भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 536

[Header] बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्ध । ५३५

को गति बरनै जगनायक कै मारे घूमि घूमि तलवार ॥ ब्रह्मा ठाकुर के मुर्चा मा कोउ न ठाढ़ होय सरदार ५८ लरिका मरिगे पृथीराज के क्षत्रिन छाँड़ि दीन मैदान ॥ धाँधू चौंड़ा त्यहि समया मा भारी कीन घोर घमसान ५६ भा खलभल्ला औ हल्लाअति लल्ला डारि भागि हथियार ॥ ना मुहँ फेरैं दिल्ली वाले ना ई मोहबे के सरदार ६० कीरति प्यारी के भूखे हैं दोऊ दिशिमा परम जुझार ॥ फिरि फिरि मारैं औ ललकारै यहु मल्हना को राजकुमार ६१ घोड़ा मारै भल टापन ते ऊपर आप करै तलवार ॥ ब्रह्माठाकुर के मुर्चा मा क्षत्री डारि भागि हथियार ६२ देखि तमाशा चौंड़ा धाँधू रहिगे चुप्प साधि त्यहि बार ॥ यहु निरशंकी परिमालिक का बहुतन पठै दीन यमद्वार ६३ रण अभिलाषा नहिं काहू के सब कउ गये मनैमन हार ॥ ठाकुर बेढब जगनायक है मैने जौनु चँदेले क्यार ६४ धाँधू ठाकुर के मुर्चा मा दूनों हाथ करै तलवार ॥ चौंड़ा ब्राह्मण इकवन्ता से बीरन रहा तहाँ ललकार ६५ रोज केतकी कहुँ फूलै ना चंपा रोज न लागै डार ॥ गई जवानी फिरि मिलिहै ना ना फिरि रोजचलै तलवार ६६ कीरति जैहै सब दुनिया मा जो कउ लड़ै शूर सरदार ॥ आखिर देही यह रहि है ना जोरी जोरन जोर हजार ६७ सदा न फूलै यह बन त्वरई यारो सदा न सावन होय ॥ सदा न पैहौ यह नर देही यारो सदा न जीवै कोय ६८ ऐसा बोल चौंड़ा कहि कहि क्षत्रिन दीन्हे खूब जुझाय ॥ ब्रह्मा ठाकुर त्यहि समया मा भारी हाँक कहा गुहराय ६६