आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड। ४२० हाल पायकै सिरसागढ़का क्रोधित भयो पिथौराराय ६६ बाजे डंका इत पिरथी के वैसी सिरसा के महराज ॥ सूरज वंशी औ यदुवंशी तोमर वंश केर शिरताज ६७ ये सब सजिसजि सिरसा गढ़में अपनी लीन ढाल तलवार ॥ नीले काले सब्जे सुर्खे सब रंग घोड़ भये तय्यार ६८ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ हाड़ा बूंदी गहिलवारके तिनपर बैठि शूर शिरताज ६६ सुमिरन करिकै शिवशंकरका मातै शीश नवावा जाय ॥ पीठि ठोंकि कै बिरमा माता आशिर्वाद दीन हर्षाय १०० चलिभा मलखे माताढिग ते रानी महल पहुंचा आय ॥ दीन दिलासा गजमोतिनिका ठाकुर चला खूब समुझाय १०१ बेटी बोली गजराजा की स्वामिन चेरी बोल बनाव ॥ पाँव पछारी का डारोना नाहीं हँसी देश औ गाँव १०२ होय हँसौंवा ज्यहि दुनिया मा त्यहिका मरण नीकही आय ॥ सुनी किहानी हम विप्रन ते स्वामी साँचदीनबतलाय १०३ इतना सुनिकै मलखे चुप्पै फौजन फेरि पहुंचे आय ॥ बाजे डंका अहलंका के मलखे कूच दीन करवाय १०४ सवैया ॥ चर्खनमों सब तोप चढ़ाय औ फौज अपारलिये मलखाना। बाजत डंक निशंक तहाँ औ यथा घन सावनको गहराना ॥ बिज्जु छटासों कटा करिवे कहँ चमकत खङ्ग तहाँ मर्दाना। मौहर बाजत हावकिये ललिते यह भाव न जात बखाना १०५ चढ़ा कबुतरी पर मलखाने मुर्चा सबै कीन तैयार ॥