भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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नदी बेतवा का समर । ४६७ ५ चढ़ा पिथौरा सात लाख सों सबियाँ घाट दये रुकवाय ॥ जो तुम लड़िहौ है चाकर सँग तौ रजपूती धर्म नशाय ३४ इतना सुनिकै लाखनि बोले चौंड़ा काहगये बौराय ॥ किरिया कीन्ही हम गंगा में चलिबे साथ बनाफर राय ३५ पाँउँ पिछारी का डरिबे ना चहुतन धजी धजी उड़िजाय ॥ चुवै निशाकर ते आगी चहु औ नभ मिलै धरणि में आय ३६ उवै दिवाकर चहु पश्चिम को सातौं सूखि समुन्दर जायँ ॥ लाखनि भागैं नहिं नदिया ते चौंड़ा साँच दीन बतलाय ३७ इतना सुनिकै जरा चौंड़िया तुरतै दीन्ही ढाल चलाय ॥ होउ बहादुर जो लखराना हमरी ढाल लेउ उठवाय ३८ लाखनि बोले तब धनुवाँ ते लावो ढाल यार यहिबार ॥ दाबि बछेड़ा धनुवाँ चलिभा धाँधू कहा बचन ललकार ३६ पाँउँ अगाड़ी को डारे ना नहिं मुहुँ धाँसि देउँ तलवार ॥ बात न मानी कछु धाँधू की धनुवाँ घोड़े का असवार ४० भाला धमका धाँधू ठाकुर धनुवाँ लैगा वार बचाय ॥ ढाल उठाई जब धनुवाँ ने स्याबासिकह्यो कनौजी राय ४१ लीन कटारी लाखनि राना औ रेतीमा दीन चलाय ॥ होय बहादुर जो दिल्ली को सो अब लेय कटार उठाय ४२ इतना सुनिकै भूरा चलिभा सय्यद उठा तड़ाका धाय ॥ तब ललकारा वहि भूराने सय्यद खबरदार है जाय ४३ कहा न माना कछु भूरा का सय्यद लीन कटार उठाय ॥ सो दैदीन्ही लखराना का चौंड़ा बहुत गयो शरमाय ४४ झुके सिपाही दुहुँ तरफा के फिरितहँ चलन लागि तलवार ॥ पैदल पैदल के बरणी मै औ असवार साथ असवार ४५ ११