भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 545, कुल 618 में से

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२ आल्हखण्ड । ५३४ जटा के ऊपर सुरसरि सोहै तापर बैठ भुजग विकराल ॥ श्वेत वरण तन भस्म रमाये धारे हृदय मुण्ड के माल ४ को गति बरणै शिवशङ्कर कै बस्तर नित्त करै विशराम ॥ भाँग धतूरन को भोजन करि ध्यावैं नित्त रामको नाम ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ चढ़ी कनौजी अब दिल्लीपर चढ़ि हैं उदयसिंह सरदार ६ अथ कथाप्रसंग ॥ बेला बैठी निज महलन माँ मनमा धरे राम को ध्यान ॥ कन्त झूझिगे रणखेतन मा फिरियहकरनलागिअनुमान १ नैनन आँसू ढारन लागी पागी महादुःख भ्रमजाल ॥ मूर्च्छा जागी जब बेला की चिट्ठी लिखन लागित्यहिकाल २ लिखी हकीकति यह ऊदनका बेटा देशराज के लाल ॥ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं थी जैसी कीन आप यहिकाल ३ वादा कीन्ह्यो तुम ब्याहे मा गौने विदा लेब करवाय ॥ कन्त जूझिगे रण खेतन माँ अन्तौमिलनकठिनदिखराय ४ भये जनाना तुम द्यावलि के ऊदन बार बार धिकार ॥ नालति तुम्हरी रजपूती का नाहक लेउ ढाल तलवार ५ होतिउ बिटिया तुम द्यावलिके करतिउ बैठि महल श्रृङ्गार ॥ शोच न होतै तब बेला के ठाकुर उदयसिंह सरदार ६ होत जो बेटा बच्छराज का ठाकुर शूर वीर मलखान ॥ तौ का करतीं दिल्ली वाले बिल्ली रूप सबै चौहान ७ गिल्ली ह्वैहै आल्हा ठाकुर दिल्ली देखि डरे यहिकाल ॥ ऐसी दिल्ली है मोहवे मा तौ का करें रजा परिमाल ८ दिल टिल दिल्ली खलभल्ली ई लल्ली देशराज के लाल ॥

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