आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ आल्हखण्ड । ५६८
बाजत डंका अहलंका के पहुँचा नार उपरसो आय २१ दीख्यो आल्हा को चौंडाने गरुई हाँक कहा गुहराय ॥ डोला धरिकै अब बेला का जावो लौटि बनाफरराय २२ हुकुम पिथौरा का याही है आल्हा साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की बोला फेरि बनाफरराय २३ डोला लौटनको नाहीं है चौंड़ा काह गये बौराय ॥ एक पिथौरा की गिन्ती ना लाखन चढ़ैं पिथौरा आय २४ नगर मोहोवे डोला जाई चौंड़ा साँच दीन बतलाय ॥ गा हरिकारा फिरि तहँना ते जहँना बैठ बनाफरराय २५ डोला घेरा है बेला का बोला हाथ जोरि शिरनाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर तुरतै कूच दीन करवाय २६ जहँ पर फौजैं हैं चौंड़ा की पहुँचा तुरत लहुरवाभाय ॥ हाथ जोरिकै ऊदन बोले दादा कूच जाउ करवाय २७ इतना सुनिकै चौंड़ा बक्शी तुरतै हुकुम दीन फर्माय ॥ जान न पावैं मोहवे वाले सब के देवो मूड़गिराय २८ हुकुम चौंड़िया का पावतखन क्षत्रिन खैंचि लीन तलवार ॥ झुके सिपाही दुहुँ तरफा के लागी होन भड़ाभड़ मार २९ गोली ओला सम बरसी तहँ कोताखानी चलीं कटार ॥ भा खलभल्ला औ हल्ला अति जूझन लागि शूर सरदार ३० कटि कटि कल्ला गिरैं बछेड़ा घूमैं मूड़ बिना असवार ॥ खट खट खट खट तेगा बोलैं बोलैं छपक छपक तलवार ३१ झल् झल् झल् झल् झीलमझलकें नीलम रंग परै दिखलाय ॥ चम् चम् चम् चम् छूरीचमकैं कउँधालपकनिखङ्गदिखाय ३२ मर् मर् मर् मर् दालैंच्वालैं तेगा टन्र टन्र टन्राय ॥