आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हाखण्ड । ५३० ये सब पापी हैं प्रथमै के तरिगे रामचरण को ध्याय ४ स्वई भरोसा धरि जियरेमा नितप्रति धरों चरणपरमाथ ॥ पारलगायो भवसागर ते स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ ५ छोड़ि सुमिरनी अब रघुबर कै बेला गौन कहौं सब गाय ॥ ब्रह्मा ठाकुर दिल्ली जैहैं पैहैं विजय पिथौराराय ६ अथ कथाप्रसंग ॥ एक समैया इक औसर मा बैठे सभा रजा परिमाल ॥ आल्हा ऊदन इन्द्दल देवा लाखनि साथ और नरपाल १ को गति बरणै त्यहि समयाकै भारी लाग राजदरवार ॥ त्यही समैया त्यहि औसरमा आवा उरई का सरदार २ आवो आवो बैठो बैठो राजै कीन बहुत सतकार ॥ बैठिग ठाकुर उरई वाला आला चुगुलन मा सरदार ३ बिना बुलाये ते बोला फिरि तुम सुनिलेउ रजापरिमाल ॥ औसर ऐसो फिरि पैहौ ना ब्रह्मा गौनलेउ यहिकाल ४ बैठि कनौजी लाखनिराना बैठे देशराज के 'लाल ॥ लैकै वीरा यहि औसर मा तुम धरिदेउ रजापरिमाल ५ कौन बहादुर यहि समया मा बेला गौन चबावै पान ॥ स्यावासि स्यावासि माहिलठाकुर तुम्हरे बचन ठीक परमान ६ इतना कहिकै परिमालिक जी तुरतै धरा तहाँपर पान ॥ है कोउ क्षत्री तेहेवाला लेवै पान आन सो ज्वान ७ सुनिकै बातें परिमालिक की सब कोउ गये सनाकाखाय ॥ बोलि न आवा क्यहु ठाकुरते आनन गये तुरत मुरझाय ८ चारि घरीदिन यहिविधि बीता कोउ न पान पास समुहान ॥ तवै बहादुर द्यावलि वाला पहुँचा उदयसिंह तहँ ज्वान ६