भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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आल्हाकामनावन । १६७ ५ नहीं तो होते मलखे ठाकुर कैसे चढ़त पिथौरा आय ॥ जियत न जैबे हम कनउजको कौवा मरे हाड़ लै जाय ३५ इतना सुनिकै मल्हना बोली दोऊ नैनन नीर बहाय ॥ राखो ईजति यहि समया मा जल्दी जाउ कनौजै धाय ३६ शोच बिचारन की विरिया ना मैंने बारबार बलिजायँ ॥ इतना सुनिकै जगनिक बोले माई साँच देयँ बतलाय ३७ घोड़ा मँगावो हरनागर को अबहीं जाउँ तड़ाकाधाय ॥ इतना सुनिकै रानी मल्हना ब्रह्मै खबरि दीन पठवाय ३८ माहिल ब्रह्मा जहँ बैठे थे चेरी तहाँ पहुँची जाय ॥ कह्यो सँदेशा सो मल्हना को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३६ सुनि संदेशा रनि मल्हनाका बोला उरई का सरदार ॥ घोड़ न देवो जगनायक कों ब्रह्मा मानु कही यहिबार ४० आल्हा रूठे हैं मोहवे ते कनउज बसे बनाफरराय ॥ घोड़ तुम्हारो फिरि देहैं ना तुमते साँच दीन बतलाय ४१ कहा न माना कछु माहिलका ब्रह्मा घोड़ दीन कसवाय ॥ बड़ी खुशहाली सों जगनायक सबको यथा योग शिरनाय ४२ मनियादेवनको सुमिरन करि घोड़ा उपर भयो असवार ॥ जहाँ पिथौरा दिल्ही वाला पहुँचा उरई का सरदार ४३ खबरि सुनाई जगनायक की माहिल बारबार समुझाय ॥ लेउ बछेड़ा अब हरनागर मानो कही पिथौराराय ४४ इतना सुनिकै पृथीराज ने चौंड़ा बकशी लीन बुलाय ॥ कहि समुझावा सब चौंड़ा ते यहु महराज पिथौराराय ४५ हुकुम पायकै महाराजा को चौंड़ा कूच दीन करवाय ॥ नदी बेतवा के ऊपरमा जगनिक गयो तड़ाका ध्याय ४६