भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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कीरतिसागरकामैदान । ४६ । ३७ भई सहायी शारद मायी स्वप्ने हाल दीन बतलाय ॥ दया कनौजी लखराना की देखा नगर मोहोबा आय २०६ चढ़ी पिथौरा जो मोहबे का दिल्ली शहर लेब लुटवाय ॥ यहिमा संशय कछु नहीं है माता साँचदीन बतलाय २०७ इतना सुनिकै मल्हना बोली लाखनिराना बचन सुनाय ॥ धन्य कोखिहै वह तिलका कै ज्यहिमारहे कनौजीराय २०८ बिछुरे ऊदन इन मिलवाये हमरी पर्ब दीन करवाय ॥ मोरि गोसैयाँ लखराना हैं जो गाढ़ेमा भये सहाय २०६ सुनिकै बातें ये मल्हना की बोले फेरि कनौजीराय ॥ पुण्य तुम्हारी ते माई सब कीन्हेकाज सिद्धियदुराय २१० सुमिरन करिये जगदम्बा का अम्बा बैठि महल मा जाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै मोहबाशहर लेयँलुटवाय २११ मिला भेंट करि सब काहू सों दोऊ चलत भये सरदार ॥ छाँड़िकै बाना सब योगिनका लश्करकूचभयोत्यहिबार २१२ पार उतरिकै श्री यमुना के कुड़हरि डेरा दीन गड़ाय ॥ सातरोज को धावा करिकै कनउजगये कनौजीराय २१३ मल्हनापहुँची फिरि महलनमा राजा गये फेरि दरबार ॥ गड़े हिंडोला फिरि मोहबे मा घर घर होयँ मंगलाचार २१४ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ परे आलसी खटिया तकि तकि घौं घौं कण्ठ रहा घरांय २१५ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूर भई यह गाथ ॥ देवी देवता ये साँचे हैं इनधच पूर कीन रघुनाथ २१६ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना कैसेकहतललितयहगाय २१७