आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] कीरतिसागरकामैदान । ४५ । २७
मर्दनि सर्दनि दोऊ जूझे अब तुम चढ़ो पिथोराराय ८८ सुनिकै बातें ये माहिल की हाथी तुरत लीन सजवाय ॥ सुमिरि भवानीसुत गणेश को पहुँचा समरभूमिमा आय ८६ चौंड़ा बकशी का बुलवावा औ यह हुकुम दीन फरमाय ॥ जितने डोलाहैं सागर में सबका अबै लेउ लुटवाय ६० पाछे, मल्हना चन्द्रावलि का दिल्ली शहर देउ पठवाय ॥ हुकुम पायकै पृथीराज का तहँपर अटा चौंड़िया धाय ६१ लाखनि बोले हाँ ऊदन ते नाहर सुनो बनाफरराय ॥ कीरतिसागर मदनताल पर चलिये बेगि लहुरवाभाय ६२ सुनिकै बातें लखराना की डङ्का तुरत दीन बजवाय ॥ सजे सिपाही कनउज वाले मनमा फूलमतीको ध्याय ६३ सुमिरि भवानी महरानी को दानी तीनिलोक की माय ॥ फूलमती पद बन्दन कैकै हाथी चढ़ा कनौजीराय ६४ चढ़ा बेंदुला का चढ़वैया मैया शारद चरण मनाय ॥ ध्याय भवानीसुत गणेश को देवा चढ़ा मनोहर जाय ६५ मीराताल्हन बनरस वाले सोऊ बेगि भये असवार ॥ योगिहा बाना मर्दाना सब ठाकुर भये समर तय्यार ६६ धुरपद संगीत तिल्लाना गावन लागे मेघमलार ॥ घोर घटा हैं कहुँ सावन के आवन प्रीतम केरि बहार ६७ सोचैं विरहिनी घर आँगन में जब कहुँ परै पर्ब त्यवहार ॥ प्रीतम होते जो सावन में तौ दुख दावन जात हमार ६८ को गति वर्णै त्यहि समया कै ऊदन गावैं मेघमलार ॥ पावन वर्षा है सावन कै जङ्गल देखि परै हरियार ६६ फसल आँबकी नर बागन में जंगल देखि परै गुलजार ॥