भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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२ आल्हखण्ड । ४६४ जो तन त्यागै श्री काशी मा सो नर चला जाय भवपार ४ है रजधानी गिरिजापति कै जाहिर तीनि लोक यहिवार ॥ अल्हा मनावन को अबजाई मैने जौनु चँदेले क्यार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया माहिल उरई का परिहार ॥ काम औ धंधा कछु ज्यहिके ना केवल चुगुलिन का बयपार १ सोयकै जागा सो उरई मा घोड़ी तुरत लीन कसवाय ॥ चढ़िकै घोड़ी माहिलठाकुर दिल्ली शहर पहुँचा जाय २ बड़ी खातिरी पिरथी कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ समय पायकै माहिल बोले मानो कही पिथौराराय ३ आल्हा ऊदन हैं कनउज मा मोहबा आपु लेउ लुटवाय ॥ ऐसो अवसर फिरि मिलिहै ना मानो कही पिथौराराय ४ इतना सुनिकै पृथीराज ने डंका तुरत दीन बजवाय ॥ चन्दन गोपी ताहर सजिगे मनमा श्रीगणेश पद ध्याय ५ लैके फौजै सातलाखलों पिरथी कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर मदनतालपर पहुँचा फेरि पिथौरा आय ६ तम्बू गड़िगे चौगिर्दा सों सब रँग ध्वजारहे फहराय ॥ पिरथी बोले फिरि माहिलते राजै खबरि सुनाबो जाय ७ हाल हमारो सब जानत हौ तुमते कहौं काह समुझाय ॥ इतनासुनिकै माहिल चलिभे पहुँचे जहाँ अँदेलेराय ८ हाल बनायो परिमालिक ते माहिल झूठ साँच समुझाय ॥ सुनिकै बातें माहिल मुखते राजा गये सनाकाखाय ९ अवापसीना परिमालिक के शिर सों छत्र गिरामहराय ॥ खबरि पायकै मल्हना रानी माहिलमहल लीनबुलवाय १०