आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ आल्हाखण्ड । ४२४ घर घर चर्चा मलखाने की पुर पुर रहे नारि नर गाय १४२ सवैया ॥ कौन कहै विपदा पुरकी अति श्वान श्रृगालन शोर मचायो । शान न मान न आन कहूं मलखान विना विपदा पुर छायो ॥ घोर मशान समान तहाँ मलखान जहाँ नित सेज लगायो । मानगयो अरमानगयो ललिते मलखान महायश पायो १४३ समर पूर मैं सिरसागढ़ का गायो सुमिरि शारदा माय ॥ आशिर्वाद देउं मुन्शीसुत जीवो प्रागनारायण भाय १४४ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलों तुम यशसों रहौ सदा भरपूर १४५ खेत छूटिगा दिननायक सों झएडा गेड़ा निशाको आय ॥ परे आलसीखटिया ताकि ताकि संतन धुनी दीन परचाय १४६ माथ नवावों मैं माता को जो प्रत्यक्ष अबौ संसार ॥ पाणिकमल धरि सो पीढ़ी मा हमरो करैं अबौ निस्तार १४७ माथ नवावों पितु अपने को ह्याँते करों तरँग को अन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १४८ इति श्रीलखनऊनिवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुध कृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत सिरसासमर वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सिरसा समर सम्पूर्ण ॥ इति ॥