भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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६ आल्हखण्ड । ५३४ कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥ ताजी तुर्की पँचकल्यानी इनपर होन लागि असवार ४६ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ सोहैं अँवारी तिन हाथिन पर बहुतन हौदा रहे विराज ४७ को गति बरणै त्यहि समया कै मानो कोप कीन सुरराज ॥ बाजैं डंका अह्तंका के मानों गिरैं उपर ते गाज ४८ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन चलिभे सबै शूर सरदार ४९ खर ,खर खर खर कै रथदौरे रवन्ना चले पवन की चाल ॥ हाथी चिंघेरै घोड़ा हींसे कीन्हेनिशब्दबहुतनरपाल ५० गुस्ती धावन तहँ ब्रह्मा का. तम्बुन अटा तड़ाका आय । खबरि सुनाई यह ब्रह्मा को की दल अवै चँदेलेराय ५१ इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर फौजैं तुरत लीन सजवाय ॥ बाजे डंका अह्तंका के बंकन शंक दीन बिसराय ५२ ई निरशंका मोहबे वाले , बाँधेनि तुरत ढाल तलवार ॥ साजा ठाढ़ा हरनागर था ब्रह्मा फाँदि भये असवार ५३ पहिली लड़ाई भै तोपन कै पाछे चलन लागि तलवार ॥ कहुँ कहुँ भाला कहुँ कहुँ बरछी मारन लागि शूर सरदार ५४ तीर तमंचन की मारुइ भई कोताखानी चलीं कटार ॥ तेगा चमकै बर्दवान का ऊना चलै बिलाइति क्यार ५५ को गति बरणै त्यहि समयामा बाजै छपक छपक तलवारे ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार ५६ ना मुहँ फेरैं दिल्ली वाले ना ई मोहबे के सरदार ॥ मुण्डन केरे मुड़ चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ५७