भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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नदीबेतवाकासमर। ५०३ ११

सुनिकै बातें लखराना की सुफना हाथी दीन बढ़ाय ॥ अक्सर लाखनि के जियरेपर चहुँदिशिफौजरहीमड़राय १०६ साँकरि फेरै भूरीहथिनी सबदल हटत पछारी जाय ॥ मारत मारत लाखनिराना पहुँचे जहाँ पिथौराराय १०७ आदिभयंकर गज के भूरी मस्तक हना तड़ाकाधाय ॥ आदिभयंकर पाछे हटिगा तब पहिचिना पिथौराराय १०८ लैकै माला गल अपने सों सो लाखनिको दीन पहिराय ॥ जैसे लड़का रतीभान के तैसे पूत कन्नौजीराय १०६ घाटि न जानैं हम ताहरते ओ महराना बात बनाय ॥ तुम अब आवो हमरे दलमा मोहवाशहर लेयँ लुटवाय ११० पारस पत्थर को तुम लीन्ह्यो लोहाछुवत स्वान ह्रैजाय ॥ कहा न मानो तुम ऊदन का घटिहा बंश बनाफरराय १११ खुनस जो मनिहैं तुमतेतनको कनउज शहर लेयँ लुटवाय ॥ बेनचकवै के नाती हौ चाकर साथ कन्नौजीराय ११२ तुम्हरी हीनी नीकि न लागै ताते साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें पृथीराज की बोला फेरि कन्नौजीरायं ११३ चढ़िकै आयन ऊदन सँगमा ना अब घाटि करैं महराज ॥ पारस पत्थर कै गिन्ती ना जो मिलिजाय इन्द्रको राज ११४ तबहूँ लाखनि कहि बदलैंना ओ महराज पिथौराराय ॥ बदला लेवे संयोगिनि का ताते गयन यहाँपर आय ११५ सुनिकै बातें लखराना की माहिल बोला बचन उदार ॥ गहौ कमानियाँ अब हाथे सों राजा दिल्ली के सरदार ११६ डारि कमानियाँ गल लाखनिके अबहीं कैदलेउ करवाय ॥ ओठे मुखकी ई बातें ना जैसे कहै कन्नौजीराय ११७