आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] बेलाताहरकामौदान । ५७१ ७
भा अति मेला तहँ नारिन का शोभा कही वूत ना जाय ५७ मुहँ दिखलाई रानी मल्हना तहँपर दीन नौलखाहार ॥ पायँ लागिकै बेला रानी कङ्कण तुरतै दीन उतार ५८ भीर मेहरियन कै हटिगै जब अक्सर बहू रही त्यहिताँय ॥ मल्हना पूँछै तब बेला ते साँची साँच देय बतलाय ५६ बालम तुम्हरे अब कैसे हैं कहँ कहँ लगे अंग किनघाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ६० बाईं दहिनी दूउ कोखिन मा लागीं सेल कटारी घाय ॥ गाँसी खटकति है मस्तक में मैया बिपति कही ना जाय ६१ वातैं सुनिकै ये बेला की मल्हना गिरी पछारखाय ॥ कथा पुराणन की वातैं बहु बेला कहा तहाँ समुझाय ६२ कथा सुनाई गंधारी की ज्यहि के मरे एकशत पूत ॥ कथा बताई यदुनन्दन की जहाँ मरिगये सबै रजपूत ६३ कथा बखानी रघुनन्दन की नृपपद छूटि मिला बनबास ॥ कही कहानी दशकन्धर की ज्यहिके भई वंशकी नाश ६४ बेला बानी सुनि रानी सब तुरतै शोक दीन बिसराय ॥ प्रसव वेदना ज्यहि पर बीती जीतीस्वईशोक अधिकाय ६५ बेला बोली चन्द्रावलि ते ननँदी साँच देयँ बतलाय ॥ भैया अपने को सतखण्डा ननँदी मोहिं देय दिखलाय ६६ इतना सुनिकै चन्द्रावलि तहँ गै सतखण्डा तुरत लिवाय ॥ को गति बरणै सतखण्डाकै साँचो इन्द्र धाम दिखलाय ६७ चँदन किंवरिया जहाँ लागी हैं खम्भन रत्न जटित को काम ॥ कैसो सम्भ्रम मन जो होवै बैठत लहै तहाँ विश्राम ६८ बेला पहुँची जब छज्जा पर पखिन भीर दीख अधिकाय ॥