भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 503, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 503

१० आल्हखण्ड।५०२ तीनि सै हाथी के हलका मा अकसर परे कनौजीराय ॥ देखन लागे चौगिर्दा ते कोउनहिंअपनपरौदिखराय ६४ जितने आये चढ़ि कनउज ते ते सब हटे समर ते भाय॥ मीरा सय्यद धनुवाँ तेली दूनों दीन्हेनि समर वराय ६५ सुफना बोला तब लाखनि ते मानो कही कनौजीराय ॥ सबदल हटिगाहै कनउज का इकले आप रहे मड़राय ६६ हुकुम जु पावैं महाराजा का हथिनी देवैं तुरत भगाय ॥ छुवै न पावैं दिल्ली वाले राजन साँच दीन बतलाय ६७ इतना सुनिकै लाखनि बोले सुफना काह गये बौराय ॥ कहा न माना हम जयचंद का हटका मातु हमारी आय ६८ अब जो भागैं समर भूमि ते तौ रजपूती धर्म नशाय ॥ अमर न देही रामचन्द्र कै ना रहिगये कृष्ण यदुराय ६६ जो कोउ जनमाहै दुनिया मा निश्चय मरै एक दिन भाय ॥ जितने जावैं मरि दुनिया ते पैदा होयँ तड़ाका आय १०० यामें संशय कछु नाहीं है गीता पाठकीन अधिकाय ॥ सुनिकै बातें लखराना की नीचे गयो महाउत आय १०१ फूल पियायो त्यहि भूरी को पक्का पौवा भाँग खवाय ॥ गोटा दीन्ह्यो इक अफीम का ऊपर चढ़ा तड़ाकाधाय १०२ बोला महाउत फिरि लाखनिते ओ महराज कनौजीराय ॥ चारों तरफा दल वादल सों क्याहिदिशिहथिनीदेवैंबढ़ाय १०३ सुनी महाउत की बातें जब बोले फेरि कनौजीराय ॥ ऐसी हाथी हैं पिरथी का भारी ध्वजा रहा फहराय १०४ चलौ तड़ाका दिशि याही को सुफना साँच दीन बतलाय ॥ किरपा ह्वैहै नारायण की पैबै विजय समरमें भाय १०५