भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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नदीबेतवांकासमर । ५६५ ३ ऊदन बोले तब लाखनि ते हमरे बचन करो परमान ॥ संग कनौजी हमहूं चलिबे करिबे घोर शोर घमसान १० मान न रखिबे क्यहु क्षत्री के तुम्हरे संग कनौजी ज्वान ॥ ऊदन लाखनि के मुर्चा ते जैहैं लौटि बीर चौहान ११ इतना सुनिकै लाखनि बोले मानो उदयसिंह सरदार ॥ रतीभान का मैं लड़काहूं नाती बेनचकवै क्यार १२ काह हकीकति हैं दिल्लीपति जो तुम चलो संगमें ज्वान ॥ भूरी हथिनी कछु बूढ़ी ना ना कछु असारोग बलवान १३ संग न लेबे हम काहू को आल्हा बचन करब परमान ॥ इतना कहिकै लाखनि ठाकुर नदी हेतु कीन प्रस्थान १४ धनुवाँ तेली मीरा सय्यद येऊ भये साथ तय्यार ॥ नदी बेतवा के पाँजर मा पहुँचा कनउजका सरदार १५ नौसै हाथी लखरानाके पानी पियनगये त्यहिकाल ॥ पार उतरिगे ते नदी के सहिनहिंसकेघाम बिकराल १६ तब हरिकारा पृथीराज का चौंड़ै खबरि जनाई जाय ॥ बहुतक हाथी पार आयगे मानों कही चौंडियाराय १७ इतना सुनिकै चौंड़ा बाम्हन अपनो हाथी लीन मँगाय ॥ चढ़ा तड़ाका फिरि हाथीपर नदी उपर पहुँचा आय १८ सबियाँ हथिनी लखराना की चौंड़ा तुरत लीन खिदवाय ॥ भगे महाउत सब तहँना ते आये जहाँ कनौजीराय १६ हाल बताइने सब हाथिनका ज्यहिविधिचौंड़ालीनखिदाय ॥ सुनि संदेशा लाखनिराना डंका तुरत दीन बजवाय २० भारी लश्कर लखराना का गर्जति चला समरको जाय ॥ घरी मुहूरत के अरसा मा पहुँचे समरभूमि में आय २१