आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकीरतिसागरकामैदान । ४४६ २५ ओ ललकारा फिरि ताहर को सँभरो दिल्ली के सरदार ६४ इतना सुनिकै ताहर बोले अभई बार बार धिकार॥ लिल्लीघोड़ी के चढ़वैया माहिल बाप तुम्हारे यार ६५ तिनके लरिका तुम तलवरिहा कबते भयो कहौ सरदार ॥ इतना सुनिकै अभई ठाकुर अपनी खैंचि लीन तलवार ६६ ताहर अभई दोउ बीरन का परिगा समर बरोबरि आय ॥ रञ्जित जूझे हैं संगर में धावन खबरि सुनाई जाय ६७ खबरि पायकै मल्हना रानी तुरतै गिरी तहाँ कुम्हिलाय ॥ बारह रानी परिमालिक की गिरि गिरि परैं पछाराखाय ६८ रञ्जित रञ्जित कै गुहरावैं छाती धड़कि धड़कि रहिजाय ॥ मारे डरके पिंडुरी काँपैं थर थर देह रही थर्राय ६६ कोगति बरौ चन्द्रावलि कै भलिकैविपत्ति कही ना जाय ॥ सावधान भै मल्हनारानी तुरतै दीन्ह्यो दूत पठाय ७० बोलन लागी चन्द्रावलि ते मनमा बार बार पछिताय ॥ खप्पर भरिगा धिक् बेटी त्वहिं सागर पूत गँवावा आय ७१ इतना कहिकै मल्हना रानी तुरतै गिरी पछाराखाय ॥ गा हरिकारा हाँ मोहबे मा ब्रह्म खबरि जनाई जाय ७२ रञ्जित जूझे हैं सागर पर तिनकी लाश लेहु उठवाय ॥ इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ७३ सजि हरनागर तहँ ठाढ़ो थो तापर कूदि भये असवार ॥ पाँचलाख लौं फौजैं लैंकै सागर चलन हेतु तय्यार ७४ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ७५ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथमें लई ढाल तलवार ॥ १९