आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९२ आल्हाखण्ड । ५४० बिपदा आई फिरि मोहबेमा फैली बात महल में जाय ॥ सुनी हकीकति रानी मल्हना महलन गिरी मूर्च्छाखाय ११८ बारह रानी चंदेले की रोवैं तहाँ पछारखाय ॥ ख्याति रोवैं घर अपने मां सपनेसरिसजगतदिखलाय ११९ साँचो स्वपना जग हम देखैं कोउन पूत पतोहू भाय ॥ आज मरैं दिन दूसर काल्ही याही साँच परै दिखलाय १२० इयहिते भैया यहि दुनिया मा कबहुँन करै उपरको शीश ॥ सम्मत हमरो यह साँचा है नितप्रतिभजैरामजगदीश १२१ सोउन बाचा यहि दुनिया मा बाहू गये जासु के बीश ॥ सहसन बाहुनका अर्जुन भा ताकाहनावशिजगदीश १२२ काह हकीकति नरपामर की जो करिलेय उपर को शीश ॥ रहिगा ठाकुर ना सिरसा का कलियुगवीरधीरअवनीश १२३ ताते चाही नर देही को झुकि २ झुकतर झुकि जाय ॥ त्यों त्यों त्यों त्यों ऊपर जावै ज्यों २ शीश झुकावत जाय १२४ जैसे तरुवर है रसालको बौरन भार रहा गरुवाय ॥ ज्यों ज्यों बाढ़ फल रसालके त्योंत्योंझुकत २झुकिजाय १२५ ज्यों ज्यों पकिपकि टपकतआवैं त्यों त्यों डार उपरको जाय ॥ ऐसो सम्मत यह साँचा है साँचासमयगयोनगन्याय १२६ नहीं तो आल्हा को थाल्हाकरि ललिने धर्म देत दिखलाय ॥ काह हकीकति नर पामर की जोअभिमानकरतरहिजाय १२७ सुनी पाठ है जिन दुर्गा की खिन हना वीर समुदाय ॥ धर्म यथारथकी बातें सब अबकोस्वजनदेयदिखलाय १२८ ताते गाथा यह सब छूटा लूटा दुःख मोहोबा आय ॥ खबरि पहुँचीगै दथहरिपुरमा आल्हानिकटतड़ाका जाय १२६