भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 618 में से

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पृष्ठ 423

१२ आल्हखण्ड । ४२२ सुनिकै बातें हरिकारा की विरमा गिरी मूच्छाखाय ११८ खबरि पायकै गजमोतिनि तहँ फिरिउठिबैठिफिरि गिरिजायाँ ॥ सासु पतोहू बैली ह्वैकै शिरधुनिबारबार पछितायँ ११९ सुयश बखानैं मलखाने का महलन गई उदासी छाय ॥ सात पांच दश जुरीं सहिलरी सम्मत देन लगींसो आय १२० तब गजमोतिनि विरमा दूनों पलकी लीन तहाँ मँगवाय ॥ सुमिरि गजानन लम्बोदर को गौरा पारवती पद ध्याय १२१ चढ़ी पालकी सासु पतोहू पहुंचीं समरभूमि में आय ॥ गदहन पृथ्वी को जुतवावै यहु महराज पिथौराराय १२२ तब गजमोतिनि ने ललकारा यह सुनि लेउ वीर चौहान ॥ यह ना जान्यो अपने मनते की मरिगये वीर मलखान १२३ सुनी पतिव्रतकी महिमा ना ताते चढ़ी तुम्होरे शान ॥ हम जबलेबे तलवारी को तब नहिं रही तुम्हारोमान १२४ बातें सुनिकै गजमोतिनि की पृथ्वी कूच दीन करवाय ॥ कैयो दिन का धावा करिकै दिल्ली शहर पहुंचे आय १२५ लाश देखिकै मलखाने कै माता तुरत गई लपटाय ॥ उठै औ बैठै गिरि गिरि जावै रानीदशा कही ना जाय १२६ विपदा बरणौं गजमोतिनिकै तौ फिरिएकसाल लगिजाय ॥ सखी सहिलरी तहँ समुझावैं विरमा धीरज रही कराय १२७ तेज पतिव्रत का जाहिर है जाते सत्त चढ़ा अधिकाय ॥ चिता लगावा गा चन्दन सों रानी बैठि सरापर जाय १२८ सुमिरि भवानी महरानी को पतिशिर धरा जाँघपर आय ॥ हवा खैंचिकै सब देहीकै शिरपरदीनतुरतपहुंचाय १२६ संध्या वाले यह गति जानैं प्राणायाम करें जे भाय ॥

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