आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । ५७४ भये खेवैया आल्हा ठाकुर पहुँचे पार तड़ाका आय ६३ अतिशुभ मंदिर ब्रह्मानंद का शोभा कही बूत ना जाय ॥ गई तड़ाका सब महरानी चकितलखै चहूँदिशिधाय ६४ पंसासारी ब्रह्मानँद की बेला नजरि परी सो आय ॥ तब अलबेला बेलारानी बोली सुनो बनाफरराय ६५ बड़े खिलारी तुम चौपरिके सो अब मोहिं देउ सिखलाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बैठे चौपरि तहाँ दीन फैलाय ६६ बेला खेलै पंसासारी अंचल अपन उड़ावतिजाय॥ यह गति देखी आल्हा ठाकुर नीचेलीन्ह्यो शीश झुकाय६७ बहुतक रूप धरे बेला ने आल्है मोह रही करवाय ॥ चाटक नाटक करि सबहारी मोहा नहीं बनाफरराय ६८ रूप भयङ्कर दर्शवों धरिकै डाइन बैठिगई मुहबाय ॥ यहिका लखिकै आल्हा ठाकुर तुरतै खाँड़ा लीन उठाय ६९ गर्जत बोले आल्हा ठाकुर का तू मोहिं रही डरवाय ॥ देखि भयङ्कर क्षत्री डरपै कीरति जावै सबै नशाय १०० हो अपकीरति जब दुनिया में तब तो मृत्यु नीकि है जाय ॥ ऐसे वैसे हम क्षत्री ना जो अब देवैं धर्म नशाय १०१ रूप मोहनी माता जाना डाइन शत्रुरूप दिखलाय ॥ अब तू पलटै कित स्वरूप को कित तू करै समररण आय १०२ इतना सुनतै बेलारानी प्रथमै लीन्ह्यो रूप बनाय ॥ पाप तुम्हारे कछु मनमें ना साँचे शूर बनाफरराय १०३ -योंचे तुमका हम तम्बूमा अपने लाइन साथ लिवाय ॥ संग लहुरवा का लीन्ह्यो ना हमरे उमर सरिससोआय १०४ संगलकड़ियनमिलि अग्नी को ज्वाला अधिक २ अधिकाय ॥