आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] ८ आल्हखण्ड । ५७२
कोकिल हंस मोर पारावत तीतर लवा सुवा सुखदाय ६९ शोभा देखत तहँ छज्जा की बेला बार बार पछिताय ॥ जीवत प्रीतम हमरे होते तौ सुखभोग होत अधिकाय ७० आज काल्ह दिन प्रीतम भेलैं ताते नरक सरिस दिखलाय ॥ हाय ! विधाताकी मरजी अस भारी विपति गई शिर आय ७१ प्रीतम प्यारे के सतखण्डा हम पर फाटि गिरो अरराय ॥ यह मन विनवत बेला रानी महलन गई तड़ाका आय ७२ बेला बोली फिरि मल्हनाते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मोरि लालसा यह डोलति है चन्दन वगिया देउ दिखाय ७३ सुनिकै बातें ये बेला की पालकी तुरत लीन मँगवाय ॥ बैठि पालकी महरानी सब चन्दन बाग पहुँचिं जाय ७४ पुष्पवाटिका तहँ राजत है छाजत सबै दिनन ऋतुराज ॥ बेला चमेली औ नेवारकी पंक्तीं रहीं एक दिशि छाज ७५ बिसुनकान्ता कहुँ कहुँ फूले कहुँ कहुँ फूले सुर्ख अनार ॥ श्वेत रक्त औ मधुर गुलाबी पाटल फूले भांति अपार ७६ फुली चांदनी श्वेत वरणहैं जिन पर केलि करत बहुभृंग ॥ को गति वरणै दुपहरिया कै ज्यहिको रक्तवरण है रंग ७७ श्वेत रक्त औ मधुर गुलाबी सब विधि फूलि रहा करवीर ॥ कदली केंवँड़ा यकदिशि राजत छूटत देखि मुनिनको धीर ७८ श्वेत रक्त तहँ चन्दन छाजैं राजैं कोकिल मोर चकोर ॥ पीव पपीहा की रट सुनिकै बिरहिनि पीर होय अतिघोर ७६ यह सुख सम्पति बेला लखिकै कीन्ह्यो घोर शोर चिग्घार ॥ जितनी रानी थीं वगिया में सबहिन छांड़िदीन डिंडकार ८० मोती ऐसे आँसू ढरकें बेला हृदय शोक गा छाय ॥