भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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अथ आल्हखण्ड ॥ ठाकुर आल्हसिंहजी कामनावनवर्णन ॥ सवैया ॥ जौन चहै ललिते सुख सम्पति तौन भजैं नित शम्भुभवानी । अक्षत चन्दन पुष्पन बिल्व सों पूजतहैं जे महा कउ ज्ञानी ॥ नाति औ पूत परोसिन ज्ञातिन भांतिन भांति लहैं सुखखानी । बाराणसी रजधानी बिराजत छाजत शम्भु तहाँ सुखदानी १ सुमिरन ॥ ज्ञानी ध्यानी सब जानत हैं जगको शम्भु करैं उपकार ॥ विकट निशानी कलि पापनकी यामें गये सबै मन हार १ योग यज्ञकै चर्चा उठिगै अर्चा होय न एकोबार ॥ विषय कमाई घर घर होवै दर दर उलटिगये व्यवहार २ सन्ध्या तर्पण की चर्चा ना पर्चा ठुमरिन के अधिकार ॥ खर्चा होवै सँग वेश्यन के नारी पती देयँ धिक्कार ३ ऐसे पापी यहिकलियुग मा स्वामी शम्भु करैं उपकार ॥