आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० आल्हखण्ड । ५६२ डोला उठिगा जब बेला का सय्यदगयो तड़ाका आय २१० औ ललकारा त्यहि धाँधू का अब ना धस्यो अगारी पाँय ॥ जान न पैहौ तुम सय्यद ते क्षत्री साँच दीन बतलाय २११ इतना सुनिकै अंगद राजा तहँ पर गयो तड़ाका आय ॥ भूरी हथिनी के चढ़वैया आये तहाँ कनौजीराय २१२ ताहर नाहर दलगंजन पर सोऊ बेगि पहुँचा आय ॥ कठिन लड़ाई भै डोलों पर हमरे बूत कही ना जाय २१३ को गति बरणै त्यहि समयाकै बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ सुनिसुनि गाजैं रजपूतन की कायर डारिभागि हथियार २१४ को गति बरणै रण शूरनकी दूनों हाथ करें तलवार ॥ कीरति प्यारी जिन क्षत्रिन को तिनको भलाकरैं करतार २१५ कीरति वाले लाखनि ताहर ठाना घोर शोर घमसान ॥ यहु महराजा कनउज वाला लीन्ही गुर्ज तड़ाकातान २१६ ऐंचिकै मारा सो ताहर के मस्तक परी घोड़के जाय ॥ घोड़ा भाग्यो तहँ ताहर का डोला लीन कनौजीराय २१७ बिना नृपति के सब सेना तहँ रणमा कौन भांति समुहाय ॥ बिन बर कन्या ज्यों मड़ये मा भौंरी कौन करावन जाय २१८ दुलहिन दुलहा की समता मा ममता कौन खवैया भान ॥ मिलै रुपैया बरतौनी ना तबलग देखिपरे तहँ लात २१६ तैसे मुर्चा की बातें हैं यारो जानिलेउ सब घात ॥ घोड़ा भाग्यो जब ताहर का लाग्योनहीं क्यहूकी लात २२० डोला चलिभा तब बेला का जहँ पर रहै चँदेलाराय ॥ ब्रह्मा ठाकुर के तम्बू मा द्वैगै भीरभार अधिकाय २२१ बाजे डङ्का अहतङ्का के शङ्का सबन दीन बिसराय ॥