भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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२४ आल्हखण्ड । १४८ झीलम बखतर दोऊ पहिरे रंजित मोहवे का सरदार ५४ ताहर बेटा पृथीराज का सोऊ आयगयो त्यहिबार ॥ गरुई हाँकन ते ललकारा ठाकुर मोहवे के सरदार ५५ कीन ढिठाई तुम अब लग है अब हम साँच देत बतलाय ॥ डोला दैकै चन्द्रावलि का अबहीं कूच देउ करवाय ५६ नहीं तो आशा तजु जीवनकी यमपुर देत आज दिखलाय ॥ दीखि लड़ाई नहिं ताहर की नाहर खबरदार है जाय ५७ इतना कहिकै ताहर ठाकुर रंजित पास पहुँचा जाय ॥ रंजित मारी तलवारी को ताहर लैगा चोट बचाय ५८ ताहर मारा तलवारी का रंजित लीन ढाल पर वार ॥ खैंचि सिरोही रंजित मारी ताहर रोंकिलीन त्यहिबार ५६ जैसे रसरी गगरी लैके पानी खैंचि रही 'पनिहार ॥ तैसे रंजित ताहर दोऊ रणमाँ भली मचाई रार ६० सवैया ॥ मार अपार भई त्यहि बार सो यार सँभार रह्यो कछु नाँहीं। जूझिगये बहु पैदल स्वार तजे हथियार कबों रण नाहीं ॥ जातभये सुरलोक तबै औ जबै तजि प्राण दिये रणमाहीं। कीरति लोक रहै ललिते परलोक बनै क्षण एकहि माहीं ६१ दोऊ प्यारे रघुनन्दन के बन्दन करैं हृदय कत्तार ॥ दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढालपर वार ६२ रंजित चूके तलवारी ते कटिकै मूड़ गिरा त्यहिबार ॥ पूत सपूत माहिलवाला आला उरई का सरदार ६३ सम्मुख ताहर के आवा सो सुर्खा घोड़ेपर असवार ॥