आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआल्हाकामनावन । ४७३ ११
मलखे मरिगे जब सिरसा मा तबहुँ न लड़े चँदेलेराय ॥ मोहिं निकार्यो उन भादों मा दारुण बाणी बज्र चलाय १०५ इतना कहिकै जगनायक सों आल्हा ठाकुर रह्यो चुपाय ॥ ऊदन बोले जगनायक ते भोजनकरो शोक बिसराय १०६ तब जगनायक फिरि बोलत भे मानो कही बनाफरराय ॥ संग न जावो जो मोहबे को हमरो शीश लेउ कटवाय १०७ बातैं सुनिकै जगनायक की द्यावलि कहा बचन समुझाय ॥ विपदा तुम्हरी के संगी हैं समरथ बड़े बनाफरराय १०८ इतना सुनिकै आल्हा बोले माता काह गई बौराय ॥ तीनि तलाकें राजै दीन्हीं सो छाती माँ गई समाय १०६ विपदा भोगी हम मारग में सावन बिकट बादरी घाम ॥ पियैं लयवारिन इन्दल पानी जो सुख चैन करै विश्राम ११० इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ करो तयारी अब मोहबे की पाछिल बात सबै बिसराय १११ इतना सुनिकै आल्हा जरिगे नैनन गई लालरी छाय ॥ तब समुझायो देवा ठाकुर चहिये चलन महोबे भाय ११२ मनै आयगै यह आल्हाके तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥ भोजन करिये जगनायक जी चलिबेअबशिशोमहोबेभाय ११३ भोजन कीन्ह्यो जगनायकजी संग मा उदयसिंह सरदार ॥ जहाँ कचहरी चन्देलेकी आल्हा गये राज दरबार ११४ कही हक़ीक़ति महराजा ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ आज्ञा पावैं महराजा की देखें नगर मोहोबा जाय ११५ चढ़ा पिथौरा दिल्लीवाला लीन्हे सातलाख चौहान ॥ जो नहिं जावैं हम मोहबे को तौ वह लूटै नगर निदान ११६