भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 419

८ आल्हखण्ड । ४१९ पदुम पैर है मलखाने के यहवरदीन रहे भगवान ७२, दुनिया बैरी है मलखे के भैया काह दनाई आय ॥ पदुम न फटि है जो तरवाका तौ नहिं मरी बनाफरराय ७३ लिखी बिधाता के मेटैको माता हाल दीन बतलाय ॥ बिदा माँगिकै फिरि जल्दी सों माहिल कूच दीन करवाय ७४ राह छोड़िकै फिरि उरई कै दिल्ली चला तड़ाका जाय ॥ लिल्ही घोड़ी का चढ़वैया दिल्लीपहुंचिगयोफिरआय ७५ हाल बतायो सब पिरथी को माहिल बार बार समुझाय ॥ भाला वलछी औ साँगनको खन्दक आप देउ गड़वाय ७६ पदुम न रैहै जब तरवा मा तब ना रही बनाफरराय ॥ मीचु आयगै मलखाने के माता हाल दीन बतलाय ७७ सुनिकै बातें ये माहिल की राजा कुँवर लीन बुलवाय ॥ इइसै खन्दक तुम खुदवावो आधे देउ जाय पटवाय ७८ एक छाँड़िकै इक पटवावो या विधि दीन खूब समुझाय ॥ अधीराति के फिरि अमला मा कुँवरनकीन तहाँ तसजाय ७६ पाँच रातिमें यह रचनाकरि दिल्ली फेरि पहुँचे आय ॥ हाल बतायो सब पिरथी को कुँवरन बार बार समुझाय ८० माहिल चलिभे फिरि उरई का राजा फौज कीन तैयार ॥ झीलमबखतरपहिरि सिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ८१ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दूसरे फाँदि घोड़ असवार ॥ तिसर नगोड़ा के वाजत खन चलिभे सबै शूर सरदार ८२ जायकै पहुँचे फिरि संगर में तम्बू तहाँ दीन गड़वाय ॥ उलिखीहकीकति फिरिमलखेको अवहूं किला देउ गिरवाय-८३ लिखिकै चिट्ठी दी धावन को धावन तुरत पहूँचा जाय ॥