आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 540, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंबेलाकेगौनेकाप्रथमयुद्ध । ५३६ ११ भलओअनभल जबजसहोवय तबतस बुद्धि जाय बौराय ॥ सुनान हन्ना क्यहु सुवरण का नाकयहु दीख नैनसों जाय १०६ रचा विधाता नहिं कबहुंथा मारन हेतु गये रघुराय ॥ यह अनहोनी हम दिखलाई सोचोसदास्वजनजनभाय १०७ होनहार बश ब्रह्मा हैके डोला निकटगये नगचाय ॥ तबहीं चौंड़ा उठि पलकी ते बाँये दीन कटारीघाय १०८ दहिने सांगहनी धाँधू ने ताहर मार्यो तीरचलाय ॥ तीनों घायपरे ब्रह्मा के तुरतै गिरे मूर्च्छाखाय १०९ यह गति दीखी जब ब्रह्मा की रोवनलागि मोहबियाज्वान ॥ तबललकार्यो जगनायकजी होवो खड़े समर चौहान ११० दगाते मार्यो तुम ब्रह्माको हमरे साथ करो तलवार ॥ जियत न जाई कउ दिल्ली का सबका डरों जानसों मार १११ तौ तौ मैने चंदेले का नहिं ई डारौं मुच्छ मुड़ाय ॥ सुनिकै बातें जगनायक की ताहर कूच दीन करवाय ११२ ताहर नाहर के जातैखन जगना अटा तहाँ पर जाय ॥ मूर्च्छित दीख्यो ब्रह्मानँदको पलकी उपर दीन पौढ़ाय ११३ लै कै पलकी जगनायक जी तम्बुन फेरि पहुँचेआय ॥ जागी मूर्च्छा तहँ ब्रह्मा की बोले तुरत चंदेलेराय ११४ कूच करायो नहिं लश्कर को मोहबे खबरि देउ पठवाय ॥ सुनिकै बातें ये ब्रह्मा की धावन तुरत लीन बुलवाय ११५ कही हकीकति सब धावन ते तुरतै चला शीशकोनाय ॥ जहाँ कचहरी परिमालिक की धावन तहाँ पहुँचा आय ११६ कही हकीकति महराजाते तुरतै गिरे पछाराखाय ॥ बीछी काट्यो या बर्रै ने मानो डसा भुजंगम आय ११७