आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हाखण्ड। ४६४ विद्या पूरण सहदेऊ की कीरति रही जगतमें छाय ३ बड़ा प्रतापी रण मण्डल मा नकुलो समरधनी तलवार ॥ करण न होतो जो दुनिया मा तौ को होत दान वरियार ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो पिथौरा क्यार ॥ नदी बेतवाके डाँड़ेपर लाखनि करी खूब तलवार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ आल्हा ठाकुर के तम्बू मा भारी लाग राज दरवार ॥ त्यही समैया त्यहि औसर मा बोले उदयसिंह सरदार १ घाट बयालस पिरथी रोंके दादा करो कछू तदबीर ॥ इतना सुनिकै आल्हा बोले ऊदन धरो हृदय में धीर २ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर तुरतै पान दीन धरवाय ॥ है कोउ योधा दूनों दल मा जो बितवा पर पान चवाय ३ इतना सुनिकै दोऊ दल के क्षत्री गये सनाकाखाय ॥ बोलि न आवा क्यहु क्षत्री ते सबहिन मूड़ लीन अउँधाय ४ ऊदन तड़पे त्यहि समया मा पहुँचे पाननिकट फिरिजाय ॥ आल्हा बोले तब ऊदन ते मानो कही लघुरवाभाय ५ अबती बारी है लाखनि कै गाँजर फते कीन तुम जाय ॥ नदी बेतवा के मोर्चा पर जावैं अवशि कनौजीराय ६ मीराताल्हन धनुवाँ तेली बोले दोऊ शीश नवाय ॥ तजी सम्पदा सब कनउज की आये लड़न कनौजीराय ७ नव दिन दश दिन भे गौने के सो तजिदई पदमिनी नारि ॥ बीरा खैये लाखनि राना करिये नदी भयानक रारि ८ बात बराबरी की सहिये ना चहिये जायँ नदी पर प्रान ॥ बातैं सुनिकै ये सय्यद की बीरा लीन कनौजी जवान ६