भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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बेलाताहरकामैयान । ५७५ ११ यामें संशय कछु नाहीं है बिप्रनमोहिं दीन बतलाय १०५ पै तहँ सज्जन औ दुर्जनका मंद औ तीक्ष्ण भेदहै भाय ॥ सज्जनक्षत्रीअमझकलियुगमा नहिंकहुँबरनघरनअधिकाय १०६ जस तुम द्यावलि के उपजेहौ कीरति रही लोक में छाय ॥ उत्तम करणी करि नर सज्जन कीरतिध्वजा देयँ फहराय १०७ धर्म नशावैं ते मरिजायैं जिन अपकीरति बहुतसुहाय ॥ साँचे याँचे तुम क्षत्री हौ कीरतिकहीलोकसबगाय १०८ धर्म पतिव्रत के शपथन ते आशिर्बाद बनाफरराय ॥ कीरति गाई जो सज्जन की गावतस्रऊ सरिसह्वै जाय १०६ सज्जन गावै गाय सुनावै पूरो अर्थ देय बतलाय ॥ जो मन भावै क्यहु सज्जन के पावै अमरलोक सो भाय ११० ऐसे कीरति के सागर तुम साँचे धर्म बनाफरराय ॥ इतना कहतै तहँ बेला के मलहनाआदि गईं सब आय १११ बैठिकै नैया सब महरानी सागर पार पहुँचीं जाय ॥ बारह ताल हते मोहबे में बेला दीख सबनको धाय ११२ बेला बोली फिरि मल्हना ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मिलै आज्ञा मोहिं माता की लस्करजाउँ तड़ाकाधाय ११३ कीनि प्रतिज्ञा हम प्रीतम सों माता साँच देयँ बतलाय ॥ मूड़ काटिकै हम ताहरको औ स्वामीको देब दिखाय ११४ जग मर्यादा राखन हेतू सेवक भाव देब दिखलाय ॥ प्रीतम प्यारे की आज्ञा सों जीतोंसमरसगानिजभाय ११५ मोहिं विधाता की मर्जी थी अनरथ रूप दीन उपजाय ॥ अर्थ न पावा कछु देही का भइजगदेह अकारथ माय ११६ स्वारथ प्रीतम के सँग होती सो विधि दीन वियोग कराय ॥