आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हाखण्ड । ५३८ दुलाहिनि बनिकै चौंड़ा बकशी तुरतै चढ़ा पालकी जाय ॥ जहरबुझाई लीन कटारी सो सारी में धरी चुराय ६४ ताहर बैठे दल गंजन पर धाँधू हाथी पर असवार ॥ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथ म लई ढाल तलवार ६५ चली पालकी फिरि चौंड़ा की लश्कर कूच दीन करवाय ॥ इक हरकारा ताहर पठयो औ सवहाल दीनबतलाय ६६ खबरि जनावो तुम ब्रह्मा को बेला बिदा लेयँ करवाय ॥ आवत डोला है वेलाका इकले अत्रो चँदेलेराय ६७ इतना सुनिकै धावन चलिभा तम्बुन फेरि पहुंचा आय ॥ खवरि जनाई सब ब्रह्मा को जो कछु ताहर दीन बताय ६८ सुनिकै बातें हरकारा की हरनागर पर भयो सवार ॥ घरी अढ़ाई के अरसा मा पहुँचा मोहबे का सरदार ६६ आवत दीख्यो जब ब्रह्मा का ताहर बोले बचन उदार ॥ आवो आवो ब्रह्मा ठाकुर तुमते हारिगयी तलवार १०० डोला लाये हम बहिनी का ठाकुर बिदालेउ करवाय ॥ कौन डसरिहा हाँ तुम्हरो है जो अब रारि मचावैआय १०१ लड़ि भिड़ि तुमने हम हारे सब तब यह ठीक लीन ठहराय ॥ रंडा बैठै जो बहिनी मम तौ सब जैहैं काम नशाय १०२ यहै सोचिकै गहराजा ने डोला यहाँ दीन पठवाय ॥ बड़ी खुशहाली भै राजा के संग न आये बनाफरराय १०३ जो कहुँ औते ऊदन ठाकुर तौ हाँ होत युद्ध अविकाय ॥ बड़ी खुशहाली भै राजा के जोतुमलीन्ह्योपानछिनाथ १०४ अब यह डोला है बहिनी का मोहबे आपु देउ पठवाय ॥ मुनि मुनि बातें ये ताहर की ब्रह्मा तुरत गये पतियाय १०५