतना सुनिकै कनउन वाले बोले सबै शूरसरदार ६६
८ आल्हखण्ड । ५०० हुकुम लगावो अब तोपन को गोलंदाज होयें तय्यार ॥ लखि अस मर्जी सरदारन की लाखनिहुकुमदीनत्यहिबार७० लै लै थैली बारूदन की सो तोपनमा दई डराय ॥ गोला छूटे दुहुँ तरफा के हाहाकार शब्द गा छाय ७१ लागै गोला ज्यहि हाथी के मानो चोर सेंधि कैजाय ॥ जउने ऊंट के गोला लागै तुरतै गिरै सार अललाय ७२ लागै गोला ज्यहि घोड़ा के मानो मगर कुल्याचै खाय ॥ गोला लागै ज्यहि क्षत्री के धुनकतरूईसरिसउड़िजाय ७३ जउने रथमा गोला लागै बिजली गिरै वृक्ष जस आय ॥ तैसे चूरण करि स्यन्दन को पहियाधुरी देय अलगाय ७४ फूटै गोला जब ठुकरे मा बिथरैं पाँच खेतलों भाय ॥ गोली निकरैं तिन गोलन ते ओलनसरिसजायँतहँछाय ७५ बोलि न पावैं कोउ ठाकुर तहँ चुप्पे भूमि देयँ पौढ़ाय ॥ बड़ी दुर्दशा भै तोपन मा तब फिरि मारु वन्दहैजाय ७६ दुनों गोल आगे को बढ़िगे रहिगा डेढ़ खेत मैदान ॥ भाला वलछी की मारुन मा व्याकुलभये सिपाहीज्वान७७ शुण्डा कटिगे हैं हाथिन के रुण्डन हैगा ऊंच पहार ॥ कङ्का कटि कटि गिरैं बछेड़ा घैहा होन लागि सरदार ७८ गंगा ठाकुर कुड़हरि वाला पूरन पटना का सरदार ॥ देवी मरहटा दक्षिण वाला अंगदनृपतिग्वालियरक्यार७९ हिरसिंह विरसिंह बिरिया वाले इनके साथ करें तलवार ॥ भुरा मुगलिया काबुल वाला सय्यद बनरस का सरदार ८० धौंधू धनुवाँ का मुर्त्ता है औ दतियाके बंशगुपाल ॥ चिंता ठाकुर रुसनी वाला गुरखा नृपति शहरबंगाल ८१
नदीबेतवाकासमर । ५०१ ६ कालनेमि औ परसू, सिंहा, ताहर साथ सबै सरदार ॥ भूरी हथिनी सों लखराना। गरुई हाँक कीन ललकार ८२ कौन बहादुर है दिल्ली का रोंकै बाट हमारी आय ॥ इतना सुनिकै ताहर जरिगे बोले सुनो कनौजीराय, ८३ तुम्हरे घरते संयोगिनि को दिल्ली वाले लये लिवाय ॥ वई बहादुर पृथीराज हैं गाँस्यनिनगरमोहोबाआय ८४ काह हकीकति कनवजिया कै जो अब धरै अगारी पायँ ॥ हुकुम पिथौरा का नाहीं है ताते कूच देउ करवाय ८५ इतना सुनिकै लाखिनि बोले ताहर काह गये बौराय ॥ लैकै बिटिया चेरी घरकै रानी कीन पिथौराराय ८६ एकतो बदला है चेरी का दूसर साथ बनाफर क्यार ॥ कसरि न राखै दिल्ली वाले ठाकुर घोड़े के असवार ८७ इतना कहिकै लाखनि राना मारन लाग ढूँढ़ि सरदार ॥ भूरी हथिनी का चढ़वैया नाती बेनचकवै क्यार ८८ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ॥ तैसे पैठ्यो लाखनि राना कोऊ शूर नहीं समुहाय ८६ कायर भागे दुहुँ तरफा ते सायर खूब करैं तलवार ॥ यहु दलगंजन का चढ़वैया ताहर दिल्ली राजकुमार ६० बहुदल मारै रजपूतन का नंदिया बही रक्तकी धार ॥ छूरी मछली के समसोहैं ढालैं कछुवाके अनुहार ६१ बहैं लहाशैं जो मनइन की तिनपर चढ़े गृद्ध विकराल ॥ बार सिवारा समसोहत हैं चहुँदिशिसोहैंश्वानशृगाल९२ बहै अपारा शोणित धारा मज्जन करैं भूत वैताल ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै कागन भई टोंट सब लाल ६३
१० आल्हखण्ड।५०२ तीनि सै हाथी के हलका मा अकसर परे कनौजीराय ॥ देखन लागे चौगिर्दा ते कोउनहिंअपनपरौदिखराय ६४ जितने आये चढ़ि कनउज ते ते सब हटे समर ते भाय॥ मीरा सय्यद धनुवाँ तेली दूनों दीन्हेनि समर वराय ६५ सुफना बोला तब लाखनि ते मानो कही कनौजीराय ॥ सबदल हटिगाहै कनउज का इकले आप रहे मड़राय ६६ हुकुम जु पावैं महाराजा का हथिनी देवैं तुरत भगाय ॥ छुवै न पावैं दिल्ली वाले राजन साँच दीन बतलाय ६७ इतना सुनिकै लाखनि बोले सुफना काह गये बौराय ॥ कहा न माना हम जयचंद का हटका मातु हमारी आय ६८ अब जो भागैं समर भूमि ते तौ रजपूती धर्म नशाय ॥ अमर न देही रामचन्द्र कै ना रहिगये कृष्ण यदुराय ६६ जो कोउ जनमाहै दुनिया मा निश्चय मरै एक दिन भाय ॥ जितने जावैं मरि दुनिया ते पैदा होयँ तड़ाका आय १०० यामें संशय कछु नाहीं है गीता पाठकीन अधिकाय ॥ सुनिकै बातें लखराना की नीचे गयो महाउत आय १०१ फूल पियायो त्यहि भूरी को पक्का पौवा भाँग खवाय ॥ गोटा दीन्ह्यो इक अफीम का ऊपर चढ़ा तड़ाकाधाय १०२ बोला महाउत फिरि लाखनिते ओ महराज कनौजीराय ॥ चारों तरफा दल वादल सों क्याहिदिशिहथिनीदेवैंबढ़ाय १०३ सुनी महाउत की बातें जब बोले फेरि कनौजीराय ॥ ऐसी हाथी हैं पिरथी का भारी ध्वजा रहा फहराय १०४ चलौ तड़ाका दिशि याही को सुफना साँच दीन बतलाय ॥ किरपा ह्वैहै नारायण की पैबै विजय समरमें भाय १०५
नदीबेतवाकासमर। ५०३ ११
सुनिकै बातें लखराना की सुफना हाथी दीन बढ़ाय ॥ अक्सर लाखनि के जियरेपर चहुँदिशिफौजरहीमड़राय १०६ साँकरि फेरै भूरीहथिनी सबदल हटत पछारी जाय ॥ मारत मारत लाखनिराना पहुँचे जहाँ पिथौराराय १०७ आदिभयंकर गज के भूरी मस्तक हना तड़ाकाधाय ॥ आदिभयंकर पाछे हटिगा तब पहिचिना पिथौराराय १०८ लैकै माला गल अपने सों सो लाखनिको दीन पहिराय ॥ जैसे लड़का रतीभान के तैसे पूत कन्नौजीराय १०६ घाटि न जानैं हम ताहरते ओ महराना बात बनाय ॥ तुम अब आवो हमरे दलमा मोहवाशहर लेयँ लुटवाय ११० पारस पत्थर को तुम लीन्ह्यो लोहाछुवत स्वान ह्रैजाय ॥ कहा न मानो तुम ऊदन का घटिहा बंश बनाफरराय १११ खुनस जो मनिहैं तुमतेतनको कनउज शहर लेयँ लुटवाय ॥ बेनचकवै के नाती हौ चाकर साथ कन्नौजीराय ११२ तुम्हरी हीनी नीकि न लागै ताते साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें पृथीराज की बोला फेरि कन्नौजीरायं ११३ चढ़िकै आयन ऊदन सँगमा ना अब घाटि करैं महराज ॥ पारस पत्थर कै गिन्ती ना जो मिलिजाय इन्द्रको राज ११४ तबहूँ लाखनि कहि बदलैंना ओ महराज पिथौराराय ॥ बदला लेवे संयोगिनि का ताते गयन यहाँपर आय ११५ सुनिकै बातें लखराना की माहिल बोला बचन उदार ॥ गहौ कमानियाँ अब हाथे सों राजा दिल्ली के सरदार ११६ डारि कमानियाँ गल लाखनिके अबहीं कैदलेउ करवाय ॥ ओठे मुखकी ई बातें ना जैसे कहै कन्नौजीराय ११७
१२ आल्हाखण्ड । ५०४ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा लीन कमान उठाय ॥ त्यही समैया त्यहि औसरमा रूपन गये नदीपर आय ११८ पानी देखें रक्त वर्ण सब रूपन गये बहुत चक्राय ॥ ऊंची टिकुरी चढ़ि देखतभे चहुँदिशिरुण्डपैरौंदिखराय ११९ पनी पियायो तहँ घोड़े का झावर गयो तड़ाका आय ॥ जहँना तम्बू था द्यावलिका रूपन अटा तड़ाकाधाय १२० द्वारे ठाढ़ी द्यावलि माता रूपन बोला बचन सुनाय ॥ पनी पियावन हम नदी गे तहँ विपरीतपरा दिखराय १२१ हमरे मनते यह आवति है नदिया जुझे कन्नौजीराय ॥ खबरि मँगावो तुम लाखनिकै हमरे धीर धरा ना जाय १२२ इतना सुनिकै द्यावलि माता आल्हा पास पहुँची जाय ॥ खबरि सुनाई सब आल्हाको रूपनगयो जौनबतलाय १२३ बारह रानिन का इकलौता ऊदन लाये ताहि लिवाय ॥ होय हँसौवा सब दुनिया मा जोमरिगेयकन्नौजीराय १२४ सातलाख सों चढ़ा पिथौरा देवो उदयसिंह पठवाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता काह गयी बौराय १२५ गाँजर उसरीथी ऊदन की नदिया लड़ें कन्नौजीराय ॥ कछु नहिं जानैं आल्हा ठाकुर माता साँच दीन बतलाय १२६ नाहिं हँसौवा का डर राखैं प्यारो मोर लहुरवाभाय ॥ जो कहुँ जुझिहैं उदयसिंहजी तौहमकाहकरबफिरिमाय १२७ सुनिकै बातें ये आल्हा की द्यावलि उठी तड़ाका धाय ॥ जहँना तम्बूथा ऊदन का माता अटी तहाँपर आय १२८ आवत दीख्यो जब माता को ऊदन गहा दऊपद जाय ॥ आदर करिकै महतारी का उत्तमआसन दीन बिछाय १२६
[Header] नदीबेतवाकासमर। ५०५ १३
धूप दीप अरु अक्षत चन्दन पूजन हेतु लीन मँगवाय ॥ नदी बेतवा का जल लै कै धोये चरण बनाफरराय १३० विधिवत पूजनकरि माताका बोला फेरि लखुरवाभाय ॥ हुकुम जो पावैं महतारी का सो करिलावैं शीशनवाय १३१ सुनिकै बातें ये ऊदन की द्यावलि बोली आँसुबहाय ॥ परे कन्नौजी हैं सँकरे मा रूपन खबरि जनाई आय १३२ जो कछु होई लखराना का देई दोष सबै संसार ॥ त्यहिते जावो तुम नदियाको बेटा उदयसिंह सरदार १३३ मैं समुझावा भल आल्हा का तिन नहिं माना कहा हमार ॥ गाँजर उसरी थी ऊदन की नदियाकनउजका सरदार १३४ तुम्है मुनासिब अब याही है जावो अवशि पूत यहिबार ॥ सुनिकै बातें ये माता की बेंदुल उपरभयो असवार १३५ गयो तड़ाका त्यहि तम्बूमा ज्यहिमा रहें बनाफरराय ॥ खबरि सुनाई सब आल्हा को दोऊहाथजोरि शिरनाय १३६ हुकुम जो पावैं हम दादा को नदिया जायँ तड़ाका धाय ॥ जयचँद तिलका ते बाचा दै लायन रहें कन्नौजीराय १३७ जियत बनाफर उदयसिंह के इनको बार न बाँकाजाय ॥ करें प्रतिज्ञा जो साँची ना तौ सबजावै धर्म नशाय १३८ सुनिकै बातें उदयसिंह की आल्हा चुप्प साधि रहिजाय। चलिभे ऊदन तब तम्बू ते दोऊहाथ जोरि शिरनाय १३६ लौटिकै आवा फिरि लश्करमा डंका तुरत दीन बजवाय ॥ साजि सिपाही सब जल्दी सों ऊदन कूचदीन करवाय १४० नदीबेतवा को उतरत भा यहु रणवाघु बनाफरराय ॥ मीरासय्यद धनुवाँ तेली दोऊ परे तहाँ दिखलाय १४१
१४ आल्हखण्ड । ५०६ छाँड़े मोर्चा भागति आवैं औरौ परे नजरि सब आय ॥ दह्या बापू की ध्वनि लागी कोऊ पाँव घसीटनजाय १४२ बिना हाथ के कोऊ आवै कोऊ रोवै घाव दिखाय ॥ हाय ! गोसइयाँ दीनबन्धुकहि कोऊ सज्जन रहे मनाय १४३ यह गति दीख्यो जब क्षत्रिनकै बोले तुरत बनाफरराय ॥ सय्यद चाचा तुम बतलावो कहाँपर छूटि कनौजीराय १४४ जो कछु हैहै लाखनि जियका सबके मूड़ लेव कटवाय ॥ इतना सुनिकै सय्यद बोले मानो कही बनाफरराय १४५ तीनिसै हाथी के हलकामा अक्सर परे कनौजी जाय ॥ प्राण आपने लय हम भागे मानो कही बनाफरराय १४६ नहीं आसरा लखराना का तुमते साँच दीन बतलाय ॥ सात लाखलों फौजैं लै कै आवा आप पिथौराराय १४७ शब्द पायकै हनै निशाना त्यहिते कौन आसराभाय ॥ सुनिकै बातें ये सय्यद की ऊदन गये सनाकाखाय १४८ धनुवाँ बोला तब सय्यद ते चलिये फेरि समरको भाय ॥ हमका तुमका जयचंदराजा सौंपा रहै कनौजीराय १४९ सम्मुख जाते महाराजा के सय्यद जियत मौत है जाय ॥ इतना सुनिकै सय्यद लौटे मोर्चा गहा तड़ाका आय १५० धनुवाँ आयो फिरि मोर्चा मा औरौ शूर गये सब आय ॥ तीनिसै हाथीके हलका मा पहुँचा तुरत बनाफरराय १५१ सवैया ॥ लाखनि खोज करें बघऊदन नाहिं मिलय कहुँ ठौर ठिकाना। कूदत फाँदत मारत धावत आवत डंक बजाय निशाना॥
नदीबेतवाकासमर । ५०७ १५ शंक नहीं निरशंक फिरै यहु बंक है ठाकुर ठीक बखाना । काह बखान करै ललिते गुणवान जहान यही हम जाना १५२ बड़ा प्रतापी रणमण्डल मा ठाकुर उदयसिंह सरदार ॥ बहु दलमारा पृथीराज का नदिया बही रक्तकी धार १५३ मारत मारत दल बादल के तब लखिपरे वीर चौहान ॥ बिषधर शायक इक हाथेमा इक लोहेकी गहे कमान १५४ तहँईं दीख्यो लखराना को तब मन ठीक लीन ठहराय ॥ शब्द भेद शर हनै पिथौरा कैसे बचै कन्नौजीराय १५५ जो मरिहैं लाखनि राना तौ सब जैहैं कामनशाय ॥ जो सुनि पैहैं तिलका रानी तौ मरिजाएँ जहरकोखाय १५६ नहीं आसरा यह लाखनि का जो अब धरैं पछारी पायँ ॥ शूर शिरोमणि सबविधि साँचे हमरे मित्र कन्नौजीराय १५७ साम दाम अरु दण्ड भेद ये चारों अङ्ग नीतिके आयँ ॥ इनसों लड़िकै सज्जन क्षत्री पावैं विजय समरमें जाय १५८ यहै सोचिकै ऊदन क्षत्री आपन घोड़ दीन दौराय ॥ जहँपर हाथी पृथीराज का ऊदन अटा तड़ाका धाय १५९ हाथ जोरिकै ऊदन बोले ओ महराज पिथौराराय ॥ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जैसी करो समर में आय १६० ना चढ़ि आये जयचँद राजा ना चढ़िआये राजापरिमाल ॥ राजा राजा का रण सोहै मानो साँच बात नरपाल १६१ लड़िका लाखनि तुम्हरे आगे तिन पर कैसे गहौ कमान ॥ बातें सुनिकै बघऊदन की रहिगा चुप्प साधि चौहान १६२ ऐंड़ लगावा फिरि बेंदुल के हौदा ऊपर पहुँचाजाय ॥
३६ आल्हाखण्ड । ५०८ कलश सुबरण हौदावाला लीन्ह्यो तुरत बनाफराय १६३ स्याबासि स्याबासि कह्यो पिथौरा पाछे हाथी लीन हटाय ॥ तबै कनौजी मन शरमाने ताहर गयो बरोबरि आय १६४ लाखनि ताहर का मुर्चाभा ऊदन और चौंड़िया ज्वान ॥ धाँधू धनुवाँ कै बरणी भै सय्यद भूरूका मैदान १६५ नदी बेतवाके झावर मा बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ ऐसी नाहर कनउज वाले वैसी दिल्लीके सरदार १६६ हौदा हौदा यकमिल हैगा अंकुशभिड़ा महौतनक्यार ॥ पैदल पैदलकै बरणी भै औ असवारसाथ असवार १६७ उरई फौजै दल बादल सों बाजैं छपक छपक तलवार ॥ छुरी कटारी भाला बरछी ऊनाचलै विलाइतिक्यार १६८ तीर तमंचा के मंचा भे भाला बरछिनकेर पगार ॥ मरे कटारिन औ छूरिनके नदिया बही रक्तकी धार १६६ मुएडन केरे मुड़ चौराभे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ हिरसिंह बिरसिंह बिरियावाले दोऊ लड़ैं तहाँसरदार १७० रहिमत सहिमत द्वउ मारेगे हिरसिंह बिरसिंह के मैदान ॥ धाँधू धनुवाँ के मुर्चामा मुर्चा हारिगये चौहान १७१ लाखनि राना के मुर्चामा मरिगे दतिया कें नरपाल ॥ ताहर ठाकुर के मुर्चा मा बेटा देशराजका लाल १७२ तबलौं आये लाखनिराना तिनते फेरि चली तलवार ॥ चढ़ा कनौजी है भूरी पर यहुदलगंजनपरअसवार १७३ तीनि सिरोही ताहर मारी लाखनि लीन ढालपर वार ॥ क्रोधित ह्वैकै लाखनिराना तुरतै कीन्ह्यो गुर्जप्रहार १७४ चोट लागिगै सो घोड़ा के तुरतै भाग सहित असवार ॥