आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ आल्हाखण्ड । ४२८ - जैसो स्वपना तुम देखा है तैसो दीख हमौं है भाय ॥ विपदा आई है मल्हना पर साँचो साँच बनाफरराय २३ होत भुरहरे के स्वपना सब साँचे उदयसिंह सरदार ॥ करो बहाना अब गाँजर को औ मोहवे को होउ तयार २४ कुँवा विवाहन की विरिया मा दीन्ह्यो प्राण नेग तुम भाय ॥ चढ़ा पिथौरा है दिल्ली का साँचोस्वपनपरादिखलाय २५ चलिये जल्दी अब मोहवे को लाखनिराना संगलिवाय ॥ इतना सुनिकै द्यावलि वाला लाखनि पास पहुँचा जाय २६ बड़ी नम्रता ते बोलत भा यहु रणबाघु बनाफरराय ॥ जाहिर पवनी है मोहवे की साँची सुनो कनौजीराय २७ मोरि लालसा यह डोलति है पवनी करें मोहोवे जाय ॥ करैं बहाना हम गाँजर को तुमको मोहवा लैवैं दिखाय २८ इतना सुनिकै लाखनि बोले चलिये वेगि बनाफरराय ॥ चरचा करिये नहिं मोहवे की नहिं सब जैहैं काम नशाय २६ करो तयारी अब गाँजर की पहुँचैं नगर मोहोवे जाय ॥ जैसी दवाई रोगी माँगै तैसी वैद देय बतलाय ३० तैसि खुशहाली भै ऊदन के डंका तुरत दीन बजवाय ॥ हुकुमलगायो फिरि लश्करमा सजिगे सबै शूर समुदाय ३१ जहाँ कचहरी चंदेले की ऊदन तहाँ पहुँचे जाय ॥ हाल बतायो महराजा को दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ३२ लाखनिरानाकी मंशा है गाँजर खेलैं खूब शिकार ॥ म्वारिव लालसा यह डोलतिहै राजा कनउज के सरदार ३३ सुनिकैं बातें बघऊदन की राजै हुकुम दीन फरमाय ॥ तहँते चलिकै ऊदन देवा आल्हा पास पहुँचे आय ३४