आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
पृष्ठ 570, कुल 618 में से
संदर्भ में पढ़ेंबेलाताहरकामैदान । ५६६
सन् सन् सन् सन् गोली बरसें तीरन मन्न मन्न गा छाय ३३ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥ बड़ी खुशहाली रणशूरन के कायेर गये तहाँ सन्नाय ३४ कायर सोचत मन अपनेमा नाहक प्राण गँवाये आय ॥ माठा रोटी घरमा खाइत आपनि भैंसिचराइत जाय ३५ यह गति जानित जो पहिलेते काहे फँसित समर में आय ॥ नई बहुरिया घरमा बैठी कैसे धरा धीर उरजाय ३६ हाय रुपैया बैरी ह्वैगे हमरे गई प्राणपर आय ॥ को समुझाई घर दुलहिनिका देवी देवता रहे मनाय ३७ कायर बिनवैं मन सूरजते पश्चिम जाउ आज महराज ॥ तौ हम भागैं समरभूमि ते औ रहिजायजगतमें लाज ३८ शूर सिपाही ईजतिवाले दहिनी धरैं मुच्छ पर हाथ ॥ हनि हनि मारैं समरभूमि मा कटिकटिगिरैं चरणऔमाथ ३९ को गतिवरणै त्यहिसमया कै बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ४० मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ घोड़ बेंदुला के ऊपर ते नाहर उदयसिंह सरदार ४१ फिरि फिरि मारै औ ललकारै बेटा देशराज का लाल ॥ गरुई हाँकैं सुनि ऊदन की कम्पित होयँ तहाँ नरपाल ४२ ऐंड़ लगावै रस बेंदुल के हौदा उपर पहुँचै जाय ॥ मारि महाउत को हनिडारै औ असवारै देय गिराय ४३ • यह गति दीख्यो जब ऊदन कै चौंड़ा हाथी दीन बढ़ाय ॥ औ ललकारा समरभूमि मा ठाढ़े होउ बनाफरराय ४४ गरुई हाँकैं सुनि चौंड़ा की ऊदन घोड़ा दीन उड़ाय ॥