भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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सिरसाकासमर । ४२३ १६

नाक चपावैं ते अँगूठा ते ऊपरश्वासचढ़ावत जायें १३० तैसे करिकै गजमोतिन ह्याँ ऊपर हवा दीन पहुँचाय ॥ जब फुफकारयो पति शव लैकै हाहाकार अग्निगै आय १३१ भम्भम्भम्भम् चन्दन लकड़ा सुलगनलागि तहाँपर भाय ॥ हाय पियारे बघऊदन के मारे गये बनाफरराय १३२ भाय पियारो ऊदन होते दिल्ली शहर देत फुँकवाय ॥ हाय विधाता यह गति कीन्ही न्यारे भये बनाफरराय १३३ कौन दुसरिया जग दादा को इन्दल पूत बड़ा बरियार ॥ मरत न देखा यहि समया मा देवर उदयसिंह सरदार १३४ जो हम जानति यह गतिहोई तुमका लेति तुरत बुलवाय ॥ दगा न करते दिल्ली वाले तौकसमरतिप्राणपतिआय १३५ कड़कै धड़कै फड़कै छाती ऐसो देखि शूर सरदार ॥ यहै मनाऊं औ ध्याऊं नित स्वामी दीनबन्धुकर्त्तार १३६ जहाँ जहाँ जन्मैं ये स्वामी मम तहँ तहँ होयँ मोरि भर्त्तार ॥ अग्नि प्रज्वलित त्यहिसमयाभै लागे जरन सबै श्रृंगार १३७ गमकै ढोलक त्यहि समया माँ धमकै थाप नगारे भाय ॥ चम्चम् चमकै गजमोतिनितहँ दमकैजरनहेमअधिकायं १३८ माता बिरमा मोती मूंगा सुवरण बस्त्रदीन छिरकाय ॥ रही न आशा धन लेबे की मलखेसोचतहूँअधिकाय १३६ ऐस प्रतापी नित होवैं ना ज्ञानी पुरुष विचारैं भाय ॥ दानी ध्यानी अभिमानी सब शोचैं सीयराम शिरनाय १४० घरी न बीती ह्याँ महरानी पहुँची स्वर्गलोक में जाय ॥ तहँहूँ सोचै सुख मल्हना को जाविधिदीनरहैअधिकाय १४१ सबियाँ रैयाति मलखाने की दर दर रोय रही अधिकाय ॥