भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 554

बेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५५३ ११ दायज दीन्ह्यों परिमालिक को कुण्डल यहाँ दीन रखवाय १०५ इतनी सुनिकै ऊदन बोले दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ राजा नौकर की समता ना बैठैं कौन भाँति से आय १०६ नोक लगायो फिरि भाला की कुण्डल दोऊ लीन उठाय ॥ सजग देखिकै फिरि क्षत्रिनको घोड़ा तुरत दीन दौराय १०७ बेला पहुँची जब महलन मा माता लीन्ह्यो कण्ठ लगाय ॥ भल समझायो रानी अगमा बेटी शोक देउ बिसराय १०८ लिखी विधाता की मेटै को कीन्ह्यों घाटि चौंड़ियाराय ॥ दुलहिनि बोली तब ताहर की ननदी रोवै तोरि बलाय १०९ ब्याह तुम्हारो कहुँ अनतै अब करिहैं श्वशुर पिथौराराय ॥ राजपाट सब तुम्हरे घरमा दौलतभरी पुरीअधिकाय ११० संग न कीन्ह्यो ननदोई का ननदी रोवै तोरिबिलाय ॥ ब्याह न अनुचित कछु दूसरहै ननदी काह गयी बौराय १११ मरे चँदेले मरि जावैदे ननदी रोवै तोरि बलाय ॥ सुनिकै बातें ये भौजीकी बेला बोली क्रोध बढ़ाय ११२ उचित न बातें कछु तेरी हैं अनुचित बात रही बतलाय ॥ भाँवरि फिरिकै चंदेले सँग करिब्योब्याह औरसँगजाय ११३ कउने गवाँरे की बिटियाहै ऐसी टेढ़ि मेढ़ि बतलाय ॥ नहिं सुखस्वइहै तुइ महलन में डरिहौं अवशि राँड़ करवाय ११४ राँड़ अभागिनि की बातें सुनि भौजी चुप्प साधि रहिजाय ॥ तब तो बेला अलबेला यह भूषणवस्त्र सजे अधिकाय ११५ रूप उजागरि सबगुणआगरि शोभा कही बून ना जाय ॥ कटि लचकीली सो मटकीली पीली दुःख देह दिखलाय ११६ माँग सँवारी सो सुकुमारी मानो इन्द्रधनुष समुदाय ॥

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य) · पृष्ठ 554, कुल 618 में से · BharatKosha