आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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बेलाकेगौनेका द्वितीययुद्ध । ५६१ १६ पाँव पिछारी का धरिबे ना बहुतन धजी २ उड़िजाय १६८ पता लगावै हौँ लाखनि का आल्हा केर लहुरवा भाय ॥ मारत मारत रजपूतन को पहुँचा जहाँ पिथौराराय १६६. तीर कमनिया लै हाथे मा मारन हेतु भयो तैयार ॥ तब ललकारा नर नाहर यहु ठाकुर उदयसिंह सरदार २०० तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है राजा समरधनी चौहान ॥ नहीं बराबरीके लखराना जोतुम लीन्ही तीर कमान २०१ सुनिकै बातें बचऊदन की कायल भये बीर चौहान ॥ चुप्पै हौदा पर रख दीनी राजा अपनी तीर कमान २०२ यहु दलगंजन की पीठी मा ताहर आय गयो त्यहिबार ॥ भये कनौजी त्यहिके सम्मुख लागे करन तहाँ पर मार २०३ ऊदन अंगद का मुर्चा भा दोऊ लड़न लागि सरदार ॥ दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढाल पर वार २०४ तब ललकार्यो फिरि धाँधू को यहु महराज पिथौराराय ॥ जाय न डोला अब मोहबे का लावो जाय तड़ाकाधाय २०५ इतना सुनिकै धाँधू चलिभे डोला पास पहुँचे जाय ॥ तब ललकारा तहँ धनुवाँने क्षत्री खबरदार है जाय २०६ पाँव अगाड़ी का डोरेना नहिं यमपुरी देउँ दिखवाय ॥ कहा न माना कछु धनुवाँका धाँधू चला तड़ाका धाय २०७ तेलिके बच्चा कब्बा खैहौँ लुच्चा ठाढ़ होय यहिवार ॥ सच्चा लड़का जो क्षत्रीका तौ मुखघाँसिदेउँ तलवार २०८ इतना कहिकै धांधू क्षत्री अँगुरिन भालालीन उठाय ॥ ताकि कै मारा सो धनुवाँ का परिगा घाव जाँघ पर आय २०६ गिरिगा धनुवाँ जब खेतन मा डोला तुरत लीन उठवाय ॥ ३६