भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 618 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 553

१० | आल्हखण्ड । ५५२ दीख मंसई तुम ऊदन की | हाथी द्वार पछारा आय ६३ करो तयारी तुम महलन ते | बिछुरे कन्त देयें मिलवाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली | मानो कही लहुरवाभाय ६४ चोरी चोरा हम जैहैं ना | नेगिन नेगु देउ चुकवाय ॥ लेउ अधकरी अब ब्याहे की | पाछे बिदालेउ करवाय ६५ यह मनभाई लखराना के | बोले सुनो बनाफरराय ॥ चारि रुपैयन के तोड़ा लै | नेगिन नेगु देउ चुकवाय ६६ इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर | नेगिन तुरत लीन बुलवाय ॥ चारिउ तोड़ा रुपयन वाले | तहँ पर तुरत दीन बँटवाय ६७ रानी अगमा के महलन को | बेला चली तड़ाकाधाय ॥ देवा ऊदन धनुवाँ सय्यद | ये दरबार पहुँचे जाय ६८ द्वारे ड्योढ़ी के महाराजा | ठाढ़े रहेँ पिथौराराय ॥ सय्यद देवा धनुवाँ सँगमें | पहुँचा तहाँ बनाफरराय ६६ माथनायकै महाराजा को | बोला सुनो पिथौराराय ॥ नेगु चुकावा हम नेगिन का | दायज आप देउ मँगवाय १०० बेला जैहैं अब श्वशुरे को | राजन साँच दीन बतलाय ॥ हिरसिंहविरसिंह हम आहिनना | हमहैं छोट बनाफरराय १०१ इतना सुनिकै माहिल भूपति | बोले सुनो पिथौराराय ॥ बैठक करिये दरवाजे पर | दायज उचित देउ मँगवाय १०२ माहिल बोले फिरि चुप्पे से | राजन साँच देयें बतलाय ॥ उतरै घोड़ा ते जब ऊदन | तुरतै मूड़लेउ कटवाय १०३ यह मन भाई महाराजा के | बैठक तहाँ दीन करवाय ॥ बड़े कीमती दुइ कुण्डल को | तुरतै तहाँ दीन रखवाय १०४ कह्यो पिथौरा फिरि ऊदन ते | बैठो आय बनाफरराय ॥