भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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४ आल्हखण्ड । ४६६ बिना बँडुला के चढ़वैया नैया कौन लगेहै पार ॥ दैया मैया सुखदैया जग मैया शारद चरण तुम्हार २३ यहै बिचारत मल्हना रानी तुरतै बोलि लीन प्रतिहार ॥ तुरत बुलावा जगनायक का मैंने जौनु चँदेले क्यार २४ खबरि पायकै जगनाय्कजी तुरतै गये तड़ाका आय ॥ आवत दीख्यो जगनायक को मल्हना उठी तड़ाकाधाय २५ पकरि कै बाहू जगनायक की अपने पास लीन बैठाय ॥ जगनिक बोले महरानी ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय २६ कौन साँकरा है माई पर हमते हाल देउ बतलाय ॥ तुरतै करिकै त्यहि कारज को पाछे शीश नवावों आय २७ इतना सुनिकै मल्हना बोली ईजति राखि लेउ यहिवार ॥ जल्दी जावो तुम कनउजको लावो उदयसिंह सरदार २८ सात लाखलों फौजैं लै कै सागर परा आय चौहान ॥ बारह दिनकी मुहलति दीन्ही त्यरहें लूटी नगर निदान २६ कहि समुझायो तुम आल्हाते की विपदामा होउ सहाय ॥ घाटि न समझा हम ब्रह्मा ते संकट परा आज दिनआय ३० इतना कहिकै रानी मल्हना कागज़ कलम दवाइतिलीन ॥ शिरी सर्बऊ ते भूषित करि पूरण पत्र समापतकीन ३१ सो दै दीन्ह्यो जगनायक को औरो कह्यो बहुत समुझाय ॥ जगनिक बोले तब मल्हनाते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३२ कैसे जावैं हम कनउज को औ मुह कौन दिखावैं माय ॥ सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरा बनिजको जाय ३३ तवै निकरिगे आल्हा ठाकुर तिनते बात न पूछा कोय ॥ विपति विदारण जगतारणकी मर्जी यही आज दिन होय ३४