भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 618 में से

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पृष्ठ 463

३८ आल्हखण्ड । ४६२

रहै समुन्दर में जौलों जल जौलों रहें चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तौलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २१८ करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकान्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरि भगवन्त २१६ पुत्र हमारे जो चारो हैं तिनपर कृपाकरो रघुराज ॥ रामदत्त(१)औकृष्णदत्त(२)औशम्भू(३)ब्रह्मदत्त(४)महराज २२० नन्दै चन्दे औ नन्दै वाणैंमें माधव मास विपति को काल ॥ ब्रह्मदत्त गे ब्रह्मलोक को भे अब इन्द्रदत्त युग साल २२१ सवैया ॥ संवत वनइस उनसठ आदि में माधव मास महादुखदाई । आय गयो विस्फोटक रोग अब शान्त भयो बहु देव मनाई ॥ फेरि अचानक भइ यह बात कि गर्दन फाटिगै फूट कि नाई । ब्रह्मदत्त विरंचीलोक बसे ललिते यहदुःख कहैं निज गाई २२२ भक्त तुम्हारे चारो होवैं यह बर मिलै मोहिं भगवान ॥ कीरतिसागर मदनताल का पूराचरितकीन हमगान २२३ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत कीरतिसागर कीर्त्तिवर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥ कीरतिसागरका मैदान सम्पूर्ण ॥ इति ॥

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