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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

कीरतिसागरकामैदान । ४४६ २५ ओ ललकारा फिरि ताहर को सँभरो दिल्ली के सरदार ६४ इतना सुनिकै ताहर बोले अभई बार बार धिकार॥ लिल्लीघोड़ी के चढ़वैया माहिल बाप तुम्हारे यार ६५ तिनके लरिका तुम तलवरिहा कबते भयो कहौ सरदार ॥ इतना सुनिकै अभई ठाकुर अपनी खैंचि लीन तलवार ६६ ताहर अभई दोउ बीरन का परिगा समर बरोबरि आय ॥ रञ्जित जूझे हैं संगर में धावन खबरि सुनाई जाय ६७ खबरि पायकै मल्हना रानी तुरतै गिरी तहाँ कुम्हिलाय ॥ बारह रानी परिमालिक की गिरि गिरि परैं पछाराखाय ६८ रञ्जित रञ्जित कै गुहरावैं छाती धड़कि धड़कि रहिजाय ॥ मारे डरके पिंडुरी काँपैं थर थर देह रही थर्राय ६६ कोगति बरौ चन्द्रावलि कै भलिकैविपत्ति कही ना जाय ॥ सावधान भै मल्हनारानी तुरतै दीन्ह्यो दूत पठाय ७० बोलन लागी चन्द्रावलि ते मनमा बार बार पछिताय ॥ खप्पर भरिगा धिक् बेटी त्वहिं सागर पूत गँवावा आय ७१ इतना कहिकै मल्हना रानी तुरतै गिरी पछाराखाय ॥ गा हरिकारा हाँ मोहबे मा ब्रह्म खबरि जनाई जाय ७२ रञ्जित जूझे हैं सागर पर तिनकी लाश लेहु उठवाय ॥ इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर डंका तुरत दीन बजवाय ७३ सजि हरनागर तहँ ठाढ़ो थो तापर कूदि भये असवार ॥ पाँचलाख लौं फौजैं लैंकै सागर चलन हेतु तय्यार ७४ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद उच्चार ॥ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग ब्यवहार ७५ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथमें लई ढाल तलवार ॥ १९

३६ आल्हखण्ड । ४५० आगे हलका भा हाथिन का पाछे चले घोड़ असवार ७६ अभई ठाकुर ह्वाँ ताहर का होवै खूब भड़ाभड़ मार ॥ दूनों मारैं तलवारी सों दूनों लेयँ ढालपर वार ७७ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ७८ को गति बरणै त्यहि समया कै आमाझोर चलै तलवार ॥ बार चूकिगा माहिलवाला झूझा उरई का सरदार ७९ रञ्जित अभई दुउ ठकुरन के उठि उठि रुण्ड करें तलवार ॥ सुरपुर पहुँचे दोऊ ठाकुर ब्रह्मा आयगयो त्यहिबार ८० लाश पाय कै दुउ बीरन कै मोहबे तुरत दीन पठवाय ॥ सुमिरिगजानन शिवशङ्करको मारन लाग फौज मा जाय ८१ ब्रह्मा मारै तलवारी सों घोड़ा टापन देय गिराय ॥ ब्रह्मा ठाकुर के मुर्च्चामा सईनिगयो तड़ाका आय ८२ हँसिकै बोला सो ब्रह्माते ठाकुर साँच देयँ बतलाय ॥ डोला दैकै चन्द्रावलि का पवनी करो आपनी जाय ८३ सुनिकै बातें ये सईनि की बोला मोहबे का सरदार ॥ नाम न लीन्हे अब डोलाका नहिं मुखघाँसिदेउँ तलवार ८४ सुनिकै बातें ये ब्रह्माकी सईनि मारा गुर्ज उठाय ॥ वार रोकि कै ब्रह्माठाकुर तुरतै दीन्ह्यो मूड़ गिराय ८५ मईनि आवा तब सम्मुखमा सोऊ वार चलावा आय ॥ खाली वार परी मईनि कै ब्रह्मा दीन्ह्यो मूड़ गिराय ८६ मईनि सईनि दोऊ झूझे माहिल अटे तड़ाका धाय् ॥ हाल बतावा पृथीराज का माहिल बारबार समुझाय ८७ इकले ब्रह्मा हैं मोहवेमा तिनका आप लेउ बँधवाय ॥

[Header] कीरतिसागरकामैदान । ४५ । २७

मर्दनि सर्दनि दोऊ जूझे अब तुम चढ़ो पिथोराराय ८८ सुनिकै बातें ये माहिल की हाथी तुरत लीन सजवाय ॥ सुमिरि भवानीसुत गणेश को पहुँचा समरभूमिमा आय ८६ चौंड़ा बकशी का बुलवावा औ यह हुकुम दीन फरमाय ॥ जितने डोलाहैं सागर में सबका अबै लेउ लुटवाय ६० पाछे, मल्हना चन्द्रावलि का दिल्ली शहर देउ पठवाय ॥ हुकुम पायकै पृथीराज का तहँपर अटा चौंड़िया धाय ६१ लाखनि बोले हाँ ऊदन ते नाहर सुनो बनाफरराय ॥ कीरतिसागर मदनताल पर चलिये बेगि लहुरवाभाय ६२ सुनिकै बातें लखराना की डङ्का तुरत दीन बजवाय ॥ सजे सिपाही कनउज वाले मनमा फूलमतीको ध्याय ६३ सुमिरि भवानी महरानी को दानी तीनिलोक की माय ॥ फूलमती पद बन्दन कैकै हाथी चढ़ा कनौजीराय ६४ चढ़ा बेंदुला का चढ़वैया मैया शारद चरण मनाय ॥ ध्याय भवानीसुत गणेश को देवा चढ़ा मनोहर जाय ६५ मीराताल्हन बनरस वाले सोऊ बेगि भये असवार ॥ योगिहा बाना मर्दाना सब ठाकुर भये समर तय्यार ६६ धुरपद संगीत तिल्लाना गावन लागे मेघमलार ॥ घोर घटा हैं कहुँ सावन के आवन प्रीतम केरि बहार ६७ सोचैं विरहिनी घर आँगन में जब कहुँ परै पर्ब त्यवहार ॥ प्रीतम होते जो सावन में तौ दुख दावन जात हमार ६८ को गति वर्णै त्यहि समया कै ऊदन गावैं मेघमलार ॥ पावन वर्षा है सावन कै जङ्गल देखि परै हरियार ६६ फसल आँबकी नर बागन में जंगल देखि परै गुलजार ॥

२८ आल्हखण्ड । १५३ काली जामुन काले मेघा नीचे ऊपर करें बहार १०० योगी पहुँचे मदनताल पर यारो सुनो कथा यहिवार ॥ चौंड़ा ठाढ़ो तट मल्हना के बकशी जौनुपिथौराक्यार १०१ कहन सँदेशा सो जब लाग्यो आयो देशराज के लाल ॥ धरिकै डाट्यो तहँ चौंड़ाका झगरा काह करें नरपाल १०२ कीनि प्रतिज्ञा हम रानी ते तुम्हरी पर्व व्याव करवाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै लूटैं मदनताल पर आय १०३ इतना सुनिकै ताहर जरिगे अपनी खैंचिलीन तलवार ॥ तब लखराना कनउज वाला सम्मुखभयो तुरत सरदार १०४ ताहर लाखनि का मुर्चा भा चौंड़ा मैनपुरी चौहान ॥ कोगति वरणै बघऊदन कै लागो करन खूब घमसान १०५ हौदा हौदा बेंदुल नाचैं ऊदन करें खूब तलवार ॥ बावनहौदा खाली हैगे जूझे हाथिन के असवार १०६ चोट लागिगै कछु धाँधू के सोऊ गिरे मूर्च्छाखाय ॥ सँभरिकै बैठे फिरि हौदा पर मनमाशोचिशोचिरहिजाय १०७ बड़े लड़ैया सब योगी हैं मुर्चा पूरे दीन जमाय ॥ अपने अपने सब मुर्चन मा ठकुरन दीन्ही राखिबढ़ाय १०८ ललातमोली धनुवाँ तेली सय्यद बनरस का सरदार ॥ लाखनि ऊदन देवाठाकुर रणमा खूब करें तलवार १०६ कोगति वरणै तहँ ताहर कै नाहर दिल्ली का सरदार ॥ चौंड़ा धाँधू कछु कमती ना येऊ करें भड़ाभड़ मार ११० चलै सिरोही भल सागर में ऊना चलै विलाइति क्यार ॥ खट खट खट खट तेगा बोलै बोलै छपकछपक तलवार १११ झलझल् झलझल् छूरीचमकै चमकै रणमा खूब कटार ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४५३ २६ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा की ललकार ११२ सन् सन् सन् सन् गोली छूटैं तीरन मन्न मन्न गा छाय ॥ फर फर फर फर घोड़ा रपटैं लपटैं देह देह में धाय ११३ को गति बरसै रजपूतन कै उठि उठि रुण्ड करैं तलवार ॥ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ११४ चहला द्वैगा चार कोसलों नदिया बही रक्तकी धार ॥ लड़े पिथौरा तहँ सँभराभर राजा दिल्ली का सरदार ११५ शब्द पायकै तीर चलावै कलयुग यही एकही ज्वान ॥ अबयहि समय यहि औसरमा ताहर लाखनि का मैदान ११६ देवा धाँधूकै मुर्चा मा जूझे बहुत सिपाही ज्वान ॥ पिरथी बोले फिरि चौंड़ाते हमरे बचन करो परमान ११७ रानी मल्हना चन्द्रावलि का डोला तुरत लेउ उठवाय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी डोलन पास पहुँचा जाय ११८ खबरि सुनाई सब मल्हना का जो जो कहा पिथौराशय ॥ सुनि संदेशा पृथीराज का मल्हना बोली बचन सुनाय ११९ जबै बनाफर उदयसिंह थे तब नहिं चढ़े पिथौराराय ॥ बाँधिकै मुशकै सब लड़िकन की मड़ये पाँय लिह्यानि पुजवाय १२० हथी पछारथनि जब द्वारेपर तब कहँ गये पिथौराराय ॥ ब्याहे ब्रह्मा गे दिल्ली मा समरथ हते बनाफरराय १२१ ब्रह्मा रञ्जित द्वउ लरिकन ते कीन्हेनि रारि आय महराज ॥ रारि मचैहें जो नारिन ते तौ सब द्वैहैं काज अकाज १२२ इतना सुनिकै चन्द्रावलिकैं पलकी तुरत लीन उठवाय ॥ चलिभा चौंड़ा लै पलकी को पहुँचा पद्म पेड़ तर जाय १२३ रोवै मल्हना त्यहि समय मा गिरि गिरि परै पछाराखाय ॥

३० आल्हखण्ड । ४५४ ऊदन ऊदन कै गुहरावै कहँ तुम गये फंनाफरराय १२४ लाउ शारदा यहि समया मा आल्हा केर लहुरवा भाय ॥ बिना इकेले बघऊदन के डोला कौन छुड़ाई जाय १२५ सदा भवानी ज्यहि दाहिनहैं ज्यहिघर सिद्धिकरैं गनेश ॥ पारस पत्थर ज्यहिके घर मा पूरित विभो सदा धनेश १२६ भई सहायी शारद मायी ऊदन आयगये त्यहिकाल ॥ हाथ जोरिकै योगी बोले लाला देशराजके लाल १२७ भिक्षा पावैं जो मैया हम तौ अब हरद्वार को जायँ ॥ इतना सुनिकै मल्हना रोई बोली आरत वैन सुनाय १२८ रही न ईजति अब मोहवे की पलकी लीन चौंड़िया आय ॥ जायकै पहुँचा पाँच विरवातर हा दैयागति कही न जाय १२६ विना बेंदुला के चढ़वैया नैया कौन लगैहै पार ॥ चीरिकै धरती ऊदन आवो ईजति राखिलेउ यहिवार १३० इतना सुनिकै ऊदन योगी घोड़ा तुरत दीन रपटाय ॥ जायकै पहुँचा पाँच विरवातर यहु रणबाघ लहुरवाभाय १३१ चौंड़ा दीख्यो जब ऊदन का सम्मुख हाथी दीन बढ़ाय ॥ औ ललकारा फिरि योगी का काहे प्राण गवाँवो आय १३२ इतना सुनिकै ऊदन योगी गरुई हाँक दीन ललकार ॥ डोला धरिदे चन्द्रावलि का चौड़ामानुकही यहि बार १३३ धोखे योगी के भूले ना अबहीं योग देउँ दिखलाय ॥ ऐंड़ लगाई फिरि बेंदुल के हाथी उपर पहुँचा जाय १३४ ढाल कि औझड़ ऊदन मारी चौंड़ा गयो मूर्छाखाय ॥ लैके डोला चन्द्रावलि का मल्हनापास दीनरखवाय १३५ देवा ठाकुर ते फिरि बोले अब तुम रहो यहाँपर भाय ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४५५ ३१ अब हम जावत त्यहि दलमाहैं जयहिमालड़े चँदेलाराय १३६ जितने योगी हैं सागर में सबियाँ बेगि होयँ तय्यार ॥ लाखनि आये हैं मुर्चा ते तिनकेसाथ चलैं सरदार १३७ इतना सुनिकै सबियाँ योगी तुरतै होन लागि तय्यार ॥ हिरासिंह.बिरासिंह बिरियावाले चन्दन दतिया के सरदार १३८ चिंता राजा रुसनीवाला औ पतउँज के मदनगुपाल ॥ पूरनराजा पूरा वाला जगमनिजिन्सीकानरपाल १३६ बारह कुँवर बनौधा वाले चारो गाँजर के सरदार ॥ चिन्ता दूसर गोरखपुर के रूपनि मधुकरसिंह उदार १४० ये सब योगी सजि सागर में रणका चलन हेतु तय्यार ॥ मीराताल्हन बनरस वाले सिरगा घोड़ेपर असवार १४१ सुमिरि भवानी फूलमती को हाथी चढ़ा कनौजीराय ॥ सुमिरि शारदा मैहरवाली आगे चला बनाफरराय १४२ उतसों सेना पृथीराज की सोऊ गई बरोबरि आय ॥ चली सिरोही फिरि सागरपर अद्भुतसमरकहा ना जाय १४३ ना मुँह फेरैं कनउज वाले ना ई दिल्ली के चौहान ॥ कीरतिसागर मदनताल पर क्षत्रिन कीन खूब मैदान १४४ कटि कटि कल्ला गिरैं बछेड़ा चेहरा गिरैं सिपाहिन केर ॥ बिना सूँढ़ि के हाथी घूमैं मारैं एक एकको हेर १४५ आदिभयङ्कर का चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥ भूरी हथिनी पर लखराना सम्मुखगयो तड़ाकाआय १४६ ब्रह्मा ताहर का मुर्चा है दोऊ खूब करैं तलवार ॥ चौंड़ा ऊदन का रण सोहै धाँधू बनरस का सरदार १४७ सवापहर लों चली सिरोही नदिया बही रक्त की धार ॥

३२ आल्हखण्ड । ४५६ ढालै कच्छा छूरी मच्छा वारन मानो नदी सिवार १४८ नचैं योगिनी खप्पर लीन्हे ठोकैं ताल भूत बैताल ॥ लूटि मचाई भल गृद्धन है फौजैं कुत्तनकी विकराल १४६ भल बनिआई तहँ चील्हन की कागन लागी कारि बजार ॥ लै लै सौदा चले श्रृगालौ आंतनमाल कण्ठमें धार १५० लाखनि पिरथी के मुर्चा मा लागी चलन खूब तलवार ॥ हौदन हौदन के ऊपर मा घूमै बेंदुल का असवार १५१ जूझक कंकण सवालाख का सो हाथे मा करै बहार ॥ त्यहिकादीख्यो जब पिरथीपति राजा दिल्ली के सरदार १५२ तब पहिंचान्यो बघऊदन का निश्चय ठीक लीन ठहराय ॥ लाखनिराना है सम्मुख मा ज्यहिमम हाथीदीनहटाय १५३ यहै शोचिकै पृथीराज ने दीन्ह्यो मारु बन्द करवाय ॥ बढ़िगे डोला महरानिन के सागर उपर पहुँचे जाय १५४ दक्षिण दिशि मा परा पिथौरा उत्तर उदयसिंह सरदार ॥ लाखनि बोले ह्याँ मलहना ते रानी करो अपन त्यवहार १५५ इतना सुनिकै तहँ चन्द्रावलि सीढ़िन उपर बैठिगै जाय ॥ पात मँगाये तहँ पुरइन के सुन्दरि दोनी लीनबनाय १५६ छोड़ि दोनइया दी सागर में माहिल दीख तमाशा आय ॥ लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया पिरथी पास पहुँचा जाय १५७ खबरि बताई सब सागर की माहिल बार बार समुझाय ॥ हाल पायकै पृथीराज ने चौंडा बकशी दीनपठाय १५८ छँड़ी दुनैया जब चन्द्रावलि चौंडा हाथी दीन बढ़ाय ॥ रोयकै बोली तब चन्द्रावलि पबनीकिहिसिखोंटियहुआय१५६ बिना बेंदुलाके चढ़वैया को अब दुनिया लेय बचाय ॥

कीरतिसागरकामैदान । ४५७ ३३ जों कहुँ दुनिया चौंड़ा लैगा हमरी पर्व खोंटि है जाय १६० सुनिकै बातैं चन्द्रावलि की बोला तुरत कनौजीराय ॥ लेउ दोनइया उदयसिंह तुम मानो कही बनाफरराय १६१ इतना सुनिकै उदयसिंह ने अपनो दीन्ह्यो घोड़ बढ़ाय ॥ तबै चौंड़िया ने ललकारा योगी खबरदार है जाय १६२ पैहौ दोनी ना सागर में आपन प्राण गवाँये आय ॥ इतना कहिकै चौंड़ा बकशी भालामार्थो तुरतचलाय १६३ वार बचाई तहँ भाला की तुरतै दोनी लीन उठाय ॥ लैकै दोनी दी बहिनी को बहिनी वार वार बलिजाय १६४ सूजी खोंसैं अब क्यहि के हम नहिं घर आज लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै मल्हना बोली चन्द्रावलिकोबचनबुझाय१६५ खोंसो सूजी तुम योगिन के जिन अब पबनी दीन कराय ॥ इतना सुनिकै चन्द्रावलि फिरि पहुँचीउदयसिंहढिगजाय १६६ कीन इशारा तब लाखनि का यहु रणबाघू बनाफरराय ॥ लाखनि बोले तब ऊदन ते हमरो मूड़ कटायो आय १६७ माल खजाना कछु लाये ना देवैं कौन नेगु ह्याँ आय ॥ तहिले पहुँची चन्द्रावलि तहँ सूजी धरी कानपर जाय १६८ बाइस हाथी तीनि पालकी दीन्ह्यो नेगु कनौजीराय ॥ सूजी खोंसी जब ऊदन के जूझकोकंकणदीनगहाय१६९ देखिकै कंकण उदयसिंह का निश्चय मनै लीन ठहराय ॥ साँचो योगी यहु ऊदन हैं मातैकहावचनसमुझाय १७० सुनिकै बातैं चन्द्रावलि की ऊदन नाम दीन बतलाय ॥ बड़ी खुशहाली भै सागर में सबकोउमिलींतहाँपरआय१७१

३४ आल्हखण्ड । ४५८ सवैया ॥ मीन मिलै जलको बिछुरे जिमि पङ्कज भानु यथा सुखदाई । त्योंहि मिली परिमाल कि नारि सो डारितहाँ विपदासमुदाई ॥ नैनन मोचत बारि निहारि सो नारिनकी तहँ लागि अथाई । कौन बखान करै ललिते सुख सम्पति आय तहाँ सब छाई १७२ मिलाभेंट करि सब ऊदन ते सागर सूजी रहीं सिराय ॥ बीर भुगंतै औ धाँधू को पठयो फेरि पिथौराराय १७३ लै दल बादल दोऊ आये दोनी लेन हेतु ततकाल ॥ लाखनि बोले तब ऊदन ते सुनियेदेशराजके लाल १७४ लैगे दोनी जो दिल्ली के हमरो मान भंग ह्वै जाय ॥ बट्टा लागी रजपूती माँ औ सब क्षत्री धर्मनशाय १७५ बातैं सुनिकै लखराना की ऊदन अटे तड़ाका धाय ॥ धाँधू बोले तब ऊदन ते योगीसाँच देयँ बतलाय १७६ निकट दुनैया के जायो ना नहिं शिर देवैं अबै गिराय ॥ बात न मानी कछु धाँधू की ऊदन दोनी लीनउठाय १७७ देखि तमाशा यहु ऊदन का धाँधू खैंचि लीन तलवार ॥ कीरतिसागर की सिढ़ियन मा लागीहोन भड़ाभड़ मार १७८ झुके सिपाही दिल्लीवाले दोऊ हाथ करें तलवार ॥ को गतिवरणै तहँ ऊदन कै ठाकुर बैंदुलका असवार १७९ फिरि फिरि मारै औ ललकारै यहु रणबाघु - बनाफरराय ॥ हटिगा मुर्चा तहँ धाँधूका कोउ रजपूत न रोकै पायँ १८० बीर भुगंता कोपित ह्वैकै अपनो हाथी दीन बढ़ाय ॥ मीरा सय्यद बनरस वाले सम्मुख गये तड़ाकाधाय १८१

कीरतिसागरकामैदान । ४५६ ३५ ऐंड़ लगावा जब घोड़े के हौदा उपर पहूँचाजाय ॥ गुर्ज चलावा बीरभुगन्ता सय्यद लैगे चोट बचाय १८२ ढाल कि औझड़ सय्यद मारी नीचे गिरा महाउत आय ॥ तहिले धाँधू तहँ आवत भा औ सय्यदकोदीनहटाय १८३ मारन लाग्यो रजपूतनका धाँधूझाय पिथौरा क्यार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया वही रक्तकी धार १८४ ना मुँहँ फेरै कनउजवाले ना ई दिल्ली के सरदार ॥ मूडन केरे मुड़चौराभे औ रुण्डनके लगेपहार १८५ शूर सिपाही दुहुँ तरफाके दूनों हाथकरैं तलवार ॥ कायर भागे समर भूमिते अपने डारि डारि हथियार १८६ तहिले माहिल गे तम्बूमें औ पिरथी ते कहाहवाल ॥ जीति न होई महराजाअब आयो देशराज को लाल १८७ ऊदन जावैं जब मोहबे ते तब फिरि चढ़यो पिथौराराय ॥ तुम्हें मुनासिब अब याही है देवो मारु बन्द करवाय १८८ सुनिकै बातें तहँ माहिल की तैसो कियो पिथौराराय ॥ मर्दनि सर्दनि सूरज टंको जूझे समरभूमि में आय १८६ इकसै हाथी गिरे खेतमें घोड़ा जूझे पाँच हजार ॥ लाखयुग्मकी तहँ संख्यामा जूझे दिल्लीके सरदार १६० रंजित अभई दूनों जूझे घोड़ा जूझे चार हजार ॥ डेढ़ लाख दल पैदल जूझे संख्या मोहबेकी त्यहिबार १६१ छप्पन हाथी मोहबे वाले मारा रहै पिथौराराय ॥ मेख उखरिगै फिरि सागर ते पिरथी कूच दीनकरवाय १६२ तजिकै शंका अहतंका के डंका तुरत दीन बजवाय ॥ कैयो दिनका धावा करिकै दिल्ली गयो पिथौराराय १६३

३६ आल्हाखण्ड । ४६० ह्वाँ सुधिपाई परिमालिक ने आये देशराज के लाल ॥ वन्दन कैकै यदुनन्दन को पलकी चढ़े रजापरिमाल १६४ कीरतिसागर मदनतालपर आये तुरत चँदेलेराय ॥ हाथ पकरिकै तहँ ऊदन का औछातीमा लीनलगाय १६५ पगिया धरदइ फिरि पैरन मा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ हाथ जोरिकै उदयसिंह तहँ आपनिकथा गयेसबगाय १६६ सुनिकै बातें उदयसिंह की बोले फेरि चँदेलेराय ॥ पारस पत्थर तुम लैलेवो भोगो राज्य बनाफरराय १६७ तुमका सौंपत हम ब्रह्माका ऊदन मानो कही हमार ॥ तुम जो जैहौ अब कनउज को तौ को धर्म निवाहन हार १६८ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची सुनो रजापरिमाल ॥ तीन तलाकें हमका दीन्ही सो अब रहीं करेजेशाख १६६ कहा मानिकै तुम माहिल का नाकछुकीन्ह्यो तनक विचार ॥ मोहिं निकारयो तुम भादों मा राजा मोहबे के सरदार २०० इतना सुनिकै मल्हना बोली साँची सुनो लहुरवाभाय ॥ जो तुम जैहौ अब कनउज का पिरथी मोहबालेय लुटाय २०१ दूध आपनो हम प्यावा है स्यावा तुम्हें बनाफरराय ॥ बैस बुढ़ापा मा दुखपावा रंजित मरे समरमा आय २०२ अबनहिं जावो तुम कनउजको मानों कही लहुरवा भाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिर नाय २०३ एक महीना दिन बारा भे कनउज तजे मोहिं अब माय ॥ जो नहिं जावैं अब कनउजका भाई आल्हा उठै रिसाय २०४ कीन बहाना हम गाँजर का आयन नगर मोहोबा धाय ॥ देश निकासी हमरी द्वैहै जो कहूँ सुनी बनाफरराय २०५

कीरतिसागरकामैदान । ४६ । ३७ भई सहायी शारद मायी स्वप्ने हाल दीन बतलाय ॥ दया कनौजी लखराना की देखा नगर मोहोबा आय २०६ चढ़ी पिथौरा जो मोहबे का दिल्ली शहर लेब लुटवाय ॥ यहिमा संशय कछु नहीं है माता साँचदीन बतलाय २०७ इतना सुनिकै मल्हना बोली लाखनिराना बचन सुनाय ॥ धन्य कोखिहै वह तिलका कै ज्यहिमारहे कनौजीराय २०८ बिछुरे ऊदन इन मिलवाये हमरी पर्ब दीन करवाय ॥ मोरि गोसैयाँ लखराना हैं जो गाढ़ेमा भये सहाय २०६ सुनिकै बातें ये मल्हना की बोले फेरि कनौजीराय ॥ पुण्य तुम्हारी ते माई सब कीन्हेकाज सिद्धियदुराय २१० सुमिरन करिये जगदम्बा का अम्बा बैठि महल मा जाय ॥ काह हकीकति है पिरथी कै मोहबाशहर लेयँलुटवाय २११ मिला भेंट करि सब काहू सों दोऊ चलत भये सरदार ॥ छाँड़िकै बाना सब योगिनका लश्करकूचभयोत्यहिबार २१२ पार उतरिकै श्री यमुना के कुड़हरि डेरा दीन गड़ाय ॥ सातरोज को धावा करिकै कनउजगये कनौजीराय २१३ मल्हनापहुँची फिरि महलनमा राजा गये फेरि दरबार ॥ गड़े हिंडोला फिरि मोहबे मा घर घर होयँ मंगलाचार २१४ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ परे आलसी खटिया तकि तकि घौं घौं कण्ठ रहा घरांय २१५ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूर भई यह गाथ ॥ देवी देवता ये साँचे हैं इनधच पूर कीन रघुनाथ २१६ आशिर्वाद देउँ मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना कैसेकहतललितयहगाय २१७

३८ आल्हखण्ड । ४६२

रहै समुन्दर में जौलों जल जौलों रहें चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तौलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २१८ करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकान्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरि भगवन्त २१६ पुत्र हमारे जो चारो हैं तिनपर कृपाकरो रघुराज ॥ रामदत्त(१)औकृष्णदत्त(२)औशम्भू(३)ब्रह्मदत्त(४)महराज २२० नन्दै चन्दे औ नन्दै वाणैंमें माधव मास विपति को काल ॥ ब्रह्मदत्त गे ब्रह्मलोक को भे अब इन्द्रदत्त युग साल २२१ सवैया ॥ संवत वनइस उनसठ आदि में माधव मास महादुखदाई । आय गयो विस्फोटक रोग अब शान्त भयो बहु देव मनाई ॥ फेरि अचानक भइ यह बात कि गर्दन फाटिगै फूट कि नाई । ब्रह्मदत्त विरंचीलोक बसे ललिते यहदुःख कहैं निज गाई २२२ भक्त तुम्हारे चारो होवैं यह बर मिलै मोहिं भगवान ॥ कीरतिसागर मदनताल का पूराचरितकीन हमगान २२३ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत कीरतिसागर कीर्त्तिवर्णनोनामद्वितीयस्तरंगः २ ॥ कीरतिसागरका मैदान सम्पूर्ण ॥ इति ॥

अथ आल्हखण्ड ॥ ठाकुर आल्हसिंहजी कामनावनवर्णन ॥ सवैया ॥ जौन चहै ललिते सुख सम्पति तौन भजैं नित शम्भुभवानी । अक्षत चन्दन पुष्पन बिल्व सों पूजतहैं जे महा कउ ज्ञानी ॥ नाति औ पूत परोसिन ज्ञातिन भांतिन भांति लहैं सुखखानी । बाराणसी रजधानी बिराजत छाजत शम्भु तहाँ सुखदानी १ सुमिरन ॥ ज्ञानी ध्यानी सब जानत हैं जगको शम्भु करैं उपकार ॥ विकट निशानी कलि पापनकी यामें गये सबै मन हार १ योग यज्ञकै चर्चा उठिगै अर्चा होय न एकोबार ॥ विषय कमाई घर घर होवै दर दर उलटिगये व्यवहार २ सन्ध्या तर्पण की चर्चा ना पर्चा ठुमरिन के अधिकार ॥ खर्चा होवै सँग वेश्यन के नारी पती देयँ धिक्कार ३ ऐसे पापी यहिकलियुग मा स्वामी शम्भु करैं उपकार ॥

२ आल्हखण्ड । ४६४ जो तन त्यागै श्री काशी मा सो नर चला जाय भवपार ४ है रजधानी गिरिजापति कै जाहिर तीनि लोक यहिवार ॥ अल्हा मनावन को अबजाई मैने जौनु चँदेले क्यार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ लिल्ली घोड़ी का चढ़वैया माहिल उरई का परिहार ॥ काम औ धंधा कछु ज्यहिके ना केवल चुगुलिन का बयपार १ सोयकै जागा सो उरई मा घोड़ी तुरत लीन कसवाय ॥ चढ़िकै घोड़ी माहिलठाकुर दिल्ली शहर पहुँचा जाय २ बड़ी खातिरी पिरथी कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ समय पायकै माहिल बोले मानो कही पिथौराराय ३ आल्हा ऊदन हैं कनउज मा मोहबा आपु लेउ लुटवाय ॥ ऐसो अवसर फिरि मिलिहै ना मानो कही पिथौराराय ४ इतना सुनिकै पृथीराज ने डंका तुरत दीन बजवाय ॥ चन्दन गोपी ताहर सजिगे मनमा श्रीगणेश पद ध्याय ५ लैके फौजै सातलाखलों पिरथी कूच दीन करवाय ॥ कीरतिसागर मदनतालपर पहुँचा फेरि पिथौरा आय ६ तम्बू गड़िगे चौगिर्दा सों सब रँग ध्वजारहे फहराय ॥ पिरथी बोले फिरि माहिलते राजै खबरि सुनाबो जाय ७ हाल हमारो सब जानत हौ तुमते कहौं काह समुझाय ॥ इतनासुनिकै माहिल चलिभे पहुँचे जहाँ अँदेलेराय ८ हाल बनायो परिमालिक ते माहिल झूठ साँच समुझाय ॥ सुनिकै बातें माहिल मुखते राजा गये सनाकाखाय ९ अवापसीना परिमालिक के शिर सों छत्र गिरामहराय ॥ खबरि पायकै मल्हना रानी माहिलमहल लीनबुलवाय १०

आल्हाकामनावन । ४६५ ३ मल्हनावोली फिरिमाहिल ते काहे चढ़े पिथौराराय ॥ इतना सुनिकै माहिल बोले बहिनी साँच देयँ बतलाय ११ उड़न बछेड़ा पाँचो चाहें पारस चहैं पिथौराराय ॥ डोला चाहें चन्द्रावलि का ताहर साथ बियाही जाय १२ बैठक चाहें खजुहागढ़ की चाहें राज ग्वालियर क्यार ॥ इतना लीन्हे बिन जैहैं ना राजा दिल्ली के सरदार १३ सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना गई सनाकाखाय ॥ धीरज धरिकै फिरि बोलति भै पिरथी देउ जाय समुझाय १४ बारह दिनकी मुहलति देवैं त्यरहें डाँड़ लेयँ भरवाय ॥ जबै बनाफर उदयसिंह थे तब नहिं अये पिथौराराय १५ देखि अनाथन ह्याँ तिरियनको लूटन अये अधर्मीराय ॥ धर्मी होवैं तो मोहलति अब बारह दिन की देयँ कराय १६ त्यरहें पावैं जो पिरथी ना मुहबा शहर लेयँ लुटवाय ॥ हथी पछारा था द्वारे पर जायकै जबै लहुरखाभाय १७ मलखे ठाकुर जब सिरसा थे तब नहिं अये पिथौराराय ॥ इतना कहिकै मल्हना रानी नीचे बैठी शीश झुकाय १८ बोलि न आवा जब मल्हनाते माहिल बोले बचन बनाय ॥ बारह दिन लौं बुलै पिथौरा पहिले मूड़ देउँ कटवाय १६ त्यरहें दिन जो लुटै पिथौरा तौ माहिल कै जनै बलाय ॥ बैर बिसाहा मलखे ऊदन ताते चढ़े पिथौरा धाय २० इतना कहिकै माहिल चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ जो कछु भाषा मल्हनारानी माहिल यथातथ्य गा गाय २१ कछु नहिं ब्वाला दिल्लीवाला मल्हना गाथ सुनो यहि बार ॥ मल्हना सोचै मन अन्तर मा अबधौं कवन बचावनहार २२

४ आल्हखण्ड । ४६६ बिना बँडुला के चढ़वैया नैया कौन लगेहै पार ॥ दैया मैया सुखदैया जग मैया शारद चरण तुम्हार २३ यहै बिचारत मल्हना रानी तुरतै बोलि लीन प्रतिहार ॥ तुरत बुलावा जगनायक का मैंने जौनु चँदेले क्यार २४ खबरि पायकै जगनाय्कजी तुरतै गये तड़ाका आय ॥ आवत दीख्यो जगनायक को मल्हना उठी तड़ाकाधाय २५ पकरि कै बाहू जगनायक की अपने पास लीन बैठाय ॥ जगनिक बोले महरानी ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय २६ कौन साँकरा है माई पर हमते हाल देउ बतलाय ॥ तुरतै करिकै त्यहि कारज को पाछे शीश नवावों आय २७ इतना सुनिकै मल्हना बोली ईजति राखि लेउ यहिवार ॥ जल्दी जावो तुम कनउजको लावो उदयसिंह सरदार २८ सात लाखलों फौजैं लै कै सागर परा आय चौहान ॥ बारह दिनकी मुहलति दीन्ही त्यरहें लूटी नगर निदान २६ कहि समुझायो तुम आल्हाते की विपदामा होउ सहाय ॥ घाटि न समझा हम ब्रह्मा ते संकट परा आज दिनआय ३० इतना कहिकै रानी मल्हना कागज़ कलम दवाइतिलीन ॥ शिरी सर्बऊ ते भूषित करि पूरण पत्र समापतकीन ३१ सो दै दीन्ह्यो जगनायक को औरो कह्यो बहुत समुझाय ॥ जगनिक बोले तब मल्हनाते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३२ कैसे जावैं हम कनउज को औ मुह कौन दिखावैं माय ॥ सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरा बनिजको जाय ३३ तवै निकरिगे आल्हा ठाकुर तिनते बात न पूछा कोय ॥ विपति विदारण जगतारणकी मर्जी यही आज दिन होय ३४

आल्हाकामनावन । १६७ ५ नहीं तो होते मलखे ठाकुर कैसे चढ़त पिथौरा आय ॥ जियत न जैबे हम कनउजको कौवा मरे हाड़ लै जाय ३५ इतना सुनिकै मल्हना बोली दोऊ नैनन नीर बहाय ॥ राखो ईजति यहि समया मा जल्दी जाउ कनौजै धाय ३६ शोच बिचारन की विरिया ना मैंने बारबार बलिजायँ ॥ इतना सुनिकै जगनिक बोले माई साँच देयँ बतलाय ३७ घोड़ा मँगावो हरनागर को अबहीं जाउँ तड़ाकाधाय ॥ इतना सुनिकै रानी मल्हना ब्रह्मै खबरि दीन पठवाय ३८ माहिल ब्रह्मा जहँ बैठे थे चेरी तहाँ पहुँची जाय ॥ कह्यो सँदेशा सो मल्हना को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३६ सुनि संदेशा रनि मल्हनाका बोला उरई का सरदार ॥ घोड़ न देवो जगनायक कों ब्रह्मा मानु कही यहिबार ४० आल्हा रूठे हैं मोहवे ते कनउज बसे बनाफरराय ॥ घोड़ तुम्हारो फिरि देहैं ना तुमते साँच दीन बतलाय ४१ कहा न माना कछु माहिलका ब्रह्मा घोड़ दीन कसवाय ॥ बड़ी खुशहाली सों जगनायक सबको यथा योग शिरनाय ४२ मनियादेवनको सुमिरन करि घोड़ा उपर भयो असवार ॥ जहाँ पिथौरा दिल्ही वाला पहुँचा उरई का सरदार ४३ खबरि सुनाई जगनायक की माहिल बारबार समुझाय ॥ लेउ बछेड़ा अब हरनागर मानो कही पिथौराराय ४४ इतना सुनिकै पृथीराज ने चौंड़ा बकशी लीन बुलाय ॥ कहि समुझावा सब चौंड़ा ते यहु महराज पिथौराराय ४५ हुकुम पायकै महाराजा को चौंड़ा कूच दीन करवाय ॥ नदी बेतवा के ऊपरमा जगनिक गयो तड़ाका ध्याय ४६

६ आल्हखण्ड । ४६८ दीख्यो जगनिक को चौंडाने गंरई हाँक दीन ललकार ॥ देउ बछेड़ा हरनागर को पाछे जाउ नदी के पार ४७ इतना सुनिकै जगनायक जी चौंडै बोले बचन सुनाय ॥ लौटिकै अइहैं जब कनउज ते घोड़ा तुरत दिहैं पठवाय ४८ ऐसे घोड़ा हम देहैं ना मानो कही चौंड़ियाराय ॥ इतना सुनिकै चौंड़ा बकशी आपन हाथी दीन बढ़ाय ४६ ऐंड़ लगायो जगनायक जी हौदा उपर पहुँचे जाय ॥ लीन्ह्यो कलँगी शिर चौंडाकी चौंडा बहुत गयो शरमाय ५० लैके कलँगी जगनायक जी नदी निकरि गये वा पार ॥ चौंड़ा बकशी फिरि बोलत भा मानो घोड़े के असवार ५१ तुम अस योध्या हैं मोहबे मा कस ना राज्यकरें परिहिवार ॥ कलँगी हमरी अब दै देवो जावो आप कनौजै हाल ५२ इतना सुनिकै जगनायक जी बोले सुनो चौंड़ियाराय ॥ कलँगी तुम्हरी हम ऊदन को कनउजशहरदिखाउबजाय ५३ इतना कहिकै जगनायक जी अपनो घोड़ा दीन बढ़ाय ॥ तीनि दिनौना को धावाकरि कुड़हरितुरतगयोनगच्याय ५४ जेठ महीना ठीक दुपहरी शिरपर घामगयो बहुआय ॥ बरगद दीख्यो इक जगनायक डारन रही सघनता छाय ५५ तहँहीं बाँध्यो हरनागर को आपो सोयो जीन बिछाय ॥ दीख किसानन तहँ घोड़ा का औ असवार निहारा आय ५६ सोवत दीख्यो जगनायक को घोड़ा देखि गये हर्षाय ॥ करें बतकही तहँ आपस मा ऐसो घोड़ दीख नहिं भाय ५७ करत बतकही सब आपस में अपने धाम पहुँचे आय ॥ बात फैलिगै यह कुड़हरिमा गंगा कान परी तब जाय ५८