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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

६ आल्हखण्ड । ५३४ कच्छी मच्छी नकुला सब्जा हरियल मुश्की घोड़ अपार ॥ ताजी तुर्की पँचकल्यानी इनपर होन लागि असवार ४६ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ सोहैं अँवारी तिन हाथिन पर बहुतन हौदा रहे विराज ४७ को गति बरणै त्यहि समया कै मानो कोप कीन सुरराज ॥ बाजैं डंका अह्तंका के मानों गिरैं उपर ते गाज ४८ पहिल नगाड़ा में जिनबन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ॥ तिसर नगाड़ा के बाजत खन चलिभे सबै शूर सरदार ४९ खर ,खर खर खर कै रथदौरे रवन्ना चले पवन की चाल ॥ हाथी चिंघेरै घोड़ा हींसे कीन्हेनिशब्दबहुतनरपाल ५० गुस्ती धावन तहँ ब्रह्मा का. तम्बुन अटा तड़ाका आय । खबरि सुनाई यह ब्रह्मा को की दल अवै चँदेलेराय ५१ इतना सुनिकै ब्रह्मा ठाकुर फौजैं तुरत लीन सजवाय ॥ बाजे डंका अह्तंका के बंकन शंक दीन बिसराय ५२ ई निरशंका मोहबे वाले , बाँधेनि तुरत ढाल तलवार ॥ साजा ठाढ़ा हरनागर था ब्रह्मा फाँदि भये असवार ५३ पहिली लड़ाई भै तोपन कै पाछे चलन लागि तलवार ॥ कहुँ कहुँ भाला कहुँ कहुँ बरछी मारन लागि शूर सरदार ५४ तीर तमंचन की मारुइ भई कोताखानी चलीं कटार ॥ तेगा चमकै बर्दवान का ऊना चलै बिलाइति क्यार ५५ को गति बरणै त्यहि समयामा बाजै छपक छपक तलवारे ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्त की धार ५६ ना मुहँ फेरैं दिल्ली वाले ना ई मोहबे के सरदार ॥ मुण्डन केरे मुड़ चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ५७

[Header] बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्ध । ५३५

को गति बरनै जगनायक कै मारे घूमि घूमि तलवार ॥ ब्रह्मा ठाकुर के मुर्चा मा कोउ न ठाढ़ होय सरदार ५८ लरिका मरिगे पृथीराज के क्षत्रिन छाँड़ि दीन मैदान ॥ धाँधू चौंड़ा त्यहि समया मा भारी कीन घोर घमसान ५६ भा खलभल्ला औ हल्लाअति लल्ला डारि भागि हथियार ॥ ना मुहँ फेरैं दिल्ली वाले ना ई मोहबे के सरदार ६० कीरति प्यारी के भूखे हैं दोऊ दिशिमा परम जुझार ॥ फिरि फिरि मारैं औ ललकारै यहु मल्हना को राजकुमार ६१ घोड़ा मारै भल टापन ते ऊपर आप करै तलवार ॥ ब्रह्माठाकुर के मुर्चा मा क्षत्री डारि भागि हथियार ६२ देखि तमाशा चौंड़ा धाँधू रहिगे चुप्प साधि त्यहि बार ॥ यहु निरशंकी परिमालिक का बहुतन पठै दीन यमद्वार ६३ रण अभिलाषा नहिं काहू के सब कउ गये मनैमन हार ॥ ठाकुर बेढब जगनायक है मैने जौनु चँदेले क्यार ६४ धाँधू ठाकुर के मुर्चा मा दूनों हाथ करै तलवार ॥ चौंड़ा ब्राह्मण इकवन्ता से बीरन रहा तहाँ ललकार ६५ रोज केतकी कहुँ फूलै ना चंपा रोज न लागै डार ॥ गई जवानी फिरि मिलिहै ना ना फिरि रोजचलै तलवार ६६ कीरति जैहै सब दुनिया मा जो कउ लड़ै शूर सरदार ॥ आखिर देही यह रहि है ना जोरी जोरन जोर हजार ६७ सदा न फूलै यह बन त्वरई यारो सदा न सावन होय ॥ सदा न पैहौ यह नर देही यारो सदा न जीवै कोय ६८ ऐसा बोल चौंड़ा कहि कहि क्षत्रिन दीन्हे खूब जुझाय ॥ ब्रह्मा ठाकुर त्यहि समया मा भारी हाँक कहा गुहराय ६६

८ आल्हाखण्ड । ५३६ पावैं पिछाड़ी का डाखो ना यारो राख्यो धर्म हमार ॥ मारो मारो ओ रजपूतो देहैं विजय अवश्य करतार ७० इतना कहिकै ब्रह्मा ठाकुर लाग्यो करन आप तलवार ॥ ब्रह्माठाकुर के मुर्चा मा कोउ न ठाढ़ होय सरदार ७१ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय ॥ तैसे मारे ब्रह्मा ठाकुर रणमा कोउ न रोकै पायँ ७२ ब्रह्माठाकुर के मारुन मा कोऊ शूर नहीं समुहाय ॥ लश्कर भाग्यो पृथीराज का पायो विजय चंदेलेराय ७३ त्यही समैया त्यहि औसर मा माहिल उरई का सरदार ॥ लिल्ली घोड़ी पर चढ़ि बैठ्यो तिकतिककरनलागत्यहिवार७४ जहाँ कचहरी पृथीराज की भारी लाग राज दरबार ॥ उतरिकै घोड़ीते भुइँ आवा पहुँचा उरई का सरदार ७५ आवत दीख्यो जब माहिल को राजा कीन बड़ा सत्कार ॥ आवो आवो उरई वाले माहिल राजा हितू हमार ७६ इतना कहिकै महराजा ने अपने पास लीन बैठाय ॥ 'माहिल बोले त्यहि समया मा मानो कही पिथौराराय ७७ लड़िकै जिनिहौ ना ब्रह्माते चहुवल देयँ तुम्हें करतार ॥ धाँधू चौंड़ा सब कोउ हारे जीता पूतु चंदेले क्यार ७८ बड़े लड़ैया मोहबेवाले उनके बांट परी तलवार ॥ उड़न बछेड़ा जिनके घर मा तिनते लड़ै कौन सरदार ७९ पिस्थी बोले तब माहिल ते ठाकुर उरई के सरदार ॥ कौन उपाय करैं यहि औसर ज्यहिमा विजयदेयँकरतार ८० इतना सुनिकै माहिल बोले ओ महराज पिथौराराय ॥ रूप जनाना करि ताहर का डोला आपु देउ पठवाय ८१

बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्ध। ५३७ ६ गाफिल देखें जब ब्रह्मा का तबहीं कैदलेयँ करवाय ॥ इतना सुनि कै ताहर बोले सम्मत नीक नहीं यह भाय ८२ रूप जनाना हम करिबे ना चहु तन धजीधजी उड़िजाय ॥ कीरति जैहै सब दुनिया ते औ रजपूती धर्म नशाय ८३ इतना सुनिकै चौंड़ा बोला हम बनिजाब जनानाभाय ॥ बिना बयारी जूना टूटै औ बिन औषध बहै वलाय ८४ साम दाम औ दण्ड भेद सों नितप्रति चतुरकरतहैं काम ॥ मोहिं पियारी यह कीरति है जीतैं शत्रु होय जगनाम ८५ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की बोला पृथीराज चौहान ॥ स्याबासिस्याबासि चौंड़ा बकशी तुम्हरे बचन मोहिं परमान ८६ सुनी पिथौरा की बातें ये चौंड़ा चला तड़ाका धाय ॥ जायकै पहुँच्यो रंगमहल में सबियाँ जेवर लीन मँग़ाय ८७ अनवट बिछिया पाँयन पहिरे पहिरे कड़ा छड़ा त्यहिबार ॥ धरि परुपान दऊ पैरन मा त्यहिपर पायजेब झनकार ८८ किंकिणि पहिरी करिहाँयें मा कण्ठम पहिरि मोतियनहार ॥ बाजू जोसन बाँधि बजुल्ला दोऊ भुजन कीन श्रृंगार ८६ बनी पछेला पहुँची ककना दूनों हाथन करें बहार ॥ आठ अँगुरियन छल्ला पहिरे अँगुठा लीन आरसीधार ६० चुरियाँ पहिरी दउ हाथन मा तिनबिच लीन पनेरियाडार ॥ नथुनी लटकन बेसरि पहिरी कानन करनफूल शृङ्गार ६१ बेंदा धारयो फिरि माथे मा बँदियाँ शिरपर करें बहार ॥ मिस्सी रगरी सब दाँतन मा चौंड़ा बना जनाना यार ६२ सिया ओधि धरि छाती मा चोलीबन्द लीन कसवाय ॥ चीरी सारी काशमीर की शोभा कही बूत ना जाय ६३

१० आल्हाखण्ड । ५३८ दुलाहिनि बनिकै चौंड़ा बकशी तुरतै चढ़ा पालकी जाय ॥ जहरबुझाई लीन कटारी सो सारी में धरी चुराय ६४ ताहर बैठे दल गंजन पर धाँधू हाथी पर असवार ॥ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार ६५ चली पालकी फिरि चौंड़ा की लश्कर कूच दीन करवाय ॥ इक हरकारा ताहर पठयो औ सवहाल दीनबतलाय ६६ खबरि जनावो तुम ब्रह्मा को बेला बिदा लेयँ करवाय ॥ आवत डोला है वेलाका इकले अत्रो चँदेलेराय ६७ इतना सुनिकै धावन चलिभा तम्बुन फेरि पहुंचा आय ॥ खवरि जनाई सब ब्रह्मा को जो कछु ताहर दीन बताय ६८ सुनिकै बातें हरकारा की हरनागर पर भयो सवार ॥ घरी अढ़ाई के अरसा मा पहुँचा मोहबे का सरदार ६६ आवत दीख्यो जब ब्रह्मा का ताहर बोले बचन उदार ॥ आवो आवो ब्रह्मा ठाकुर तुमते हारिगयी तलवार १०० डोला लाये हम बहिनी का ठाकुर बिदालेउ करवाय ॥ कौन डसरिहा हाँ तुम्हरो है जो अब रारि मचावैआय १०१ लड़ि भिड़ि तुमने हम हारे सब तब यह ठीक लीन ठहराय ॥ रंडा बैठै जो बहिनी मम तौ सब जैहैं काम नशाय १०२ यहै सोचिकै गहराजा ने डोला यहाँ दीन पठवाय ॥ बड़ी खुशहाली भै राजा के संग न आये बनाफरराय १०३ जो कहुँ औते ऊदन ठाकुर तौ हाँ होत युद्ध अविकाय ॥ बड़ी खुशहाली भै राजा के जोतुमलीन्ह्योपानछिनाथ १०४ अब यह डोला है बहिनी का मोहबे आपु देउ पठवाय ॥ मुनि मुनि बातें ये ताहर की ब्रह्मा तुरत गये पतियाय १०५

बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्ध । ५३६ ११ भलओअनभल जबजसहोवय तबतस बुद्धि जाय बौराय ॥ सुनान हन्ना क्यहु सुवरण का नाकयहु दीख नैनसों जाय १०६ रचा विधाता नहिं कबहुंथा मारन हेतु गये रघुराय ॥ यह अनहोनी हम दिखलाई सोचोसदास्वजनजनभाय १०७ होनहार बश ब्रह्मा हैके डोला निकटगये नगचाय ॥ तबहीं चौंड़ा उठि पलकी ते बाँये दीन कटारीघाय १०८ दहिने सांगहनी धाँधू ने ताहर मार्यो तीरचलाय ॥ तीनों घायपरे ब्रह्मा के तुरतै गिरे मूर्च्छाखाय १०९ यह गति दीखी जब ब्रह्मा की रोवनलागि मोहबियाज्वान ॥ तबललकार्यो जगनायकजी होवो खड़े समर चौहान ११० दगाते मार्यो तुम ब्रह्माको हमरे साथ करो तलवार ॥ जियत न जाई कउ दिल्ली का सबका डरों जानसों मार १११ तौ तौ मैने चंदेले का नहिं ई डारौं मुच्छ मुड़ाय ॥ सुनिकै बातें जगनायक की ताहर कूच दीन करवाय ११२ ताहर नाहर के जातैखन जगना अटा तहाँ पर जाय ॥ मूर्च्छित दीख्यो ब्रह्मानँदको पलकी उपर दीन पौढ़ाय ११३ लै कै पलकी जगनायक जी तम्बुन फेरि पहुँचेआय ॥ जागी मूर्च्छा तहँ ब्रह्मा की बोले तुरत चंदेलेराय ११४ कूच करायो नहिं लश्कर को मोहबे खबरि देउ पठवाय ॥ सुनिकै बातें ये ब्रह्मा की धावन तुरत लीन बुलवाय ११५ कही हकीकति सब धावन ते तुरतै चला शीशकोनाय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक की धावन तहाँ पहुँचा आय ११६ कही हकीकति महराजाते तुरतै गिरे पछाराखाय ॥ बीछी काट्यो या बर्रै ने मानो डसा भुजंगम आय ११७

९२ आल्हाखण्ड । ५४० बिपदा आई फिरि मोहबेमा फैली बात महल में जाय ॥ सुनी हकीकति रानी मल्हना महलन गिरी मूर्च्छाखाय ११८ बारह रानी चंदेले की रोवैं तहाँ पछारखाय ॥ ख्याति रोवैं घर अपने मां सपनेसरिसजगतदिखलाय ११९ साँचो स्वपना जग हम देखैं कोउन पूत पतोहू भाय ॥ आज मरैं दिन दूसर काल्ही याही साँच परै दिखलाय १२० इयहिते भैया यहि दुनिया मा कबहुँन करै उपरको शीश ॥ सम्मत हमरो यह साँचा है नितप्रतिभजैरामजगदीश १२१ सोउन बाचा यहि दुनिया मा बाहू गये जासु के बीश ॥ सहसन बाहुनका अर्जुन भा ताकाहनावशिजगदीश १२२ काह हकीकति नरपामर की जो करिलेय उपर को शीश ॥ रहिगा ठाकुर ना सिरसा का कलियुगवीरधीरअवनीश १२३ ताते चाही नर देही को झुकि २ झुकतर झुकि जाय ॥ त्यों त्यों त्यों त्यों ऊपर जावै ज्यों २ शीश झुकावत जाय १२४ जैसे तरुवर है रसालको बौरन भार रहा गरुवाय ॥ ज्यों ज्यों बाढ़ फल रसालके त्योंत्योंझुकत २झुकिजाय १२५ ज्यों ज्यों पकिपकि टपकतआवैं त्यों त्यों डार उपरको जाय ॥ ऐसो सम्मत यह साँचा है साँचासमयगयोनगन्याय १२६ नहीं तो आल्हा को थाल्हाकरि ललिने धर्म देत दिखलाय ॥ काह हकीकति नर पामर की जोअभिमानकरतरहिजाय १२७ सुनी पाठ है जिन दुर्गा की खिन हना वीर समुदाय ॥ धर्म यथारथकी बातें सब अबकोस्वजनदेयदिखलाय १२८ ताते गाथा यह सब छूटा लूटा दुःख मोहोबा आय ॥ खबरि पहुँचीगै दथहरिपुरमा आल्हानिकटतड़ाका जाय १२६

बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्ध । ५४१ १३ आल्हा ऊदन इन्दल तीनों लागे बैठि तहाँ पछिताय ॥ धावलि सुनवाँ फुलवा तीनों सुनतै गिरीं पछाराखाय १३० बड़ी दुर्दशा त्यहि समया कै हमरे बूत कही ना जाय ॥ रानी मल्हना के महलन मा सब दुखउतरा गायबजाय १३१ फिरि फिरि रानी रोदन ठानैं सखियाँ रहीं तहाँ समुझाय ॥ माहिल भूपति द्वउ मरिजावैं उरई गिरै गाज अरराय १३२ जिनकीचुगुलिनते महलनमा यहदुखपरा आजदिन आय ॥ मरै पिथौरा दिल्लीवाला जो यहु पूत डरा मरवायें १३३ होय निपूती रानी अगमा सोऊ महल बैठि पछिताय ॥ इतना कहिकै रानी मल्हना फिरिफिरिबारबारपछिताय १३४ ताहर नाहर गा दिल्ली मा राजै खबरि जनाई जाय ॥ बात फैलिगै सब दिल्ली मा औरनिवासपहूंची आय १३५ खबरि पायकै रानी अगमा महलन गिरी पछारा खाय ॥ कन्त जूझिगे रण खेतन मा बेला सुना तहाँपर आय १३६ यहु पछितानी मन अपने मा भूषण बसन दीन छिरकाय ॥ कहा न मानै तहँ काहू का बेला गिरै परै बिलखाय १३७ औ गरियावै बेला रानी चौंड़ा बंश नाशि हैजाय ॥ बने जनाना तू दिल्ली मा ओदहिजार भवानी खाय १३८ नाहक जन्मी धाँधू मैया दैया गती कही ना जाय ॥ नहिं रजपूती कछु ताहर मा धोखे हना तीरका घाय १३६ इतना कहिकै बेला रानी तुरतै उठी तड़ाका धाय ॥ महल छोड़ि कै महतारीका पहुँची और महलमें जाय १४० प्रथम युद्ध मा जो गौने मा सो हम सबै गये अवगाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुन्शी सुत जीवो प्रागनरायणभाय १४१.

६४ आल्हखण्ड । ५४२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदामरपूर १४२ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूरिभई यह गाथ ॥ करों तरंग यहाँ सों पूरण तवपदसुमिरि भवानीनाथ १४३ जो अभिलाषा मन हमरे है सो तुम पूरिकरो भगवन्त ॥ राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त १४४ इति श्रीलखनऊनिवासि(सी.आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पंडरीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतबेलागौन आनयमैठाकुर ब्रह्मासिंहघायल वर्णनोजनामप्रथमयुद्धेप्रथमस्तरंगः १ ॥ बेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्धसमाप्त ॥ इति ॥

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ बेलाकेगौने की दूसरीलड़ाई में रानालाखनिसिंह तथा उदयसिंहजी की चढ़ाई का वर्णन ॥ सवैया ॥ हे बिधि दे वरदान यही पद पंकज ईश सदा हम ध्यावैं । होवैं जहाँ जलहू थल में रघुनन्दन को तहँ शीशनवावैं ॥ और न काम कछू हमको इक रामको नाम नितै हमगावैं। याँच यही लहिते कर साँच मिलैं रघुनाथ तबै सुखपावैं १ सुमिरन ॥ तुम्हें विधाता हम ध्यावतहैं धाता कृपा करौ अब हाल ॥ परम पियारे रघुनन्दनजी जाते दरशदेयँ यहिकाल १ युक्तिबतावो स्वइ धाता तुम जाते मिटै सकल भ्रमजाल ॥ दशरथ नन्दन रघुनन्दन को बन्दन करों सदासबकाल २ चन्दन अक्षत औ पुष्पन सों पूजों शम्भु भवानी लाल ॥ कण्ठ हलाहल भल सोहत है सोहै बाल चन्द्रमा भाल ३

२ आल्हखण्ड । ५३४ जटा के ऊपर सुरसरि सोहै तापर बैठ भुजग विकराल ॥ श्वेत वरण तन भस्म रमाये धारे हृदय मुण्ड के माल ४ को गति बरणै शिवशङ्कर कै बस्तर नित्त करै विशराम ॥ भाँग धतूरन को भोजन करि ध्यावैं नित्त रामको नाम ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ चढ़ी कनौजी अब दिल्लीपर चढ़ि हैं उदयसिंह सरदार ६ अथ कथाप्रसंग ॥ बेला बैठी निज महलन माँ मनमा धरे राम को ध्यान ॥ कन्त झूझिगे रणखेतन मा फिरियहकरनलागिअनुमान १ नैनन आँसू ढारन लागी पागी महादुःख भ्रमजाल ॥ मूर्च्छा जागी जब बेला की चिट्ठी लिखन लागित्यहिकाल २ लिखी हकीकति यह ऊदनका बेटा देशराज के लाल ॥ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं थी जैसी कीन आप यहिकाल ३ वादा कीन्ह्यो तुम ब्याहे मा गौने विदा लेब करवाय ॥ कन्त जूझिगे रण खेतन माँ अन्तौमिलनकठिनदिखराय ४ भये जनाना तुम द्यावलि के ऊदन बार बार धिकार ॥ नालति तुम्हरी रजपूती का नाहक लेउ ढाल तलवार ५ होतिउ बिटिया तुम द्यावलिके करतिउ बैठि महल श्रृङ्गार ॥ शोच न होतै तब बेला के ठाकुर उदयसिंह सरदार ६ होत जो बेटा बच्छराज का ठाकुर शूर वीर मलखान ॥ तौ का करतीं दिल्ली वाले बिल्ली रूप सबै चौहान ७ गिल्ली ह्वैहै आल्हा ठाकुर दिल्ली देखि डरे यहिकाल ॥ ऐसी दिल्ली है मोहवे मा तौ का करें रजा परिमाल ८ दिल टिल दिल्ली खलभल्ली ई लल्ली देशराज के लाल ॥

बेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५४५ ३ होत इकछी ज्यहि पल्ली मा बेटा बच्छराजे को बाल ९ करत दुपल्ला सो छाती के घाती समर शूर मलखान ॥ तुम्हें मुनासिब अब याही है आवो उदयसिंह चढ़िज्वान१० प्रथम मिलावो मोहिं प्रीतमको बदला लेउ बन्धुको आन ॥ जो नहिं अहौ उदयसिंह तुम मरि हैं गदा बीर चौहान ११ शोक समानी अलसानी सो मानी प्रथम यौबना नारि ॥ पूरी पाती लय छाती में थाती यौबन के उनहारि १२ यौवन केरे मदमाती सो घाती समय दीख त्यहिबार ॥ फरकत यौवन भुज दक्षिण है करकत हृदय करेजाफार १३ धड़कनअनवटबिछियाअँगुरिन कड़कत चोलीबन्द निहार ॥ तड़कन तनियाँ चौतनियाँसब रनियाँ दुखितभई त्यहिबार १४ दुख मदमाती रस बिसराती आती यार घांवरा धार ॥ फिर सतरांती पछताती मन घाती समय दीखत्यहिबार १५ थर थहराती लहराती मन आती मन्द मन्द त्यहिबार ॥ लखि कर पाती दुखघातीको ढाहत नैनन नीर अपार १६ थाहत आई द्वारपाल ढिग पाती दुःख करेजा फार ॥ सो दै दीन्ही द्वारपाल को मुद्रा दीन्हे एक हजार १७ मुद्रा रुद्रा के तुल्या जो मुल्या बिका सबै संसार १८ राम न लीन्ह्यो इक मुद्रा को त्यागे लंक अवध सरदार १८= अनुचित वानी हम ठानी है रामै कहा जौन सरदार ॥ तीन लोक के आनँद करता हरता दुःख जगत भरतार १६ तिनसरदारकहब जगअनुचित नहिं यह देव वाणि निरवार ॥ बेद शास्त्रन के भोगत खन आल्हा जीतिलीन संसार २० परम पवित्र चरित्र हैं जिनके तिनके नाम लेय संसार ॥ ३५

४ आल्हखण्ड । ५४६ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे कलियुग धर्मध्वजासरदार २१ इनकी कीरति अतिपवित्र है जो कोउ देखै हृदय उघार ॥ परम पवित्र चरित्र जिनके हैं तिनके नाम लेय संसार २२ यहतो ललिते कै ध्वनि बोलै खोलै और हाल यहिवार ॥ पाती लैकै धावन चलिभा पहुँचा नगर मोहोवादार २३ विपदा छाई ह्याँ मोहवे में कोउन मसा सरिस भुन्नाय ॥ यहि गति देखी द्वारपाल ने ठाढ़े लोग रहे सन्नाय २४ चुप्पे चलिभा दशहरिपुर का जहँ पर बैठि बनाफरराय ॥ पाती दीन्ही तहँ धावन ने ठाकुर उदयसिंह को जाय २५ चुप्पे पाती ऊदन पढ़िकै तुरतै डरी तड़ाकाफार ॥ आल्हाठाकुर तब बोलत भे साँचे धर्म्मरूप अवतार २६ कहाँ कि पाती यह आई थी डारी जौनि तड़ाकाफार ॥ बातें सुनिकै ये आल्हा की बोले उदयसिंह सरदार २७ अड़वड़ पाती थी बेला की गड़बड़ लिखी दुःखकेभार ॥ जो नहिं जावैं हम दिल्ली को बेला देय बहुत धिक्कार २८ आयसु पावैं हम दादा को जावैं युक्ति सहित यहिवार ॥ जो नहिं जावैं हम दिल्ली को हमरे जीवे को धिक्कार २६ सुनिकै बातें आल्हा बोले मानो कही लहुरवा भाय ॥ तुम नहिं जावो अब दिल्लीको चहु मरि जाय चँदेलाराय ३० दोष न देई कउ दुनिया मा ब्रह्मा लीन्ह्यो पान छिनाय ॥ अबहीं भूले त्यहि वघऊदन कैसी कहै लहुरवाभाय ३१ सुनिकै बातें ये आल्हा की बोले उदयसिंह सरदार ॥ दूधपियायो बालापन में मल्हना कीन बड़ा उपकार ३२ कैसे जैवे हम दिल्ली ना दादा जियत मोहिं धिक्कार ॥

बेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५४७ ५ कारो बाना कार निशाना सबकोड करें आज सरदार १३ बने गँजरिहा सबदल हमरो दिल्ली हेतु होय तय्यार ॥ मैं अब जावतहौं तहँना पर जहँना कनउज के सरदार ३४ इतना कहिकै ऊदन चलिभे तम्बुन फेरि पहुँचे आय ॥ सम्मत करिकै लखराना सों उत्तर पत्र दीन पठवाय ३५ लाखनिऊदन मिलि आल्हाते फौजै तुरत लीन सजवाय ॥ भई तयारी फिरि दिल्ली की लश्कर कूच दीन करवाय ३६ पाँच सात दिन के अरसा मा दिल्ली शहर गये नगच्याय ॥ दिल्ली केरे फिरि डाँड़ेमा परिगे जाय कनौजीराय ३७ चौंड़ा बकशी त्यहि समयामा तम्बुन पास पहुँचा आय ॥ मिले बनाफर तहँ ऊदन जब पूँछन लाग चौंड़ियाराय ३८ कहाँ ते आयो औ कहँ जैहौ आपन हाल देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की बोला तुरत बनाफरराय ३९ हिरसिंह विरसिंह हम विरियाके गाँजर देश हमारो जान ॥ सुनी नौकरी घर बेलाके आयनकरन स्वईहमज्वान ४० इतना सुनिकै चौंड़ा बोला ठाकुर बचन करो परमान ॥ काह दरमहा तुम चाहत हौ हमसे सत्य बतावो ज्वान ४१ हम बतलावें दिल्लीपतिको नौकर तुम्हें देयँ करवाय ॥ करो नौकरी जो औरत की तौ रजपूती धर्म नशाय ४२ इतना सुनिकै ऊदन बोले नाहर साँच देयँ बतलाय ॥ एकलाख ते कम नहिं लेवैं यहु नितखर्च हमारो आय ४३ देय महीना तीसलाख को ताकी करें नौकरी भाय ॥ बारह बरस हमते लरिकै जयचंद कूचदीन करवाय ४४ दीन न पैसा हम कनउजका सो यश रहा जगत में छाय ॥

६ आल्हखण्ड । ५४८ घढ़ा बनाफर उदयसिंह जब हमरी लूट लीन करवाय ४५ तंगी आई जब हमरे घर तब दरबार जुहारा भाय ॥ महिना कमती कछु लेहैं ना तुमते साँच दीन बतलाय ४६ इतना सुनिकै चौंड़ा चलि भा आयो जहाँ पिथौराराय ॥ खबरि गँजरिहन की बतलाई चौंड़ा बार बार समुझाय ४७ खबरिपायकै पिरथी बोले मानो कही चौंड़ियाराय ॥ कहाँ खजाना घर इतना है देवैं तीस लाख जो भाय ४८ पारस पत्थर चन्देले घर तिनकी करें नौकरी जाय ॥ म्वहिं अभिलाषा नहिं नौकरकी देवैं तीस लाख जो भाय ४६ इतना सुनिकै चौंड़ा बोला मानो कही पिथौराराय ॥ बड़े लड़ैया गाँजर वाले मोहवा आपु लेउ लुटवाय ५० दश औ पन्द्रा दिन नौकरकरि करिये काज पिथौराराय ॥ फिरि मन भावै महराजा के दीजै सब के नाम कटाय ५१ यह मन भायी पृथीराज के तुरतै हुकुम दीन फरमाय ॥ हुकुम पिथौरा को पावत खन हिरसिंहविरसिंहलीनबुलाय ५२ लाखनि ऊदन दोऊ आये चेहरा अर्पन दीन लिखवाय ॥ कीन नौकरी घर पिरथी के क्षत्री गये शहर में आय ५३ हुकुम लागिगा यह पिरथीका हाथी घोड़ा देउ दगाय ॥ सुनिकै बातें महराजा की लाखनिबहुुतदीनसमुझाय ५४ लिखी न हिंसा कहुँ बेदन में गीता पाठ कीन अधिकाय ॥ विनय हमारी यह राजन है यहु मंसूख हुकुम हैजाय ५५ नहीं फायदा कछु याते है ओ महराज पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें ये लाखनि की खारिज हुकुम दीन करवाय ५६ लाखनि ऊदन देवा सय्यद धनुर्वा यई पाँचहू ज्वान ॥

बेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५४६ ७ बेला बेटी के द्वारे की रक्षा करो कह्यो चौहान ५७ हुकुम पाय कै महराजा को पांचो चले शीश को नाय ॥ बेला बेटी के द्वारे पर ह्वैगे द्वारपाल फिरि आय ५८ चौपरि बिछिगै तहँ लाखनि कै खेलन लाग बनाफरराय ॥ चर्चा कीन्ही तहँ बेला की यहु अलबेला लहुरवाभाय ५६ गुप्त बार्त्ता बाँदी सुनिकै बेलै खबरि जनाई जाय ॥ दारपाल गाँजर के आये तुम्हरी कथा रहे ते गाय ६० इतना सुनिकै बेला बेटी आपै गयी द्वारढिग आय ॥ लाखनि ऊदन की बातें सुनि जान्यो गये बनाफर आय ६१ रूपा बाँदी ते बोलति भै पूँछो द्वारपाल सों जाय ॥ कहाँ के ठाकुर ये आये हैं आपन हाल देयँ बतलाय ६२ सुनिकै बातें ये बेला की बाँदी चली तड़ाका धाय ॥ जहाँ बनाफर उदयसिंहहैं बाँदी अटी तहाँपर आय ६३ कही हकीकति सब बेला की बाँदी हाथजोरि शिरनाय ॥ सुनिकै बातें त्यहि बाँदी की चिट्ठी दीन बनाफरराय ६४ लै कै चिट्ठी बाँदी चलिभै बेलै दीन तड़ाकाधाय ॥ पढ़ी बनाफर की चिट्ठी जब महलन तुरतलीन बुलवाय ६५ परदा कीन्ह्यो उदयसिंह ते कुरसी अलग दीन डरवाय ॥ गुप्त बार्त्ता बेला पूछी ऊदन सबै दीन बतलाय ६६ तब बिश्वास भई जियरे मा आँहीं ठीक बनाफरराय ॥ तब तो पूँछन बेला लागी साँची कहौ लहुरवाभाय ६७ संग न आये तुम बालम के जूझै खेत चँदेलेराय ॥ कहाँ मंसई तब तुम्हरी गै ऊदन साँच देउ बतलाय ६८ ऊदन बोले तब बेला ते भौजी मोर कीन अपमान ॥

८ आल्हखण्ड । ५५० बिरा धरावा गा गौने का रहिगा चार घरी लौं पान ६९ कोऊ खावा जब बीरा ना तब मैं उठा शारदा ध्याय ॥ कर्सों हमरे बीरा लीन्ह्यो तुम्हरे कन्त चँदेलेराय ७० माहिल भूपति तहँ मुसकाने हमरो मरण समय गो आय ॥ कछु नहिं बोले परिमालिकजी दादा हमरे उठे रिसाय ७१ कहा हमारो तुम मान्यो ना ऊदन गयो मोहोवे आय ॥ सवन चिरैया ना घर छोड़ै नावनिउरा बनिजकोजाय ७२ तबै निकार्यो परिमालिकजी दीन्ही बहुत तलाक माय ॥ गे जगनायक जब लेने को तब नहिं अवै बनाफरराय ७३ बहु समुझाये ते आये ते लाखनिराना संग लिवाय ॥ भरी कचहरी परिमालिक की ब्रह्मा लीन्ह्यो पान छिनाय ७४ वासरि करिकै द्वासरी कीन्ही दूनों भाय गयन अलगाय ॥ दादा रोंका मोहिं अवतीखन तुमनहिंजाउलहुरवाभाय ७५ वादा तुमते हम कीन्हा था तुम्हरी बिदा लेब करवाय ॥ गड़बड़िचिट्ठीतुमअतिलिखिकै धावन हाथ दीन पठवाय ७६ सो दिखलावा नहिं दादा को कण्ठै हाल दीन बतलाय ॥ दूध पियावा मल्हना रानी स्यावामोहिं बहुत डुलराय ७७ व्याह हमारे मल्हना रानी कुँवना पाँव दीन लटकाय ॥ प्राण नेग दै मैं मल्हना को टार्यों पैर तहाँ ते माय ७८ प्राण निछावरि तुमपर करिकै बिछुरे कन्त देव मिलवाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली यहनहिंआशपूरिदिखलाय ७९ कुटुंब हमारो सब बैरी है हमको राँड़ दीन करवाय ॥ जियत पिथौरा औ ताहर के कैसे मिलब पियाको जाय ८० प्रभुता ऐसी क्यहि क्षत्री मा प्रीतम मिलन देय करवाय ॥

बेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५५१ शब्द कान सुनि तीर चलावैं हमरे पिता पिथौराराय ८१ लाखनि ऊदन कै गन्ती का हमरी बिदा लेयँ करवाय ॥ डोला लाये संयोगिनि का तब कहँ हते कनौजीराय ८२ सोई लाखनि की दूसर हैं हमरी बिदा लेयँ करवाय ॥ रहे आसरा तुम्हेरो ऊदन सोऊ नहीं पूर दिखलाय ८३ भारी फौजैं महराजा की डोला कौन भांति सों जाय ॥ यहै अंदेशा है जियरे मा लाखनिराना लेउ बुलाय ८४ हुकुम पायकै यह बेला को बाँदी चली तड़ाका धाय ॥ है मर्दाना ज्यहिका बाना सुन्दर सुघर कनौजीराय ८५ सो चलिआवा सँग बाँदी के पहुँचा रंग महल में आय ॥ आवत दीख्यो लखराना को खातिर कीन लहुरखा माय ८६ बैठि कनौजी गे महलन मा बेला बोली बैन सुनाय ॥ बिदाकरावन तुम कस आये दिल्ली शहर कनौजीराय ८७ तुम्हरे घरते संयोगिनि का लाये दिल्ली के सरदार ॥ त्यही वंश के तुम लाखनि हौ की कहुँअन्तलीनअवतार ८८ सुनिकै बातैं ये बेला की यहु अलबेला कनौजीराय ॥ लाली लाली आँखी करिकै दाढ़ी बार दीन बिखराय ८९ एक हाथ धरि तहँ मुच्छन मा नंगी एक हाथ तलवारि ॥ लाखनि बोले तहँ बेलाते कैसी बातें बकै गँवारि ९० काह हक़ीकत थी पिरथी की बिटिया लेत चँदेले केरि ॥ बिटिया लाये घर चेरी की रानी कहा गँवारिनि टेरि ९१ त्यहिके बदले कहु अगमा का डोला लेउँ आज निकराय ॥ तौ तो लरिका रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरों मुड़वाय ९२ ऊदन बोले फिरि बेलाते भौजी काह गयी बौराय ॥

१० | आल्हखण्ड । ५५२ दीख मंसई तुम ऊदन की | हाथी द्वार पछारा आय ६३ करो तयारी तुम महलन ते | बिछुरे कन्त देयें मिलवाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली | मानो कही लहुरवाभाय ६४ चोरी चोरा हम जैहैं ना | नेगिन नेगु देउ चुकवाय ॥ लेउ अधकरी अब ब्याहे की | पाछे बिदालेउ करवाय ६५ यह मनभाई लखराना के | बोले सुनो बनाफरराय ॥ चारि रुपैयन के तोड़ा लै | नेगिन नेगु देउ चुकवाय ६६ इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर | नेगिन तुरत लीन बुलवाय ॥ चारिउ तोड़ा रुपयन वाले | तहँ पर तुरत दीन बँटवाय ६७ रानी अगमा के महलन को | बेला चली तड़ाकाधाय ॥ देवा ऊदन धनुवाँ सय्यद | ये दरबार पहुँचे जाय ६८ द्वारे ड्योढ़ी के महाराजा | ठाढ़े रहेँ पिथौराराय ॥ सय्यद देवा धनुवाँ सँगमें | पहुँचा तहाँ बनाफरराय ६६ माथनायकै महाराजा को | बोला सुनो पिथौराराय ॥ नेगु चुकावा हम नेगिन का | दायज आप देउ मँगवाय १०० बेला जैहैं अब श्वशुरे को | राजन साँच दीन बतलाय ॥ हिरसिंहविरसिंह हम आहिनना | हमहैं छोट बनाफरराय १०१ इतना सुनिकै माहिल भूपति | बोले सुनो पिथौराराय ॥ बैठक करिये दरवाजे पर | दायज उचित देउ मँगवाय १०२ माहिल बोले फिरि चुप्पे से | राजन साँच देयें बतलाय ॥ उतरै घोड़ा ते जब ऊदन | तुरतै मूड़लेउ कटवाय १०३ यह मन भाई महाराजा के | बैठक तहाँ दीन करवाय ॥ बड़े कीमती दुइ कुण्डल को | तुरतै तहाँ दीन रखवाय १०४ कह्यो पिथौरा फिरि ऊदन ते | बैठो आय बनाफरराय ॥

बेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५५३ ११ दायज दीन्ह्यों परिमालिक को कुण्डल यहाँ दीन रखवाय १०५ इतनी सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ राजा नौकर की समता ना बैठैं कौन भाँति से आय १०६ नोक लगायो फिरि भाला की कुण्डल दोऊ लीन उठाय ॥ सजग देखिकै फिरि क्षत्रिनको घोड़ा तुरत दीन दौराय १०७ बेला पहुँची जब महलन मा माता लीन्ह्यो कण्ठ लगाय ॥ भल समझायो रानी अगमा बेटी शोक देउ बिसराय १०८ लिखी विधाता की मेटै को कीन्ह्यों घाटि चौंड़ियाराय ॥ दुलहिनि बोली तब ताहर की ननदी रोवै तोरि बलाय १०९ ब्याह तुम्हारो कहुँ अनतै अब करिहैं श्वशुर पिथौराराय ॥ राजपाट सब तुम्हरे घरमा दौलतभरी पुरीअधिकाय ११० संग न कीन्ह्यो ननदोई का ननदी रोवै तोरिबिलाय ॥ ब्याह न अनुचित कछु दूसरहै ननदी काह गयी बौराय १११ मरे चँदेले मरि जावैदे ननदी रोवै तोरि बलाय ॥ सुनिकै बातें ये भौजीकी बेला बोली क्रोध बढ़ाय ११२ उचित न बातें कछु तेरी हैं अनुचित बात रही बतलाय ॥ भाँवरि फिरिकै चंदेले सँग करिब्योब्याह औरसँगजाय ११३ कउने गवाँरे की बिटियाहै ऐसी टेढ़ि मेढ़ि बतलाय ॥ नहिं सुखस्वइहै तुइ महलन में डरिहौं अवशि राँड़ करवाय ११४ राँड़ अभागिनि की बातें सुनि भौजी चुप्प साधि रहिजाय ॥ तब तो बेला अलबेला यह भूषणवस्त्र सजे अधिकाय ११५ रूप उजागरि सबगुणआगरि शोभा कही बून ना जाय ॥ कटि लचकीली सो मटकीली पीली दुःख देह दिखलाय ११६ माँग सँवारी सो सुकुमारी मानो इन्द्रधनुष समुदाय ॥